मेरी ये रचना जो मैंने बहुत पहले लिखी थी...........आज आपसब के बीच ...
रुंध कर रह गयी आवाज़ मेरी,
जब आपको सामने पाई|
खुलते, खुलते रह गए,
लब मेरे,
दिल से बात लब तक ना आ पाई,
आपकी ख़ामोशी को हम समझ ना पाए ,
मेरे आवाज़ में थी वो दम,
जो आप ना सुन पाए|
दर्द से बना सैलाब मन के अंदर,
बहुत तड़पा,बहुत मचला,
पर सागर ही रहा,
नदियाँ बन कर बह ना पाए|
हसरत थी कुछ कहने की,
रह गया बस,फ़साना,
हम कह ना पाए,आप सुन ना पाए|
छोटा सा दर्द ये,
नासूर बन कर रह गया,
वो रह लिए जिंदा,
जिनके दर्द आंसुओ में बह गए|
शुक्रवार, जनवरी 15, 2010
वो रह लिए जिंदा, जिनके दर्द आंसुओ में बह गए|
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 15.1.10 0 comments
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शनिवार, जनवरी 09, 2010
पता है मुझे, तुम इक्कीसवी सदी में जी रही हो|
ये लेख उन कलियुग की बालाओं के लिए है,जिन्होंने बिना हाला के पान से ही ,मदमत कर रखा है अपने अदाओं से,जिस्म की नुमाइश से,तंग हाल कपड़ों से|जिसमें देख कर किसी के भी ह्रदय में हलचल मच जाये,कम्पन हो जाये अंतरात्मा में|
नारी का गहना "शर्म " को कहा गया है,शर्म का अभिप्राय दो तरह का होता है|एक निगाहों में शील,दूसरा वैसे वस्त्र,वैसी अदाएं ,जो आपको खुबसूरत दर्शाती हों,मोहक लगनेवाली हों|
ना की नशीली हावभाव से पुरुष वर्ग को आकर्षित करती हों|
परदे में रहने दो,परदा ना उठाओ,
ऐसे ही रहा तो,जीना मुश्किल हो जायेगा |
पर्दानशीं होती रही जो बेपर्दा,
शर्म को भी शर्म आ जाएगी|
घूँघट उतना ही उठाओ कि,
चाँद दिख जाए
इतना भी ना कि,सरक जाए,
हो जाओ पानी,पानी|
ये कलियुग कि अप्सराओं,
मेनका ना बन जाओ
क्योंकि,यहाँ कोई विश्वामित्र नहीं|
महाभारत में हुआ ,
द्रौपदी का चीरहरण |
पर आज तो चीरहरण की जरुरत ही नहीं,
क्योंकि,तुम ही खुद द्रौपदी हो,
खुद हो दुर्योधन,
परदा की वजाय दिखाती हो यौवन|
जब खुद कहती हो ,
आ बैल,मुझे मार,तो क्या करे संसार|
खुद ही लगा कर आग,
कहती हो, कैसे बचाऊं दामन|
दामिनी सी चपला रहोगी,
तो होगा चंचल,
किसी का भी मन |
कहते हैं अमूल्य वस्तु को
सहेज कर रखा जाता है
सहेजो तन को,अमूल्य है ये धन|
पता है मुझे,
तुम इक्कीसवी सदी में
जी रही हो|
फिर भी ये समझ लो,
किसी भी चीज़ की अति,
विनाश का कारण बन जाती है|
"अति का भला न बोलता,
अति की भली ना चुप,
अति की भली न बरसना,
अति की भली ना धूप"
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 9.1.10 10 comments
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सोमवार, जनवरी 04, 2010
पछतावा
मेरी ये रचना समाज के कुछ उस भाग के लिए है जो आज आधी समाज को ढक चूका है...
हो सकता है ये रचना आप सबको पसंद न आये,पर ये मैंने जो देखा है वो ही आज फिर अपने कलम को लिखने को कहा.........आप सब की प्रतिक्रिया की आशा रखती हूँ.....
मेरी ये रचना उस नज़र के लिए है जो सचमुच नारी के रूप में एक माँ या बहन को नहीं देख पाते...(आपसब तक ये रचना रखने का अभिप्राय बस इस धारणा को बदलने की एक छोटी सी कोशिश है ......मेरी कोशिश को अपना साथ दें..........
ये वाक्या कहीं आपके साथ भी तो नहीं घटित हो रही , कहीं आप भी इस श्रेणी में सुमार तो नहीं,यदि हैं तो खुद को बदल लीजिये, कहीं ये पछतावा आपको भी न हो जाए...
हर नज़र अब तो सेक्स तलाशती है एक औरत में, चाहे वो ब्याही हो या कुंवारी ...
