गुरुवार, दिसंबर 03, 2009

बेमोल बिक गए, हम तो, तेरी , एक मुस्कान पर.

चाहता,
अगर मै तो,
तेरी,
हर कसम को ,
तोड़ जाता,

मिलने की,
बेकरारी,
इस कदर थी,

हर पहरे को ,
तोड़ जाता,

तुने ही,
रोका,
तेरे शहर ,
न आने को,

पर ,
मेरी ख्वाहिश से,
पहले,
तेरी खुशियाँ ,
देखी मैंने,

ना होता,
तेरा फिकर तो,
खरीदार,
बहुत थे,
बाज़ार में,

बिकने चला,
जाता,
पर,
बेमोल बिक गए,
हम तो,
तेरी ,
एक मुस्कान पर.

"rajni"

मैंने एक महल बनाया है ख़्वाबों का

मैंने एक,
महल बनाया है ,
ख़्वाबों का,
इसमें,
रंग भरे हैं ,
मेरे सपनों ने,
प्रेम की,
विश्वास की दीवारें हैं,
और,
चुलबुली सोंच,
ईसमें,
लहराते हैं ,
चिलमन बन कर,
इस महल में ,
मेरे साथ,
मेरे सपनों का,
शहजादा है,
जिसके साथ,
ताउम्र ,
इस महल में,
राज करने का,
दिल का इरादा है.

 "रजनी"

बुधवार, दिसंबर 02, 2009

क्या पा लिया तुमने हमको रुलाके ?

क्या पा लिया तुमने हमको रुलाके ?
क्या मिल गया तार दिल के हिला के?

टूट कर कुछ भी जोड़ना,
जब मुमकिन नहीं,

क्या पाओगे अब?
टुकड़े दिखा के,

बिखर गये जब धागे से मोती,
छीन गये जब दीप से ज्योति,

क्या जोड़ पाओगे अब ?
बिखरे हुए मोती.

क्या कर पाओगे रोशन ?
बुझी हुई ज्योति.

मंगलवार, दिसंबर 01, 2009

एक ख्वाब, एक ख्याल, एक हकीकत हो तुम,

एक ख्वाब, एक ख्याल, 
एक हकीकत हो तुम,
कैसे कहें,कितनी कहें,क्यों ?

मेरी ज़िन्दगी की, 
जरुरत हो तुम.

चल रहे मझधार में,
इस बेमाने संसार में,
 जी रहे हैं हम
गुमसूम,गुमसूम,गुमसूम
मेरी डूबती नैया की,
पतवार हो तुम,
मैं हूँ मझधार में,
मेरी किनार हो तुम.

इस गगन में,
रंगीं चमन में,
इस फिजां में,
हर एहसास में हो तुम.

मेरी यादों में,
मेरी सांसों में,
मेरे जीवन के ,
हर कोण पे ,
बसे इरादे हो तुम.

साथ चले,संग जले,
कुछ अरमान हैं,
दिल में पले,

अपनी अरमानों का ,
एक जाल हो तुम.

तन्हाई में,भीड़ में,हर जगह,
आने वाले ख्याल हो तुम.

जिसे सोंचें वो ख्याल हो तुम,
जिसे गायें वो ग़ज़ल हो तुम,
जिसमे जलें वो अनल हो तुम.

एक अनकही बात हो तुम,
न बुझे वो प्यास हो तुम,
ज़िन्दगी की मिठास हो तुम.

कैसे कहें,कितनी कहें,क्यों ?
मेरी ज़िन्दगी की, 
जरुरत हो तुम.

जो रुके न वो सफ़र हो तुम,
दिल में उठनेवाली लहर हो तुम,
जिसका  कभी ना डूबे रवि,
वो शहर हो तुम,

मेरी यादों में,मेरी सांसों में,
मेरे जीवन के हर कोण पे
बसे इरादे हो तुम.

"rajni"

सोमवार, नवंबर 30, 2009

ये प्रीत का सन्नाटा है, जिसकी ख़ामोशी में भी कोलाहल है

ये कैसा सन्नाटा है ?
जिसकी ख़ामोशी में भी कोलाहल है.

ये कैसा अमृत है ?
जिसकी हर घूंट में हलाहल है.

