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गुरुवार, सितंबर 08, 2011

अब तो टूट कर बिखरने की चाहत है

   तुझे मुझसे जितनी  नफरत है,
  तेरी उतनी ही  मुझे  जरुरत है.

 मिसरी भरी निगाहें ही मीठी नहीं होती,
 तेरे अंगार भरे निगाहें भी खुबसूरत हैं.

 कैसे कह दूँ कोई खैर करता नहीं,
 इस नफरत में जलना तेरी प्रीत या फितरत है.

घिरे हों जब आँखों में अविश्वास के बादल,
हर अच्छी बातें भी लगती बदसूरत हैं.

जो ख्वाब बुनते हैं हम लगन से,
वो टूट कर भी रहते खुबसूरत हैं.

जानती हूँ कोई तोड़ नहीं पायेगा,
फिर भी तुमसे टूटना मेरी किस्मत है.

बंध कर और नहीं रहा जायेगा,
अब तो टूट कर बिखरने की चाहत है.

डूब रही मेरी कस्ती तेरे ही हाथों,
ये जानकर भी डूबना मेरी जरूरत है.

जितनी तुझे मुझसे नफरत है,
तेरी उतनी ही मुझे जरुरत है|

सोमवार, अगस्त 29, 2011

आओ मिलकर क्यों ना तुम सागर हो जाओ,

ये अंश लिखने से पहले मन में बहुत से ख्यालात आये नारियों की आज
भी सामाजिक सिथित दयनीय देख कर मन कुंठा से भर गया जब कुछ नारियों के
मुंह से सुनी उनकी व्यथा तो सारा आक्रोश उन्ही पर आता है क्योंकि ख़ुद वो
कहती हैं हम क्या करें औरत जो ठहरे ..........

...

शीर्षक   " आओ मिलकर क्यों ना तुम सागर हो जाओ "

नारी की त्याग, शील, और ममता ने नारी को एक ऊँचा स्थान दिया ,जिसे
मनीषियों ने कवियों ने अपने अपने शब्दों में कहीं  सराहा और उसे कहीं
देवों  सा स्थान दिया , तो कहीं उसके आंसुओं  को , बेबसी को उसकी कमजोरी
समझ कर लाचार  अबला नारी तक की संज्ञा दे दी |
." यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता " .   "नारी तेरी यही
कहानी...छाती में है दूध आँखों में है पानी " .....कभी  " नारी तुम केवल
श्रद्धा हो "क्या किसी भी कवियों ने लिखी  उसकी मानसिक पीड़ा को |
 बार बार त्यागमयी, सहनशील  और शांत कह कह कर नारी की शक्ति को कमजोर
किया जाता रहा है, वो त्यागमयी है क्योंकि वो अपनों की खुशियों में लूट
कर भी विजेता है. वो सहनशील है क्योंकि धरा की तरह है,  शांत  रह कर वो
कई कलह को विष की तरह पी जाती है .बेकार का बखेड़ा नहीं खड़ा करना चाहती,
घर की सुख शांति के लिए वो शांत रह जाती है क्योंकि वो पुरुषों से ज्यादा
विवेकशील है, पर इन्ही गुणों को  कतिपय  लोग    कतिपय   कारणों से नारी
की शक्ति को कमजोर समझने लगे और समाज में नारी का स्थान धीर धीरे कुचलते
हुए पूरी तरह दमित करने का प्रयास करने लगे जिससे समाज में हर गलत
,वाहियात और जितने भी पाबंदियों वाले नियम कानून समाज ने बनाये वो लागू
हो गए नारी पर | जब नारियों ने बार बार हो रहे अत्याचार पर विरोध कर
विद्रोह अपनाने शुरू किये तो समाज के ठेकेदारों ने उन्हें लज्जित करना
शुरू कर दिया . और कितनो ने तो घिनौनी हरकत की अंतिम सीमा भी पार कर दी |
शुरुआती  दौर पर कुछ कम ही नारियों में ये साहस था की वो समाज के इस गलत
नियम के विरुद्ध आवाज उठाये ,पर जिन्होंने कोशिश की उन्हें कठिन तौर पर
मानसिक पीड़ा भी झेलनी पड़ी , अपने ऊपर हो रहे अत्याचार को वो गलत जानकार
भी चुपचाप अपना भाग्य समझकर सहती आई है | यहीं  पर उसने पहली गलती की
क्योंकि  अत्याचार करनेवाले की तरह अत्याचार सहनेवाला भी दोषी है |

" यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता " .   "नारी तेरी यही
कहानी...छाती में है दूध आँखों में है पानी " .....कभी  " नारी तुम केवल
श्रद्धा हो "
ये सारे प्रसंग केवल नारी को उपरी संतोष देते हैं उसकी मानसिक पीड़ा को
क्या किसी भी कवियों ने लिखी मनीषियों ने सोंचा भी ना होगा जिस नारी की
जिस शक्ति की  वो गुणगान कर रहे  हैं , एक दिन उन्हें जिन्दा जलाया जायगा
, कभी सती होने के नाम पर , कभी दहेज़ के नाम पर ,कभी पैदा होने से पहले
ही मार कर |


 जब अर्धागिनी का मतलब ही  होता है आधा, आधा.
कर्मो में,अधिकारों में क्यों  नारी को कम मिले पुरुषों को  ज्यादा.
वो सारे झूठे बंधन के डोर को ,तोड़ने पर हो जाओ तुम  आमादा,
 "रजनी नैय्यर मल्होत्रा  "


वो कोमल है फूलों  के जैसे, वो चंचल है नदियों के जैसे , सहनशील है  धरा
के जैसे ,वो भोली है मूरत के जैसे,  शांत है समुद्र के जैसे , समुद्र में
लहरों के आने से तूफान का खतरा होता है. जिस दिन ये अहसास हो जायेगा
विश्व की हर  नारी को अपना अधिकार और सम्मान मांगना नहीं होगा वो ख़ुद पा
लेगी ,

" आओ मिलकर क्यों ना तुम सागर हो जाओ ,
 कब तक बहती रहोगी नदी नालो की तरह. " रजनी  नैय्यर मल्होत्रा


मरहम की जरुरत नहीं पड़ती जहाँ एक सी पीड़ा हो,
भर जाता है वो ज़ख्म बस छू जाने से  "रजनी नैय्यर मल्होत्रा  "

हर स्त्री के लिए  एक बात कहना चाहूंगी अपनी हक़ के लिए तुम भी जाग जाओ,
कुछ सीख लो देख चींटियों की कतारों से ....

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
बोकारो थर्मल  झारखण्ड "








गुरुवार, अगस्त 18, 2011

ये , रौशनी और दीया सलाई

   स्वास्थ्य खराब रहा ,  काफी दिनों बाद ब्लॉग  पर आई हूँ आपसभी के रचनाओं  से वंचित  रही .......... 


ये रौशनी , और  दीया  सलाई ,
सब मिलकर भी नहीं मिटा पाते हैं ,
अंतस के अंधकार को ,
अंतस  के बंद कमरों को ,
रोशन करने के लिए ,
नहीं पहुँच पाते चाह कर भी बाहरी उजाले ,
घेर रखी है एक चहारदीवारी सी ,
जिसमे झाँकने का एक झरोका भी नहीं ,
दरवाजे तो होते हैं पर बुलंद ,
जो खुलते हैं सिर्फ मन के दस्तक देने से ,
बाहरी रौशनी की छुअन या आघात,
नहीं हिला पाती है अंतस के दीवार को , 
किवाड़ को,
और  जरुरत ही  क्या है ?
दीया सलाई की.
अंतस के कमरे तो ख़ुद ही चेतना के जागने से ,
जल उठते हैं ,
और मन
नहा उठता है ,
रौशनी की जगमगाहट से .


