सोमवार, जनवरी 24, 2022

साथ चलते क़दम को मिलाओ कभी

   ग़ज़ल

साथ चलते क़दम को  मिलाओ कभी
बढ़  रहे  फ़ासलों को  मिटाओ  कभी

 ढाल बन कर   रहें जो  दुआ की  तरह 
 उनके सजदे में सर को झुकाओ कभी

 दो घड़ी  भी  किसी की जगा दे  अना
 वो समां  इस तरह  से जलाओ  कभी 

 आपका  साथ  है  कारवां  की   तरह
 हाँ   यही  तुम  भी  गुनगुनाओ  कभी

रूठ  जाने  का  तुमसे  दिखावा  किया
पास  आकर  हमें  तुम   मनाओ  कभी 

खो  गया  इस जहां से  अमन का  निशां
गीत  कोई  अमन  का   सुनाओ   कभी 

 बेसबब   टूट कर  ये   बिखर    जाएँगे
 हौसलों  को   नहीं  आज़माओ   कभी
  
सुन   जिसे   गुनगुनाते    रहें  उम्र    भर
साथियों   को  ग़ज़ल  वो सुनाओ  कभी

"डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर"
      बोकारो थर्मल,झारखंड

शुक्रवार, दिसंबर 31, 2021

यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम



  कहाँ रह गये हो चले आओ  हमदम

  यहाँ  सर्दियों का गुलाबी  है  मौसम


  दिसम्बर  महीना  कड़ाके   की  सर्दी

  गिरा कर के पारा दिखाती है दमख़म

    

  घने कोहरे   में  वो  सूरज   छिपा  है

  धरा पर बिछी शाख़ फूलों पे शबनम


   रजाई  के अंदर  दुबक  कर रहें  हम

   मिले गर्म  कॉफी यही चाहे   आलम


   हवाएँ ये ठंडी  लगें जब भी तन  को     

   ये नश्तर सी चुभती करें साँसें  बेदम

   


   "डॉ" रजनी मल्होत्रा नैय्यर

       बोकारो थर्मल

गुरुवार, दिसंबर 30, 2021

अज़ीयत रसाँ है सफ़र ज़िन्दगी का

 पीछे नहीं  हटती कभी  इम्दाद से

मैने  हुनर ये परवरिश में  पाया  है

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मतला व शेर ....


आँखों से ग़म ढल जाता है 

एक पल ऐसा भी आता है 


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दुःखों के  साये  सदा  साथ  तो  नहीं  होते

 वो आ तो जाते हैं लेकिन चले भी जाते  हैं


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कभी समझ ही नहीं सके  हम, न जाने  कब कैसे हो गया ये

तुम्हारा कब्ज़ा हमारे दिल पर ,हमारा कब्ज़ा तुम्हारे दिल पर

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बंद  हो     पड़ा  जैसे   सीप में     रखा गौहर

आपने  मुझे  भी  महफ़ूज  कर   दिया   ऐसे    

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देखा सुहानी  झील में जब नाव का सफ़र     

  डल झील का सफ़र वो मुझे याद आ गया

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हमारी तिश्नगी  को   वो कभी  समझें नहीं   शायद

हमारी  आरजू   ये है   कि बस   दीदार   हो   जाये

कभी   माँगा  नहीं   मैने  समंदर  दे   मुहब्बत   का 

मिले क़तरा भी गर मुझको मुक़म्मल प्यार हो जाये 


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कट रहा इस ज़िंदगी का हर सफ़र आराम से

कुछ अज़ीज़ों  की दुआएँ काम आयी हैं  सदा


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 उस बात को तुम याद मत करना कभी 

  बरसों लगे जिस बात को भूल जाने  में 

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 इसी बहर पर 

  रिसने  लगे हैं ज़ख़्म  फिर  हो   कर  हरे  

  अरसे लगे  जिस चोट  को भर  जाने  में 

  

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नहीं राह आसां किसी  के लिए  भी