ये कैसा उदगार है ज्वालामुखी का ?
जिसके फटने से बस संहार ही संहार है.

ये कैसा ख्वाब है ?
जिसे बुनने को बेकल सारा संसार है.

ये प्रीत का सन्नाटा है,
जिसकी ख़ामोशी में भी कोलाहल है.

ये प्रीत अमृत है,पर
इसके हर घूंट में हलाहल है.

ये प्रीत एक ज्वालामुखी है,
जिसके फटने से संहार ही संहार है.

ये प्रीत एक सुहाना ख्वाब है,
जिसे बुनने को बेकल सारा संसार है.

ये प्रीत हर किसी के लिए नहीं आसान है,

किसी को मिल जाये तो वरदान है,
ना मिले तो अभिमर्दी है.

ये प्रीत का सन्नाटा है,
जिसकी ख़ामोशी में भी कोलाहल है|

रविवार, नवंबर 29, 2009

चाहत अगर पूरी हो जाए

चाहत अगर पूरी हो जाए,
तो चाहत ख़त्म नहीं होती,
और अगर वो ख़त्म हो जाए,
तो वो सच्चा प्रेम नहीं.

आसमां से गिरे कही नहीं बच पाते हैं

दिल जुड़ने न देना,
कभी किसी भी ,
हालत में,
जब टूट जाए ,
बड़ा दर्द देता है,
धड़कनों को झूठी ,
लगन ना लगे,
आसमां से गिरे,
कही नहीं बच पाते हैं.
कभी हसरतों को,
जागने ना देना,
टूट जाएँ तो ,
जीने ना देंगे ,
ये अरमा,
टूटी हुई कांच को ,
जोड़ना जैसे कठिन है,
टूटने पर,
जुडेंगे न ये अरमां.

"रजनी"

तेरी तारीफ में कितना लिखे कोई

तेरी तारीफ़ में कितना लिखे कोई,
कम ही लगता है जितना लिखे कोई,
ये उम्र तो कम ही लगने लगी,
सात जन्म भी कम लगे इतना लिखे कोई,
नशा में लिखू तो शराबी कहोगे,
बिन पिए ही लिखा है,
ऐसे लिखे जैसे सपना लिखे कोई,
गजल खुद ब खुद बन जाती है,
जब भी तेरा बोलना,तेरी आवाज़ लिखे कोई,
तुझमे और तेरी आवाज़ में वो जादू है,
तेरा रुकना और तेरा चलना लिखे कोई,
तेरी तारीफ में कितना लिखे कोई,
कम ही लगे जितना लिखे कोई,
किसी कि गजल में वो बात नहीं,
नया क्या लिखे, जब अपना लिखे कोई,
तेरी तारीफ में कितना लिखे कोई,
कम ही लगता है जितना लिखे कोई.

उन्होंने हमसे जुदाई मांग ली

इस कदर खुश हो गए उनपर,
कि बातों बातों में हमने कह दिया,

मांगलो हमसे जो चाहो आज,
उन्होंने हमसे जुदाई मांग ली,

और हमने इकरार भर दिया,

आँखें कह रही थी कुछ और,
होंठो ने कुछ कह दिया,

रो रहे थे दोनों,जिसे उन्होंने,
मेरा हँसना समझ लिया|

मत जला चिरागों को , मुझे अँधेरे में रहने की आदत है

मत       जला       चिराग़ों          को 
मुझे   अँधेरे में  रहने   की  आदत   है,


खीच  ले  क़दम    धंसने       से   पहले,
मुझे  दलदल   में रहने   की   आदत  है,


बन     चुका     अभिशाप     मेरे    लिए,
जो      तेरे       लिए      इबादत       है,


जिन्हें सोच रहे  कंटक, मेरे लिए प्रसून  हैं,
मुझे काँटों से    भी  निभाने की आदत   है.


छेड़      समुंदर      की     लहरों       को,
क्यों      तूफान    को    दावत   देते    हो,

छेड़     के     बाम्बी     को,    विषधर  की,
क्यों   गरल    की    चाहत     लेते      हो,

जो    जलकर    धुआं  -  धुआं    हो   गया,
क्यों   उसमें  , मिटने   को  उद्धत   होते  हो,

मत          जला        चिराग़ों             को ,
मुझे    अँधेरे    में   रहने   की   आदत   है|