मंगलवार, जून 28, 2011

चश्म -ये- जहाँ की जो मिली चिलचिलाती धूप

" चश्म -ये- जहाँ की जो मिली चिलचिलाती धूप,
कसीर-ये-रफ़ाकत के वादे टूट जाते हैं,
आतिश -ए  - सहरा होती है सादिक ,
वो तो उड़ ही जाती है लगाकर परवाज ."


चश्म -ये- जहाँ -- जमाने की नज़र , कसीर-ये-रफ़ाक -- गहरे याराने , आतिशे - सहरा-- जंगल की आग ,सादिक - सच्ची बात, सच्चाई ,परवाज-- पंख.

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

रविवार, जून 12, 2011

कर्तव्यों के बोझ तले, दोनों ही गिरवी हैं

देर से आने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ आप सभी के ब्लॉग पर नहीं जा सकी ,काफी दिन तक ब्लॉग परिवार  से दूर रही परीक्षाएं चल रही थीं .अब धीरे धीरे सबके ब्लॉग पर जाना हो पायेगा ...



कर्तव्यों की डोर से बंधी सांसें,
हर पल धड़कती हैं ,
धड़कनों पर बंदिश नहीं
इंसान का,
समय चक्र के सुइयों के साथ,
वो बंधी है,
क़दम   भागते,दौड़ते,
हाथ भी मशीनों से,
हर पल देते हैं धड़कन का साथ,
क्योंकि,
कर्तव्यों के बोझ तले,
दोनों ही गिरवी हैं ,
चाहे वो जिस्म हो या धड़कन.

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा."

रविवार, मई 22, 2011

मेरे प्रियतम


जिसे देखूं पल ,पल ख्वाबों में,
जिसे सोंचे मन ख्यालों में,
कोई और नहीं ,वो हो तुम.
मेरे प्रियतम ,प्रियतम, प्रियतम.

अश्कों के नीर बहायें हम,
नैनो के दीप जलाएं हम.
पथ आलोकित करने को तेरा,
 सलभ सा जलते हैं हम.

जिस लम्हा तुमको पाते हैं,
हम कितना ही हरसाते  हैं.
मन के कोमल बागों में,
कितने ही सुमन मुस्काते हैं.

सूखे अधरों की प्यास हो तुम,
मेरे जीने की आस हो तुम.
जिस मंजिल की मै राही हूँ,
वो मंजिल वही तलाश हो तुम.

जिसे देखूं पल ,पल ख्वाबों में,
जिसे सोंचे मन ख्यालों में,
कोई और नहीं ,वो हो तुम.
मेरे प्रियतम ,प्रियतम, प्रियतम.

भर गया अंक तरंगों से,
प्रफुलित है मन उमंगों से.
आरम्भ हुआ है दिवस मेरा,
तेरे प्रेम के नव रंगों से.

रंजों का तिमिर भगाया है,
उल्लास को मन में जगाया है.
मै काया हूँ,तू काया की साया है.

जिसे देखूं पल ,पल ख्वाबों में,
जिसे सोंचे मन ख्यालों में,
कोई और नहीं ,वो हो तुम.
मेरे प्रियतम ,प्रियतम, प्रियतम.

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

रविवार, मई 08, 2011

प्यारी माँ

"माँ की आँचल में सारा आसमां समा जायें ,ऐसी विशाल हृदय व् कोमल भावन होती है माँ,
इनके आशीष से विपदा छू ना पाए, हर शय से बड़ी दुनिया में होती है माँ ,प्यारी माँ ."

बुधवार, अप्रैल 06, 2011

"स्वप्न मरते नहीं "



काव्य संग्रह "स्वप्न मरते नहीं " मेरी पहली  पुस्तक प्रकाशित होकर आ गयी है .