अज़ीयत रसाँ है सफ़र ज़िन्दगी का


अज़ीयत रसाँ-- कष्टदायक

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ज़िंदगी  जब   मुख़्तसर  है तो  दुआएँ  ये  करें

ज़िंदगी जितनी मिली कुछ नेक काम कर चलें

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.मतला 1 शे'र


आँखें  रोयी और कभी मुस्काई  होगी

याद मेरी जब तुझको  भी आयी होगी

दिल का शोर दबाया होगा  दिल में ही

वस्ल की यादें होंगी  जब  तन्हाई होगी

"डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर"

सोमवार, नवंबर 22, 2021

दुःखों के साये सदा साथ तो नहीं होते

 कुछ शेर ..व मतला 

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दुःखों के  साये  सदा  साथ  तो  नहीं  होते

वो आ तो जाते हैं लेकिन चले भी जाते  हैं

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  मतला

मिटाने मन की हर  उलझन चले आओ

 सनम  अब  थामने दामन  चले  आओ

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इस तरह  तेरी  कसौटी अब  नहीं  मंजूर  है  

 ज़िंदगी कह दे मुझे अब आज़माना हो  गया

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पीछे नहीं  हटती कभी  इम्दाद से

मैने  हुनर ये परवरिश में  पाया  है

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आँखों से ग़म ढल जाता है 

एक पल ऐसा भी आता है 

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काट ली शबे-फ़ुर्क़त आपकी ही यादों  में

आपकी ही यादों संग वस्ल  के लिए  रोये

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"डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर "

             बोकारो थर्मल झारखंड

बुधवार, नवंबर 03, 2021

शुभ दीपोत्सव


हर घर में जले  दीप न  हो कोई सवाली

हिल मिल के मनाएँगे सभी लोग  दीवाली

"डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर "

रविवार, सितंबर 26, 2021

आज बेटी दिवस पर संसार की सभी बेटियों को मैं अपना ये गीत समर्पित करती हूँ


ज़मज़म के पानी सी पावन,गंगाजल सी निर्मल  है

ख़ुशियों का सागर है बेटी , बेटी  है तो  ही कल  है 


बिन इसके जीवन   सूना, जैसे  ग़मों का  क्रंदन  है

ये है दिल की धड़कन सी ,जैसे साँसों का स्पंदन है

रिश्तों की मीनारें  इनसे ये झरनों की कल-कल  है

ख़ुशियों का सागर  है बेटी, बेटी  है तो ही  कल  है


ईश का दिया वरदान है बेटी,अधरों की मुस्कान है

महादान का पुण्य दिला दे,ये वो अमोघ सामान है

तपती धरा में शीतल छाया मरुभूमि में ये  जल  है

ख़ुशियों का  सागर है  बेटी, बेटी है तो  ही कल है


इसकी साँसों की माला पर इसका ही अधिकार है

ये मानव की जननी , इससे  मानव का  विस्तार है

करुणा,स्नेह,त्याग से भरकर मन बेटी का निश्छल है

ख़ुशियों का सागर  है  बेटी, बेटी  है तो  ही कल  है


जिसे भूलना आसान नहीं, उसी बात का संज्ञान नहीं

पूजी जाती थी नारी यहाँ, पर अब वो हिंदुस्तान नहीं

कंटक, खार भरा बेटी  के जीवन का अब हर  पल है

ख़ुशियों का सागर  है बेटी , बेटी  है तो  ही  कल  है


डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर

बोकारो थर्मल (झारखंड)

मंगलवार, सितंबर 14, 2021

कुछ शेर


अक्स अपना देखने को चाँद जब बेताब  था

आइना बन आ गया दरिया तब उसके  सामने

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आज यादों के दरीचे को खुला रहने दिया 

 साथ बीते पल सुहाने  चलचित्र से आ गए

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मुहब्बत के लिए मख़्सूस है बारिश का मौसम ही

सजन आजा चला  जाए न ये बरसात का  मौसम

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नचाती है सभी को ज़िंदगी ये

तमाशाई  बने  सब  देखते   हैं

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तू दे कभी  गुलाब मुझे इंतज़ार  है

इज़हार मैं करूँगी तुझे इंतज़ार 


"डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर"

  बोकारो थर्मल झारखंड 




एक क़ता हिंदी दिवस पर...