आज ये कहते हुए मुझे काफी अफ़सोस हो रहा कि जिस तेज़ी से जमाना बदल रहा उसी तेज़ी से लोगों के सोंच भी बदल गए,और बदले भी ऐसे कि उनके सोंच में हर शिष्टता ,भावना ना जाने कहा दफ़न हो गए..
कई दिनों से वो बाइक से करता था पीछा
girls college की आती,जाती लड़कियों का
उनके सर से पाँव तक के रचना को देख कर
फब्तियों के तीर से उन्हें बिंधा करता था
36, 28, 34...... अरे वाह काली नागिन है यार,
एक बार पलट कर देख ले तो बिना इसके डसे ही
मर जाऊं,
वो बार,बार college के गेट तक पहुँच रही लड़कियों के
एक ग्रुप को देख चिल्लाता रहा,ए पलट,एक बार पलट
जिसे उसने काली नागिन कहा था
वो काले रंग की लिबास में लड़की, पलट कर देखा ही नहीं
उस लड़के के सामने जाकर खड़ी हो गयी,लड़की को सामने देखते ही ,
वो शर्म से अपनी निगाहें झुका लिया,क्योंकि वो लड़की कोई और नहीं
उस लड़के ही छोटी बहन निकली,शर्म से बहन से निगाहें भी नहीं मिला पाया....
आज इस भूख ने भाई बहन के रिश्ते को भी लहुलुहान कर दिया है.............
मेरे इस रचना के लिए आपके प्रतिक्रिया की जरुरत है...........
शुक्रिया ........
BY RAJNI NAYYAR MALHOTRA....... 9:25PM....
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 4.1.10 6 comments
शनिवार, जनवरी 02, 2010
दो बूंद आंसू तेरे, मेरे लिए डूबने को काफी है .
स्याह रात में,
तेरा चेहरा नज़र नहीं आया,
तभी मन मेरा,
तेरा दर्द पढ़ नहीं पाया,
जब पड़ी निगाहें मेरी,
तेरे चेहरे पर,
बहुत देर हो चुकी थी,
तेरे आँखों की लालिमा ने ,
सबकुछ बयाँ कर दिया,
सजा तो दे दिया तुम्हें,
पर गुनाहगार खुद को पाया,
वो कहना तेरा,होके जार,जार,
पहली ही गलती पर फांसी की सज़ा दे दी,
सजा तो दे दिया तुम्हें,
पर गुनाहगार खुद को पाया,
मेरे गुनाहों की सजा,
इससे बड़ी क्या होगी,
दो बूंद आंसू तेरे,
मेरे लिए डूबने को काफी है .
तेरे एक अनकहे शब्द में भी,
कितने उभरे भाव है,
क्यों नहीं देख पाए मैंने,
जो मन पे छाये घाव हैं,
तेरे आँखों की लालिमा ने ,
सबकुछ बयाँ कर दिया,
जब पड़ी निगाहें मेरी,
तेरे चेहरे पर,
बहुत देर हो चुकी थी.
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 2.1.10 1 comments
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बुधवार, दिसंबर 30, 2009
नव वर्ष मंगलमय हो [शुभकामना]
आप सभी को मेरी और से नववर्ष की मंगल शुभकामना|
नव वर्ष मंगलमय हो,
हर सुबह नयी खुशियों का,
सूर्य उदय हो,
जो ना मिल पाया,
बीते हुए साल से,
वो इस वर्ष हासिल हो,
क़दमों तले हो मंजिल,
शोहरत,दौलत,खुशियाँ,
नित हासिल हों,
रहे आरोग्य तन,
चित प्रसन्न रहे,
लक्ष्मी,सरस्वती का,
संगम सुन्दर रहे,
सबको मिले नववर्ष से,
जो कामना रही अधूरी,
नववर्ष करे हर कामना पूरी,
दो हजार दस लेकर आये,
आपके ज़िन्दगी में खुशियाँ अपार,
सबके जीवन का हर सफ़र,
हो उमंग भरा,फले फूले परिवार,
नव वर्ष मंगलमय हो,
हर सुबह नयी खुशियों का,
सूर्य उदय हो|
BY -- RAJNI NAYYAR MALHOTRA 8:32 PM
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 30.12.09 2 comments
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मंगलवार, दिसंबर 29, 2009
आज मिलते ही मुंह अपना मोड़ लिया
वो हवाएं भी अब नहीं लाती,
पैगाम आपका,
जो आती थी मेरे घर तक,
लगता है आपने रुख इधर का छोड़ दिया|
हर साँस पर आती थी हिचकियाँ,
अब तो जमाने गुजर गए इन्हें आये,
लगता है आपने मुझे याद करना छोड़ दिया|
आजादी के साथ घूम रहे थे,
मेरे अरमानों के बाराती,
आपके हाथ में पत्थर,
मेरा शीशे का मकान तोड़ दिया|
कहते थे कभी भी न छोड़ेंगे साथ,
और अब तो ख्वाबों में भी आना छोड़ दिया|
पानी से डरनेवाले,
सागर में उतर गए,
आपके हाथों का ले सहारा,
डूबने लगे तो,
हाथ आपने छोड़ दिया|
धुनी रमा कर जोगी सा,
मेरे दरवाजे पर बैठे थे कभी,
आज मिलते ही मुंह अपना मोड़ लिया|
जो होना नहीं था कभी,
वो कर दिखाया आपने,
एक शीशे ने पत्थर को,
बड़ी आसानी से तोड़ दिया|
हर साँस पर आती थी हिचकियाँ,
अब तो जमाने गुजर गए इन्हें आये,
लगता है आपने मुझे याद करना छोड़ दिया|
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 29.12.09 4 comments
गुरुवार, दिसंबर 24, 2009
कोई तलाश नहीं बाकी, तुझे पा लेने के बाद,
हमसफ़र को पाने के बाद मन की अभिव्यक्ति कुछ ऐसी है..