स्वपन मरते नहीं,
कुछ क्षीण हो जाते हैं,
हाँ आशान्वित होकर,
उस टूटे सपनो से,
अधीर होते हैं हम,
पर,
उस अधीरता में भी जो,
धीरज ना खोते हैं,
वो बिखर कर भी,
अपने मुट्ठी में,
अपने ख्वाबों का जहाँ ko,
हकीकत में,
साकार कर लेते हैं.
 
 
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

मंगलवार, अप्रैल 05, 2011

तुम्हारे बगैर

कई बार,
अनगिनत प्रश्न किये
प्रियतम ने,
प्रेयसी  से|
क्या वजूद है ?
हमदोनों  के बीच
जो बंधी डोर है
आत्मिक .शारीरिक, 
या फिर मन से ,
मन का बंधन ?
कुछ पल मौन
सुनती रही
अपने प्रीतम की
बातों को |
फिर कुछ क्षण
रुक कर कहा 
निष्प्राण थे,

मेरे 
आत्मा,तन और मन,
पर ,
तुम्हें   पाने के बाद
झंकृत हो गए हैं
मेरे रोम -रोम पुलकित होकर ।
तुम्हीं   कहो ?
क्या वजूद है मेरा,
तुम्हारे बग़ैर | 

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
 

शनिवार, मार्च 12, 2011

कर्म भाग्य बनाता है. बेटों का भी और बेटियों का भी.

एक वक़्त था
जब मेरे जन्म पर
तुमने कहा था 
कुल्क्छिनी
आते ही
भाई को खा गयी |
 माँ तेरी  ये बात 
मेरे बाल मन
में घर कर  गयी
मेरा बाल मन रहने लगा
अपराध बोध से ग्रस्त 
पलने लगे कुछ विचार , 
क्या करूँ ऐसा ?
जिससे तेरे मन से
मिटा सकूँ मैं 
वो विचार 
 कम कर सकूँ
तुम्हारे
मन के अवसाद को |
वक़्त गुजरते गए
ज़ख्म भी भरते गए
फिर आया
एक ऐसा वक़्त
जब तुमने ही कहा
बेटियां कहाँ पीछे हैं
बेटों से
वो तो दोनों कुलों  का
मान बढाती   हैं ।
माँ 
शायद तुम्हें  भी
अहसास हो गया
क़ि जन्म नहीं
कर्म भाग्य बनाता है 
बेटों का भी,
और बेटियों का भी ।
   
 " रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

सोमवार, मार्च 07, 2011

नारी तेरे रूप अनेक


महिला दिवस पर समस्त नारी जाति को हार्दिक शुभकामनायें .............

ये रचना मेरी प्रथम काव्य संग्रह "स्वप्न मरते नहीं " से ली है


नारी निभा रही है हर जिम्मेवारी,
कैद ना करे इन्हें घर की चहारदीवारी,
कंधे से कंधा मिलाकर,
कम की है इसने,
पुरुषों की जिम्मेवारी,
जीवनसाथी बनकर,
पूरी करती अपनी हिस्सेदारी,
कभी रूप सलोना प्यारा लगे,
रहे शांत समुंद्र सी न्यारी,
अगर जरुरत पड़ जाये ,
ये बन जाये चिंगारी,
कभी दूध का क़र्ज़ निभाने को,
कभी माँ,बहू, बहन का फ़र्ज़ निभाने को,
पल पल पीसी जाती रही नारी,
हर कदम इम्तिहान से गुजरी ,
फिर भी उफ़ ना मुख से निकली,
ये तो महानता है इसकी,
जो दिखती नहीं इसकी बेकरारी,
आधा रूप बदला इसने जो,
समाज का अक्स सुधारी,
तुलना करोगे किससे ?
हर कुछ छोटा पड़ जायेगा.
ममता की गहराई मापने में ,
सागर भी बौना खुद को पायेगा.
ये अनमोल तोहफा है,
जो कुदरत ने दी है प्यारी,
हर मोड पर फिर क्यों ?
बुरी नज़रों का करना पड़ता है ,
सामना इसे करारी.
ये क्यों भूल जाते हो ?
तुम्हें संसार में लानेवाली भी,
है एक नारी.
चुटकी भर सिंदूर को ,
मांग में सजाती है,
उसका मोल चुकाने को,
कभी कभी ,
जिन्दा भी जल जाती है नारी.
हर जीवन पर करती अहसान,
फिर भी ना पा सकी सम्मान.
नारी निभा रही है हर जिम्मेवारी,
कैद ना करे इन्हें घर की चहारदीवारी.

