गुरुवार, फ़रवरी 16, 2012

टूटी कश्ती थी, मझधार में चल रही थी

टूटी हुई कश्ती थी मझधार में चल रही थी 
कभी   डूब रही  थी    कभी संभल रही  थी

वक़्त की  मुट्ठी में  थी   तकदीर   मेरी  
कभी बिखर रही थी कभी बदल रही थी

हिकायत -ये माज़ी में   डूबे   चश्म- तर
आंसुओं की बारिश में  भी जल रही  थी

अमा निशा की ख़ामोश फिज़ा थी, "रजनी"
ख़्वाब था हक़ीकत सा और मै बहल रही थी

मंगलवार, फ़रवरी 14, 2012

ये गुलाब




एक सुर्ख़ गुलाब देकर
कर देते हैं
अपनी  भावनाओं का
इजहार लोग़
यदि
यही है
अपने प्रीत को बयाँ करना
तो कई बार बांधे मैंने
तुम्हारे जुड़े में सुर्ख़ गुलाब |
और , तुम मुस्कुरा कर
अपने हाथों से
छू कर गुलाब को
कह देती हर बार
कितनी फबती है
मेरे  गौर वर्ण पर,
काले बालों में
यह लाल गुलाब !
मै हर बार ठगा सा रह गया
शायद
कभी तो समझ पाओगी
मेरे अनकहे अहसास को |
क्या ये गुलाब
जिसे ,
प्रेम का प्रतीक कहते  आये हैं लोग़
वो  रह गया
मात्र एक
श्रृंगार  बन कर |
कभी देवताओं के सर का,
कभी रमणी के ?

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"


सोमवार, फ़रवरी 13, 2012

प्रेम , प्रेम ही होता है



प्रेम गहरा हो , या  आकर्षण ,
प्रेम , प्रेम ही होता है.....
चंचल मन को मिलन की तिश्नगी,
जीवन को दर्पण देता है|
तन,मन धन सर्वस्व न्योछावर ,
पथरीले राहों में मंजिल को संबल देता है|
दुःख-सुख के पलों में आलिंगन देता है
प्रेम गहरा हो , या  आकर्षण ,
प्रेम , प्रेम ही होता है.....
अदभुत है इस प्रेम की रीत,
त्याग का दूजा  नाम है प्रीत|
जहाँ त्याग नहीं हो प्यार में,
वो प्यार  वफ़ा नहीं देता है |
प्रेम से  सुगन्धित संसार है,
ये फूलोँ में काँटों का हार है|
त्याग,बलिदान,वफ़ा से ,
जुड़ा प्यार का नाता है|
सिर्फ प्रेम को पाना ही नहीं,
लूट जाना भी प्यार है|
संसार से जुड़ा हर रिश्ता प्रेम से गहराता है,
वो प्रेमी,प्रेमिका,भाई ,बहन, दोस्त,पिता - माता है |
प्रेम गहरा हो , या  आकर्षण ,
प्रेम , प्रेम ही होता है.....


"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

गुरुवार, फ़रवरी 09, 2012

प्रेम , प्रेम ही होता है



प्रेम गहरा हो , या  आकर्षण ,
प्रेम , प्रेम ही होता है.....
चंचल मन को मिलन की तिश्नगी,
जीवन को दर्पण देता है|
तन,मन धन सर्वस्व न्योछावर ,
पथरीले राहों में मंजिल को संबल देता है|
दुःख-सुख के पलों में आलिंगन देता है
प्रेम गहरा हो , या  आकर्षण ,
प्रेम , प्रेम ही होता है.....
अदभुत है इस प्रेम की रीत,
त्याग का दूजा  नाम है प्रीत|
जहाँ त्याग नहीं हो प्यार में,
वो प्यार  वफ़ा नहीं देता है |
प्रेम से  सुगन्धित संसार है,
ये फूलोँ में काँटों का हार है|
त्याग,बलिदान,वफ़ा से ,
जुड़ा प्यार का नाता है|
सिर्फ प्रेम को पाना ही नहीं,
लूट जाना भी प्यार है|
संसार से जुड़ा हर रिश्ता प्रेम से गहराता है,
वो प्रेमी,प्रेमिका,भाई ,बहन, दोस्त,पिता - माता है |
प्रेम गहरा हो , या  आकर्षण ,
प्रेम , प्रेम ही होता है.....


