सोमवार, फ़रवरी 21, 2022

है लगे आज जुगनू भी महताब सा

 एक ग़ज़ल हाजिर है मित्रों 🙏😊


अश्क़ आँखें बहाती  रही    रातभर

याद   तेरी   सताती   रही   रातभर


प्यार से  लग  गले ओस कचनार के

साथ में  खिलखिलाती रही  रातभर


है  लगे आज जुगनू भी  महताब सा

ये   अमावस  बताती   रही   रातभर


चाँद को देख बदली  की आगोश में

चाँदनी  दिल जलाती   रही  रातभर


इन निगाहों से थे  ख़्वाब  रूठे   हुए

नींद उनको   मनाती    रही   रातभर            


"डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर

 बोकारो थर्मल, झारखंड

गुरुवार, फ़रवरी 17, 2022

ग़ज़ल

 एक ग़ज़ल हाज़िर कर रही 🙏😊


आएगा  इंकलाब    रहने   दे

है   वहम ये   जनाब रहने   दे


ये  ज़रूरी  नहीं  कि  झूठे  हों

इन निगाहों में ख़्वाब  रहने  दे 


ख़ुद को यूँ बेहिजाब मत करना

रुख़  पे  थोड़ा  हिज़ाब रहने  दे


अपना दामन बचा  के रहना है

है   ज़माना    ख़राब   रहने   दे


अपनी साँसों में लम्स की खुशबू

फूल    जैसे     गुलाब   रहने   दे 


नाज़ किस शय पे हो यहाँ "रजनी"

साँस    भी   है   हबाब   रहने   दे 


इंकलाब-- परिवर्तन, क्रांति

हबाब -  पानी का बुलबुला

हिज़ाब-- पर्दा,लज्जा, शर्म

लम्स--    छूवन

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"डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर"

   बोकारो थर्मल झारखंड

मंगलवार, फ़रवरी 01, 2022

शेर

 

12 रुक्न शेर
22    22   22      22     22 22

माना सुख है सत्ता  के  गलियारों  में 
पर चलना पड़ता है जलते अंगारों में 
अपने भी इसमें दुश्मन बन  जाते  हैं 
चैन अमन  वो ढूँढते हैं  हथियारों  में 
"डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर"

शुक्रवार, दिसंबर 31, 2021

यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम



  कहाँ रह गये हो चले आओ  हमदम

  यहाँ  सर्दियों का गुलाबी  है  मौसम


  दिसम्बर  महीना  कड़ाके   की  सर्दी

  गिरा कर के पारा दिखाती है दमख़म

    

  घने कोहरे   में  वो  सूरज   छिपा  है

  धरा पर बिछी शाख़ फूलों पे शबनम


   रजाई  के अंदर  दुबक  कर रहें  हम

   मिले गर्म  कॉफी यही चाहे   आलम


   हवाएँ ये ठंडी  लगें जब भी तन  को     

   ये नश्तर सी चुभती करें साँसें  बेदम

   


   "डॉ" रजनी मल्होत्रा नैय्यर

       बोकारो थर्मल

गुरुवार, दिसंबर 30, 2021

अज़ीयत रसाँ है सफ़र ज़िन्दगी का

 पीछे नहीं  हटती कभी  इम्दाद से

मैने  हुनर ये परवरिश में  पाया  है

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मतला व शेर ....


आँखों से ग़म ढल जाता है 

एक पल ऐसा भी आता है 


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दुःखों के  साये  सदा  साथ  तो  नहीं  होते

 वो आ तो जाते हैं लेकिन चले भी जाते  हैं


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कभी समझ ही नहीं सके  हम, न जाने  कब कैसे हो गया ये

तुम्हारा कब्ज़ा हमारे दिल पर ,हमारा कब्ज़ा तुम्हारे दिल पर

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बंद  हो     पड़ा  जैसे   सीप में     रखा गौहर

आपने  मुझे  भी  महफ़ूज  कर   दिया   ऐसे    

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देखा सुहानी  झील में जब नाव का सफ़र     

  डल झील का सफ़र वो मुझे याद आ गया

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हमारी तिश्नगी  को   वो कभी  समझें नहीं   शायद

हमारी  आरजू   ये है   कि बस   दीदार   हो   जाये

कभी   माँगा  नहीं   मैने  समंदर  दे   मुहब्बत   का 

मिले क़तरा भी गर मुझको मुक़म्मल प्यार हो जाये 


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कट रहा इस ज़िंदगी का हर सफ़र आराम से

कुछ अज़ीज़ों  की दुआएँ काम आयी हैं  सदा


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 उस बात को तुम याद मत करना कभी 