"रजनी मल्होत्रा नैय्यर "

धरा अम्बर एक हो गए

आकाश बरस  कर
निरभ्र हो जाता है, 
मिल जाता  है
उसके रुग्णता को
एक शांत एहसास |
घुमड़ते हुए
बादलों के रूप में
मचलते रहते हैं
उसके मन में भी 
असंख्य सवाल |
 धरा का स्पर्श
देता है उसे असीम धैर्य
बूंदें  पानी की
आकाश से आ
ज़मीं  पर
ऐसे मिल जाती हैं
मानो हो  एक सीमा रेखा
जिसके पाटने से
धरा- अम्बर एक हो गए |
 मनुज मन भी
जब व्यथित,भ्रमित 
बरसने की चाह में
हो जाता है  गुमराह
पाने को 
एक स्पर्श कांधे पर 
जिसपर टिककर
उसके मन का आकाश  भी
निरभ्र हो जाये  


 
 

सोमवार, फ़रवरी 21, 2011

मेरे शब्द ,मेरे विचार .

मेरे शब्द ,मेरे विचार .


जिस दिन ये भरम टूट जायेगा उस दिन हम भी बिखर जायेंगे तिनके के जैसे .
तो अच्छा है हम भी इसी भरम में खुश रहें , जिसमे दुनिया खुश रहती है|
"मेरे पास सब कुछ है "


अपनी गलतियों पर पर्दा डालने से अच्छा है उन्हें बखूबी स्वीकार कर सुधारा जाये |

एक के कदम  "हजारों के रास्ते बनते हैं " तो क्यों न हम  " हर रोज़ एक नयी राह  बनाएं |

जिस शक्ति (नारी ) की जयगाथा पुरानो में शोभ रही थी, 
आज अपनी ही कमजोरी से वो कहीं कहीं शक्तिहीन है (नारी) 

अपनी कमजोरी को और कमजोर न बना कर, उसे अपनी शक्ति बनाओ 
फिर    "तलवार भी तुम और  ढाल भी तुम"  |

सही अर्थ में पुरुष वही है जो अपने बल का प्रयोग असहायों के सहयोग के लिए करें,
न की निर्बल व् अबला पर बल आजमा कर |

कहते हैं आँसू  हमें कमजोर बनाते हैं, नहीं ये हमें और मजबूती प्रदान करते हैं अपने लक्ष्य को पाने की "|

हर राह आसान होगी "बस संकल्प पक्का होना चाहिए "

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा " 

गुरुवार, फ़रवरी 17, 2011

विवाह के बारहवे वर्षगांठ पर

विवाह के बारहवे वर्षगांठ पर राजेश को ..........


तुम्हारे साथ लिए,
सात फेरे,
व् सात वचन ,
के साथ
बारह वर्ष ,
गुजर गए.
पर ,
सारे वचनों के मोल,
मैंने ही निभाए ,
तुमने तो,
 जो वक़्त बीते,
उन्हें निभाया नहीं,
बस गुजारा है.
फिर भी ,
ये कामना है ,
अब आनेवाला हर पल,
हमारे विवाह के ,
सात फेरों व्
सात वचनों की तरह,
पूरी मजबूती से  ,
गठबंधन की तरह ,
बंध जाये.
एक दुसरे के प्रति,
प्रेम, विश्वास ,
समर्पण के साथ.
जिस अग्नि को ,
साक्षी मानकर ,
हमने जीवनसाथी,
बन आजीवन ,
साथ निभाने की ,
कसमे उठायी थीं.
ये गठबंधन ,
किसी भी हालात में,
ना टूटे.
ना ही ,
क्रोध की अग्नि में ,
भस्म हो.
ये शिकायत  नहीं तुमसे,
तुम तो सदा ही ,
निन्यानबे के चक्कर में ,
पड़े रहे,
शायद हमारा फेरा ही ,
निन्यानबे का पड़ा.
क्योंकि ,
उस दिन ,(१८ -२-१९९९)
अठारह फरवरी उन्नीस सौ निन्यानबे था .
चाहती हूँ ऐसे रहना,
तेरे साथ,
जैसे गुलाब में उसकी खुशबू.