"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

रविवार, जनवरी 29, 2012

बाक़ी है हर तहजीब पुरानी अभी तक गाँव में

बाक़ी है हर  तहजीब पुरानी  अभी तक  गाँव में,
जिस्म से हैं शहरों में बूढ़े जान अभी तक गाँव में.


फ़ैल गया  नफ़रत का ज़हर शहर के धूप-छाँव में,
प्रेम का पौधा फला  खड़ा  है  अभी  तक गाँव  में .

ईमेल   और  चैट  पर होती   है  शहरी  गुफ़्तगू,
डाकिये की राह देखें  लोग  अभी  तक  गाँव  में.

कट रहे   पेड़  शहरों में  अंधी  भौतिक   दौड़  में,
पूजते है  लोग नीम ,पीपल   अभी  तक गाँव  में.

उफ़न -उफ़न आती थी एक  पगली नदी की  धारा,
बरसात  में  सबको  डराती है  अभी  तक  गाँव में.

 नए जमाने को पसंद  डिस्को, पब, चाईनीज़, थाई,
 पुवों-पकवानों की महक आती है अभी  तक गावं में.

दिन  ढले   तक  सोते  हैं ये  मगरिब को ढोने वाले,
तड़के  ही उठ  जाते  हैं लोग  अभी  तक   गाँव  में.
रजनी मल्होत्रा  नैय्यर

गुरुवार, जनवरी 19, 2012

बहुत रंग हैं जीवन के, जिसमे ग़म का रंग गहरा है


बहुत रंग हैं जीवन के, जिसमे ग़म  का  रंग गहरा है
खुशियों के    सांचों   पर तो,    ग़मों का  ही   पहरा  है

ये    मदमस्त   समीर      तू    छेड़    कोई  तराना
जिसमे   न  बचे   दुहराने को       कोई   अफ़साना

तेरे   संग   हम   भी चलो   वहां  तक    चल   जायें
कोई   भी    ग़म मुझे  जहाँ   का    न रुलाये   सताये

ख़ुद  ही   हमने   ख़ुद  को   इतने   ज़ख्म     लगाये
अब  तो  असह्य है ये  पीड़ा जो अब  सही  न   जाये

न   जाने  ये कैसी  पीड़ा   है जो   कभी   दब जाती है
 कभी-  कभी  मन  के अग्न  को  और    बढ़ाती    है

क्यों खुशियों   के साथ    ग़मों का   भी   समावेश  है ?
क्यों हर   ज़िंदगी में   कुछ- कुछ इसका   भी प्रवेश है ?

बहुत   रंग हैं जीवन   के जिसमे   ग़म का रंग गहरा है,
खुशियों   के     सांचों  पर   तो  ग़मों   का   ही  पहरा है


किसकी अब बात हो, करे  किस पर    यकीं   ज़माना,
अपने   बेगाने  सभी    दे देते हैं ग़म    का     नज़राना

ये ग़म    हर   ज़ख्म   पर    मरहम         लगाता     है
 कुछ पल करता  चोट उसी   से     जीना  सिखाता   है


बहुत    रंग  हैं जीवन   के,  जिसमे   ग़म का रंग गहरा है
ख़ुशियों    के  सांचे    पर    तो   ग़मों  का    ही  पहरा   है

ग़म  से भागते हैं    इससे        ही     जीवन   रुपहला   है
बहुत    रंग हैं   जीवन के   जिसमे गम का रंग गहरा   है 

सोमवार, जनवरी 09, 2012

मेरी ज़िन्दगी की हसीं शाम कर दो

मेरी   ज़िन्दगी की  हसीं शाम कर दो
अपनी  एक ग़ज़ल  मेरे नाम   कर दो.