  बरसों लगे जिस बात को भूल जाने  में 

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 इसी बहर पर 

  रिसने  लगे हैं ज़ख़्म  फिर  हो   कर  हरे  

  अरसे लगे  जिस चोट  को भर  जाने  में 

  

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नहीं राह आसां किसी  के लिए  भी

अज़ीयत रसाँ है सफ़र ज़िन्दगी का


अज़ीयत रसाँ-- कष्टदायक

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ज़िंदगी  जब   मुख़्तसर  है तो  दुआएँ  ये  करें

ज़िंदगी जितनी मिली कुछ नेक काम कर चलें

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.मतला 1 शे'र


आँखें  रोयी और कभी मुस्काई  होगी

याद मेरी जब तुझको  भी आयी होगी

दिल का शोर दबाया होगा  दिल में ही

वस्ल की यादें होंगी  जब  तन्हाई होगी

"डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर"

सोमवार, नवंबर 22, 2021

दुःखों के साये सदा साथ तो नहीं होते

 कुछ शेर ..व मतला 

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दुःखों के  साये  सदा  साथ  तो  नहीं  होते

वो आ तो जाते हैं लेकिन चले भी जाते  हैं

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  मतला

मिटाने मन की हर  उलझन चले आओ

 सनम  अब  थामने दामन  चले  आओ

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इस तरह  तेरी  कसौटी अब  नहीं  मंजूर  है  

 ज़िंदगी कह दे मुझे अब आज़माना हो  गया

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पीछे नहीं  हटती कभी  इम्दाद से

मैने  हुनर ये परवरिश में  पाया  है

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आँखों से ग़म ढल जाता है 

एक पल ऐसा भी आता है 

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काट ली शबे-फ़ुर्क़त आपकी ही यादों  में

आपकी ही यादों संग वस्ल  के लिए  रोये

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"डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर "

             बोकारो थर्मल झारखंड

बुधवार, नवंबर 03, 2021

शुभ दीपोत्सव


हर घर में जले  दीप न  हो कोई सवाली

हिल मिल के मनाएँगे सभी लोग  दीवाली

"डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर "

रविवार, सितंबर 26, 2021

आज बेटी दिवस पर संसार की सभी बेटियों को मैं अपना ये गीत समर्पित करती हूँ


ज़मज़म के पानी सी पावन,गंगाजल सी निर्मल  है

ख़ुशियों का सागर है बेटी , बेटी  है तो  ही कल  है 


बिन इसके जीवन   सूना, जैसे  ग़मों का  क्रंदन  है

ये है दिल की धड़कन सी ,जैसे साँसों का स्पंदन है

रिश्तों की मीनारें  इनसे ये झरनों की कल-कल  है

ख़ुशियों का सागर  है बेटी, बेटी  है तो ही  कल  है


ईश का दिया वरदान है बेटी,अधरों की मुस्कान है

महादान का पुण्य दिला दे,ये वो अमोघ सामान है

तपती धरा में शीतल छाया मरुभूमि में ये  जल  है

ख़ुशियों का  सागर है  बेटी, बेटी है तो  ही कल है


इसकी साँसों की माला पर इसका ही अधिकार है

ये मानव की जननी , इससे  मानव का  विस्तार है

करुणा,स्नेह,त्याग से भरकर मन बेटी का निश्छल है

ख़ुशियों का सागर  है  बेटी, बेटी  है तो  ही कल  है


जिसे भूलना आसान नहीं, उसी बात का संज्ञान नहीं

पूजी जाती थी नारी यहाँ, पर अब वो हिंदुस्तान नहीं

कंटक, खार भरा बेटी  के जीवन का अब हर  पल है

ख़ुशियों का सागर  है बेटी , बेटी  है तो  ही  कल  है


डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर

बोकारो थर्मल (झारखंड)

मंगलवार, सितंबर 14, 2021

कुछ शेर


अक्स अपना देखने को चाँद जब बेताब  था

आइना बन आ गया दरिया तब उसके  सामने

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आज यादों के दरीचे को खुला रहने दिया 

 साथ बीते पल सुहाने  चलचित्र से आ गए

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मुहब्बत के लिए मख़्सूस है बारिश का मौसम ही

सजन आजा चला  जाए न ये बरसात का  मौसम

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नचाती है सभी को ज़िंदगी ये

तमाशाई  बने  सब  देखते   हैं

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तू दे कभी  गुलाब मुझे इंतज़ार  है

इज़हार मैं करूँगी तुझे इंतज़ार 


"डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर"

  बोकारो थर्मल झारखंड 




एक क़ता हिंदी दिवस पर...

 


लेखनी का गान  हिंदी

आपकी पहचान हिंदी

चेतना औ ज्ञान  इससे

वाणी का वरदान हिंदी

"रजनी"