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

बुधवार, फ़रवरी 16, 2011

जिसके घर में , कदम पड़ते ही

उसके
घर में   क़दम  पड़ते ही
मेरा धर्म भ्रष्ट हो गया
ये कह कर
वो स्नान को चली गयी |
उसने छुआ जिस  वस्तु को
उसमे गंगाजल डाल
कई बार धोती रही |
अचानक एक दिन
समाचार मिला
तेरा बेटा गिर पड़ा है
सड़कों पर |
वो बदहवास भागी,
तेज़ धूप और गर्मी के मारे
वो बेहोश हो गया था ,
उसने आनन् फानन में
दिया अपने पल्लू से हवा ...
तभी किसी ने कहा
इसे पानी पिलाओ
और,
जिसके घर में
क़दम  पड़ते ही
धर्म भ्रष्ट हो रहा था
आज उसी की हाथों से
पानी पीकर
उसका बेटा
नया  जीवन  पा गया |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

शुक्रवार, फ़रवरी 11, 2011

१४ फरवरी वेलेंटाइंस डे’ प्रेम दिवस

युवा पीढ़ी  दौड़ रही प्रेम दिवस मनाने में,
पाश्चात्य के पीछे अपनी संस्कृति भुनाने में.

स्कूल कालेज बंद आज, पर भीड़ लगी उद्यानों में,
लगे क़तार  में खरीदारी  को फूलों के दुकानों में.

१४ फरवरी वेलेंटाइंस डे’ प्रेम दिवस,
 क्या कहें युवाओं, इसे सर दर्द या प्रेम रस.???

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

सोमवार, जनवरी 31, 2011

ये आईना

एक पुरुष
एक स्त्री को
भददी- भददी
गालियाँ  दे रहा था
और  निरंतर
उस स्त्री की
पिटाई कर रहा था |
कुछ लोग,
जिनमें  स्त्रियों की
संख्या   ज़्यादा    
 थी
पास से देखते
आपस में कहते रहे,
ये पति- पत्नी का
मामला है
हमें इससे क्या ?
ये  कुछ भी करें !
सभी
ये कह वहां से
खिसक गए ।
कुछ दिनों बाद
पत्नी,
पति को
अपने हाथों से
खिला रही थी
अपने घर के
 प्रांगन में ।
तभी,पड़ी
उनदोनों  पर
एक
पड़ोसन की नज़र ,
ये देख आसपास
चर्चे फ़ैल गए
कितने बेशर्म  हैं
ये लोग ,
क्या पति- पत्नी को
ऐसे रहा जाता है ?
ये  आईना है
हमारे सभ्य
समाज का
जिसमें
हम रहते हैं ।



"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"




शुक्रवार, जनवरी 28, 2011

बेटी होना गुनाह है ?

