हयाते जंग में अपनों को साथ पाते हैं
तभी तो आप ग़मों में भी मुस्कुराते हैं
दुखों के साये सदा साथ तो नहीं होते
वो आ तो जाते हैं लेकिन चले भी जाते हैं
डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर
डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर ( लारा ) झारखण्ड बोकारो थर्मल से । शिक्षा -इतिहास (प्रतिष्ठा)बी.ए. , संगणक विज्ञान बी.सी .ए. , हिंदी से बी.एड , हिंदी ,इतिहास में स्नातकोत्तर | हिंदी में पी.एच. डी. | | राष्ट्रीय मंचों पर काव्य पाठ | प्रथम काव्यकृति ----"स्वप्न मरते नहीं ग़ज़ल संग्रह " चाँदनी रात “ संकलन "काव्य संग्रह " ह्रदय तारों का स्पन्दन , पगडंडियाँ " व् मृगतृष्णा " में ग़ज़लें | हिंदी- उर्दू पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित । कई राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित ।
हयाते जंग में अपनों को साथ पाते हैं
तभी तो आप ग़मों में भी मुस्कुराते हैं
दुखों के साये सदा साथ तो नहीं होते
वो आ तो जाते हैं लेकिन चले भी जाते हैं
डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 23.7.22 0 comments
होली हास्य में डूबी हुई एक ग़ज़ल 👇
आज उसने कहा,जा तुझे इश्क़ हो
हाल दिल का सुना,जा तुझे इश्क़ हो
दिलरुबा कोई तुझको मिले प्यार से
तू भी हो बावरा, जा तुझे इश्क़ हो
हिज्र का ग़म तुझे भी सताये कभी
तू करे रतजगा, जा तुझे इश्क़ हो
क्यों दहलता है तू प्यार के नाम से
इश्क़ में डूब जा, जा तुझे इश्क़ हो
कौन देता किसी को हसीं ये दुआ
ले गुलाबी दुआ, जा तुझे इश्क़ हो
डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर
बोकारो थर्मल, झारखंड
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 21.3.22 6 comments
एक ग़ज़ल हाजिर है मित्रों 🙏😊
अश्क़ आँखें बहाती रही रातभर
याद तेरी सताती रही रातभर
प्यार से लग गले ओस कचनार के
साथ में खिलखिलाती रही रातभर
है लगे आज जुगनू भी महताब सा
ये अमावस बताती रही रातभर
चाँद को देख बदली की आगोश में
चाँदनी दिल जलाती रही रातभर
इन निगाहों से थे ख़्वाब रूठे हुए
नींद उनको मनाती रही रातभर
"डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर
बोकारो थर्मल, झारखंड
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 21.2.22 9 comments
एक ग़ज़ल हाज़िर कर रही 🙏😊
आएगा इंकलाब रहने दे
है वहम ये जनाब रहने दे
ये ज़रूरी नहीं कि झूठे हों
इन निगाहों में ख़्वाब रहने दे
ख़ुद को यूँ बेहिजाब मत करना
रुख़ पे थोड़ा हिज़ाब रहने दे
अपना दामन बचा के रहना है
है ज़माना ख़राब रहने दे
अपनी साँसों में लम्स की खुशबू
फूल जैसे गुलाब रहने दे
नाज़ किस शय पे हो यहाँ "रजनी"
साँस भी है हबाब रहने दे
इंकलाब-- परिवर्तन, क्रांति
हबाब - पानी का बुलबुला
हिज़ाब-- पर्दा,लज्जा, शर्म
लम्स-- छूवन
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"डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर"
बोकारो थर्मल झारखंड
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 17.2.22 2 comments
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 1.2.22 0 comments
कहाँ रह गये हो चले आओ हमदम
यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम
दिसम्बर महीना कड़ाके की सर्दी
गिरा कर के पारा दिखाती है दमख़म
घने कोहरे में वो सूरज छिपा है
धरा पर बिछी शाख़ फूलों पे शबनम
रजाई के अंदर दुबक कर रहें हम
मिले गर्म कॉफी यही चाहे आलम
हवाएँ ये ठंडी लगें जब भी तन को
ये नश्तर सी चुभती करें साँसें बेदम
"डॉ" रजनी मल्होत्रा नैय्यर
बोकारो थर्मल
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 31.12.21 0 comments
पीछे नहीं हटती कभी इम्दाद से
मैने हुनर ये परवरिश में पाया है
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मतला व शेर ....