कोई तलाश नहीं बाकी,
तुझे पा लेने के बाद,
कोई आरजू नहीं बाकी,
तुझे मन में बसा लेने के बाद|
मेरी भटकती हुई राह को,
मिल गयी मंजिल ,
तुझे पा लेने के बाद|
जो खो चूका था किनारा,
वो शाहिल हो तुम,
मेरे कस्ती को मिली किनारा,
तुझे पा लेने के बाद |
कोई जुस्तजू अब क्या करें,
कोई जुस्तजू नहीं बाकी,
तुझे पा लेने के बाद|
by --- RAJNI NAYYAR MALHOTRA 9:08 PM
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 24.12.09 0 comments
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बुधवार, दिसंबर 23, 2009
कब तक मेरी बेबसी को , वो आजमाएंगे,
कब तक हमें,
इंतजार के,
अग्न में,
जलाएंगे,
कब तक ,
मेरी बेबसी को ,
वो आजमाएंगे,
एक दिन तो,
आएगा ऐसा,
वो हमारी ,
चाहत का ,
लोहा ,
मान जायेंगे.
"रजनी"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 23.12.09 4 comments
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मंगलवार, दिसंबर 22, 2009
हमसफ़र मेरे साथ तो दोगे ना
हमसफ़र मेरे, साथ तो दोगे ना
लडखडाये कभी क़दम मेरे ,हाथ तो दोगे ना,
आये कभी मेरे पलकों पर आंसू, पोंछ तो दोगे ना,
ज़िन्दगी का हर पल खुशियों से भरा होता नहीं,
कभी ग़म के बादल जो छाये ,हिम्मत तो दोगे ना,
जीवन के सफ़र में, आती हैं मुश्किल राहें,
हर राह के सफ़र में , हमसफ़र बनोगे ना,
"आज हम कह रहे हैं कल तुम भी कहोगे ना"
"हमसफ़र मेरे साथ तो दोगे ना",
मेरे हाथों को सहारा ,अपने हाथों का दोगे ना,
दर्द हो मन में मेरे,आँखों से जान लोगे ना,
बिन कहे मेरी हर बात पहचान लोगे ना,
हमसफ़र जीवन के सफ़र का, होता है हर किसी का,
तुम मेरे हमसफर हो,हमराज़ हो,हमराज़ तो रहोगे ना,
कोई ख़ता हो ज़िन्दगी में मुझसे, माफ़ तो करोगे ना,
"मरते हैं तुम्हीं पर दिल-ओ-जान से हम"
ये लफ्ज़ एक बार ही सही, हमसे कहोगे ना |
हमसफ़र मेरे साथ तो दोगे ना,
तेरे सिंदूर से ज़िन्दगी मेरी सिंदूरी है,
जिंदगी मेरी हर पल सिंदूरी करोगे ना,
हमसफ़र मेरे साथ तो दोगे ना |
BY ----- RAJNI NAYAAR MALHOTRA 8:21 PM
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 22.12.09 4 comments
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शनिवार, दिसंबर 19, 2009
तू आईना बन गया है, मेरे रूप का,
दीवानगी भी मेरी अब,
हद पार कर गयी है,
मै इसके हर एक हद से,
गुजर रही हूँ,
तेरी एक मुस्कान के लिए,
मै पल,पल मर रही हूँ,
चैन छिन गया है दिल का मेरा,
अब तो उस टूटे हुए,
आईने की तरह बिखर रही हूँ,
सांसे रुकी पड़ी है जैसे,
बड़े उहापोह से गुजर रही हूँ,
कैसा सुकून है फिर भी,
इस तराने में,
तू आईना बन गया है,
मेरे रूप का,
तुझे देख के मैं सवंर रही हूँ,
सांसे रुकी पड़ी है जैसे,
बड़े उहापोह से गुजर रही हूँ|
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 19.12.09 5 comments
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