बेटी माँ से :
बेटी होना गुनाह है ?
माँ ,
बस  तीन बातें याद रख .....
भगिनी ,
भोग,
भरण.
 तू इसी लिए
पैदा हुई है | 
 बेटी ने कहा
ये ठीक नहीं माँ
मुझे
ये बंधन  नहीं,
ख़ुद का
फैसला भी चाहिए,
जो मुझे
अपने रूप से जीने दे
माँ :
अच्छा होता
ये कुल कलंकिनी
पैदा ही ना लेती |
तू तो ,
नारी  जाति के ,
नाम पर
कलंक है
जो वर्षों से
चली आ रही
इस
मर्यादा को
तोड़ने पर
उतारू है |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

मंगलवार, जनवरी 25, 2011

(फिर भी कहती हूँ जननी हूँ)

बालिका दिवस पर एक अजन्मी लड़की की व्यथा  (फिर भी कहती हूँ जननी हूँ)

जन्म लेकर क्या करूँ मै,
तुम्हारे इस संसार में.
क्या दे सकोगे ?
मुझे ख़ुद सा जीने का अधिकार,
अन्यथा करते रहोगे,
तमाम उम्र  ,
हर रिश्तों में मेरा व्यापार.
 हर साँस बस ,
घुट कर ही जीना ज़िन्दगी ,
तो,
अच्छा है मुझे ,
जन्म से पहले ही मार दो.
आ जाऊं इस संसार में तो ,
मांगूगी अपना अधिकार.
जब भी अधिकार के लिए ,
आवाज़ मैंने उठाई,
जन्मदाता ने ,
एक ही बात दुहराई.
क्यों पढ़ाया चार अक्षर इसे,
रहती ये भी अनपढ़,
ना दिखाती ये आँखें,
ना रहते ऐसे तेवर.
चुप्पी और सहनशीलता ही,
ऐ  लड़की तेरे ज़ेवर .
क्या तेरी माँ,दादी ने कभी ,
ऊँची आवाज़ लगायी,
किया किसी ने विरोध कभी ,
मर्दों के फैसले पर.
फिर क्यों तू ?
फैला रही अपने कटे हुए पर.
जब भी अधिकार के लिए ,
आवाज़ मैंने उठाई,
विरोध किया जब भी ,
किसी अनर्गल बातों का,
तो झट कह दिया जन्मदाता ने,
बेटी न  पैदा लेती,
या  पैदा लेते ही मर जाती.
इसके ऐसे  कर्म से तो ,
कुल की मर्यादा ना जाती |
फिर भी कहती हूँ जननी हूँ,
जन्म देने का ही नहीं,
इच्छित सांसो से ,
जीने का है अधिकार मुझे |
दे पाओ ये अधिकार,
 तो लाना इस संसार में,
आ जाऊं संसार में तो,
 मांगूंगी अपना अधिकार.

" रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

सोमवार, जनवरी 17, 2011

ख़ुशी हूँ मै.

चंचलता की मै मूरत हूँ,
लोग कहते हैं , मै खूबसूरत  हूँ.
बोलो कौन हूँ मै ?
ख़ुशी हूँ मै.

जिसके ज़िन्दगी में  ,
वो तो मालामाल है,
जिसके ज़िन्दगी से बाहर,
 वो तो कंगाल है.

हर कोई चाहता है,
मेरा  ज़िन्दगी में साथ.
तीखी जीवन में मैं मिठास हूँ,
सूखे अधरों की मै प्यास हूँ.
आसां नहीं,
हर ज़िन्दगी में मेरा आना,
क्योंकि,
ख़ुशी चीज़ ही है ,
मुश्किल से मिल पाना.

हर कोई जीवन में ,
मेरी तमन्ना रखता है,
भर जाये सागर  जीवन में,
ऐसी चाहत रखता है.
कोई तो मुझे पाकर,
सागर सा ज़िन्दगी जीता है,
जहाँ मै नही,
वो बूंद बूंद को रोता है,

मुझसे ही पूरी है ,
जीवन की कहानी,
बस जाऊं  मै जहाँ,
ना आये आँखों में ,
गम की पानी.

हर आँख की चाहत है ,
बस मेरे आंसू भरना.
चंचलता की मै मूरत हूँ,
लोग कहते हैं , मै खूबसूरत  हूँ.
बोलो कौन हूँ मै ?
ख़ुशी हूँ मै.

" रजनी नैय्यर मल्होत्रा "