आँखों से ग़म ढल जाता है
एक पल ऐसा भी आता है
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दुःखों के साये सदा साथ तो नहीं होते
वो आ तो जाते हैं लेकिन चले भी जाते हैं
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कभी समझ ही नहीं सके हम, न जाने कब कैसे हो गया ये
तुम्हारा कब्ज़ा हमारे दिल पर ,हमारा कब्ज़ा तुम्हारे दिल पर
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बंद हो पड़ा जैसे सीप में रखा गौहर
आपने मुझे भी महफ़ूज कर दिया ऐसे
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देखा सुहानी झील में जब नाव का सफ़र
डल झील का सफ़र वो मुझे याद आ गया
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हमारी तिश्नगी को वो कभी समझें नहीं शायद
हमारी आरजू ये है कि बस दीदार हो जाये
कभी माँगा नहीं मैने समंदर दे मुहब्बत का
मिले क़तरा भी गर मुझको मुक़म्मल प्यार हो जाये
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कट रहा इस ज़िंदगी का हर सफ़र आराम से
कुछ अज़ीज़ों की दुआएँ काम आयी हैं सदा
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उस बात को तुम याद मत करना कभी
बरसों लगे जिस बात को भूल जाने में
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इसी बहर पर
रिसने लगे हैं ज़ख़्म फिर हो कर हरे
अरसे लगे जिस चोट को भर जाने में
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नहीं राह आसां किसी के लिए भी
अज़ीयत रसाँ है सफ़र ज़िन्दगी का
अज़ीयत रसाँ-- कष्टदायक
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ज़िंदगी जब मुख़्तसर है तो दुआएँ ये करें
ज़िंदगी जितनी मिली कुछ नेक काम कर चलें
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.मतला 1 शे'र
आँखें रोयी और कभी मुस्काई होगी
याद मेरी जब तुझको भी आयी होगी
दिल का शोर दबाया होगा दिल में ही
वस्ल की यादें होंगी जब तन्हाई होगी
"डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 30.12.21 0 comments
कुछ शेर ..व मतला
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दुःखों के साये सदा साथ तो नहीं होते
वो आ तो जाते हैं लेकिन चले भी जाते हैं
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मतला
मिटाने मन की हर उलझन चले आओ
सनम अब थामने दामन चले आओ
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इस तरह तेरी कसौटी अब नहीं मंजूर है
ज़िंदगी कह दे मुझे अब आज़माना हो गया
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पीछे नहीं हटती कभी इम्दाद से
मैने हुनर ये परवरिश में पाया है
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आँखों से ग़म ढल जाता है
एक पल ऐसा भी आता है
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काट ली शबे-फ़ुर्क़त आपकी ही यादों में
आपकी ही यादों संग वस्ल के लिए रोये
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"डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर "
बोकारो थर्मल झारखंड
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 22.11.21 2 comments
हर घर में जले दीप न हो कोई सवाली
हिल मिल के मनाएँगे सभी लोग दीवाली
"डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 3.11.21 1 comments
ज़मज़म के पानी सी पावन,गंगाजल सी निर्मल है
ख़ुशियों का सागर है बेटी , बेटी है तो ही कल है
बिन इसके जीवन सूना, जैसे ग़मों का क्रंदन है
ये है दिल की धड़कन सी ,जैसे साँसों का स्पंदन है
रिश्तों की मीनारें इनसे ये झरनों की कल-कल है
ख़ुशियों का सागर है बेटी, बेटी है तो ही कल है
ईश का दिया वरदान है बेटी,अधरों की मुस्कान है
महादान का पुण्य दिला दे,ये वो अमोघ सामान है
तपती धरा में शीतल छाया मरुभूमि में ये जल है
ख़ुशियों का सागर है बेटी, बेटी है तो ही कल है
इसकी साँसों की माला पर इसका ही अधिकार है
ये मानव की जननी , इससे मानव का विस्तार है
करुणा,स्नेह,त्याग से भरकर मन बेटी का निश्छल है
ख़ुशियों का सागर है बेटी, बेटी है तो ही कल है
जिसे भूलना आसान नहीं, उसी बात का संज्ञान नहीं
पूजी जाती थी नारी यहाँ, पर अब वो हिंदुस्तान नहीं
कंटक, खार भरा बेटी के जीवन का अब हर पल है
ख़ुशियों का सागर है बेटी , बेटी है तो ही कल है
डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर
बोकारो थर्मल (झारखंड)
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 26.9.21 0 comments