 


लेखनी का गान  हिंदी

आपकी पहचान हिंदी

चेतना औ ज्ञान  इससे

वाणी का वरदान हिंदी

"रजनी"

रविवार, अगस्त 29, 2021

ग़ज़ल

 ख़ुशियों के  साथ  मेरा  आशियाना हो  गया

 दर्द दरिया बन बहा औ मुस्कुराना हो  गया


 रास अब  आने लगा  है  साथ होना  आपका

 आप  नज़राना मिले  दिल शायराना हो  गया 


छल रहा था ये जहाँ मुझको परख  के नाम पर   

की पलट कर वार तो  दुश्मन ज़माना  हो  गया 


 ज़िंदगी  तेरी     कसौटी अब  नहीं   मंजूर   है  

 ज़िंदगी कह दे  मुझे  अब  आज़माना हो  गया 


मत दुहाई   दो  किसी   को  साथ  के   नाम  पर

साथ रह कर जब  कठिन रिश्ता निभाना हो गया  


"रजनी मल्होत्रा नैय्यर 

बोकारो थर्मल (झारखंड)

सोमवार, अगस्त 09, 2021

राम वन गमन





दशरथ के घर पुत्र रूप में जन्म लिए थे रघुवर जी

एक घड़ी फिर ऐसी आई हुए राम जी  वनवासी


अवधपुरी में सभी ओर बस राम राज की थी चर्चा

किया मंथरा की बातों ने मन भारी कैकेई का

 कोपभवन में हारे राजा और हुईं विजयी रानी

 एक घड़ी फिर ऐसी आई  हुए राम जी वनवासी




पुत्र धर्म का पालन करने चले राम जी वन में रहने

और संग में पत्नी सीता साथ अनुज लक्ष्मण भी चले

मात-पिता गुरु और महल सँग छोड़ी अपनी नगरी 

एक घड़ी फिर ऐसी आई  हुए राम जी वनवासी




हाथ जोड़कर जन-जन करते श्रीराम जी का वंदन 

मत जाओ वन मत जाओ वन मत जाओ हे रघुनन्दन 

चौदह वर्ष नयन तरसेंगे प्रभु दरस के  अभिलाषी 

एक घड़ी फिर ऐसी आई  हुए राम जी  वनवासी



 क्या अंतर नारायण नर में नियति बड़ी दुखदायी है

 भटक रहे वन-वन भाई द्वय दशा दुखी रघुवर की है

 सभी राजसी भोग छोड़कर रीति संत की अपनायी

 एक घड़ी  फिर  ऐसी आई  हुए राम जी  वनवासी



लंकापति ने रची योजना हरण सिया का करने की 

और लक्ष्मण की रेखा से बाहर निकलीं सीता जी 

लंकापति ले उनको भागा विकल हुए जग के स्वामी

एक घड़ी  फिर ऐसी आई  हुए राम जी  वनवासी



 राम लखन जब सिया खोज में किष्किंधा तक आ पहुँचे

महाबली बजरंगबली अपने प्रभु से तब वहाँ मिले

मूर्छित हुए लखन जब युद्ध में तो घबराए अवतारी

एक घड़ी  फिर ऐसी आई  हुए राम जी  वनवासी




रावण का वध किये रामजी हुआ युद्ध भीषण भारी

राम लौटकर वापस आए हर्षित  हुए अवध  वासी

जगमग-जगमग  दीपों से तब हुई अवध की गली गली

एक घड़ी  फिर ऐसी आई  हुए राम जी  वनवासी


"रजनी मल्होत्रा नैय्यर

बोकारो थर्मल झारखंड