 उठते  नहीं शर्म-ओ हया     से   चश्म
या रब,मेरे जज़्बात लब-ए-बाम कर दो.

बहुत  फासले हैं  दरमियाँ  मेरे  तुम्हारे
सदा के  लिए  क़िस्सा    तमाम कर दो.

कब तक छुपाये  रखोगे गोशा-ए-दिल में
राज़-ए-दिल  आज चर्चा-ए-आम कर दो.


तग्ज्जुल   कहाँ रह गयी आज ग़ज़लों में,
 "रजनी "  तुम्हीं  यह  नेक  काम कर दो .


"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "











गुरुवार, जनवरी 05, 2012

रफ़्ता रफ़्ता ख़ुदकशी का मज़ा हमसे पूछिये

रफ़्ता रफ़्ता ख़ुदकशी का   मज़ा हमसे पूछिये
वफ़ा के बदले  मिलती  है जफा , हमसे पूछिये.

 हर  साँस में  बस जाये  जो धड़कन  बन  कर
उसे  ताउम्र न भूल पाने की ख़ता हमसे पूछिये.


एक  बार   में   कैसे   पी जाते  हैं जाम  लोग
घूंट -घूंट  कर  पीने  का  मज़ा  हमसे  पूछिये.


दोस्त  भी दोस्ती नहीं  निभाते  हैं  आजकल
दुश्मनों से भी निभाने की अदा  हमसे पूछिये.

क़ातिलों को दे  दी रिहाई ,  उम्र क़ैद ख़ुद को
मेरी ये     सादगी  लिल्लाह   हमसे  पूछिये.














शनिवार, दिसंबर 31, 2011

हर शख्स पे तेरा चेहरा नज़र आने लगा है

अब  तो  हर शय  पर  तू   छाने   लगा   है
हर शख्स पे तेरा चेहरा नज़र आने  लगा है.                                                                     

चाहत में  मिलेगी ऐसी सज़ा  , मालूम न था                                      
 रह -रह  कर याद-ए-माज़ी  सताने  लगा  है.

भर जाते हैं ख़्वाब  आँखों में, नींद आये बिना,
तू तो जगती आँखों में सपना दिखाने लगा है.

यह   अदा-ए -बेन्याज़ी   जान ले लेगी  मेरी
तेरी   ख़ामोशी   मुझे पागल  बनाने लगा है.

कभी   वक़्त   को   हम     आज़माते     थे,
आज   वक़्त    हमें    आज़माने    लगा  है.

 अब    कटते    नहीं   हैं ये लम्हे ये घड़ियाँ,
मौसम   भी अपना    रंग  दिखाने   लगा है.

अब   तो हर   शय   पर तू   छाने  लगा  है,
हर शख्स पे तेरा चेहरा नज़र आने लगा है.



रविवार, दिसंबर 18, 2011

हौसले जब जवान होते हैं

हौसले       जब    जवान    होते     हैं,
ज़ेर    पा       आसमान    होते      हैं.

ग़म को    पीकर   जो  मुस्कुराते     हैं,
आदमी    वो     महान    होते        हैं.

मसालें     लेकर       अपने   हाथों   में,
अमन    के       पासबान     होते     हैं.

ताबे    परवाज़   जिनके    अन्दर    हो,
उनकी   ऊँची          उड़ान   होते     हैं.

राज़ कुछ तो  है   इस     तकल्लुफ का,
आप    क्यों        मेहरबान     होते   हैं.

शोज़-ए-ग़म    से   भरे   हुए    दिल  के,
पुरअसर        दास्तान        होते     हैं.

ज़ेरपा       बरिया          नशीनों      के,
ए     जमीन-   आसमान       होते    हैं.

टूटते  हैं        कलम   से       शमसीरें,
वैसे   ए           बेज़बान   होते         हैं.

मुझको भी उनपे  कुछ शक है, "रजनी"
वह      भी कुछ   बदगुमान     होते हैं.