मंगलवार, दिसंबर 15, 2009

यूँ किस्त दर किस्त ना मार दे

KUCHH SHER MERI CREATION KE........
दरिया भरा है सामने पानी से,
पर दिल बेताब है,
तेरे आँखों के सागर में डूब जाने के लिए|
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सागर में रहने का डर हमें नहीं,
कस्ती लिए फिरते हैं हम तो,
तूफ़ान के इंतज़ार में|
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क्या खूब मिला है सिला इंतज़ार का,
वो आते हैं हमसे मिलने,
मेरे जाने के बाद|
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जब हम नहीं होते हैं,वो चाँद मुस्कुराता है,
हमारे आते ही सामने,
बादल की आगोश में छूप जाता है|
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बहुत जी लिया तेरे शर्तो पर,
अब तो ये क़र्ज़ तू उतार दे,
दे दे सजा कोई ऐसी,
यूँ किस्त दर किस्त ना मार दे|
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BY------ RAJNI NAYYAR MALHOTRA 9:18PM

हर राह यदि बिन मोड़ गुजर जाए

हर राह में ,
 यदि फूल बिछे हों,
हर राह यदि ,
बिन मोड़ ,
गुजर जाए,
 अँधेरा ना हो तो,
रौशनी कि,
जरुरत को ,
कोई ना,
जान पाए,
ज़िन्दगी भी,
एक राह है,
जो फूल के,
संग शूल,
अँधेरे के संग,
प्रकाश की,
चलते कदम को ,
एहसास कराए.

"रजनी"

शुक्रवार, दिसंबर 11, 2009

एक चुटकी सिंदूर के बदले, उसे साँसे गिरवी दे देती है,

मेरे मन में काफी सालों से एक द्वंद चल रहा था,समाज में नारी के स्थान को लेकर,
मन कुछ कड़वाहट से भरा रहा,आज काफी सोंचते हुए एक रचना लिख रही उनकी कुछ (नारी)
की बेबसी पर जो .........ममता,त्याग,वात्सल्य ,विवशता संस्कार,कर्तव्य, एक चुटकी सिंदूर ........ और जीवनपर्यंत रिश्तों की जंजीर में बंधकर, अपनी हर धड़कन चाहे इच्छा से,चाहे इच्छा के बिरुद्ध बंधक रख देती है..जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त वह बस रिस्तों को निभाने में ही रह जाती है,विवाह के बाद विवाह के पूर्व खुलकर अपनी साँसें भी नहीं ले पाती,पर विवाह के बाद नए रिस्तों में बंध कर वो तो अपना अस्तित्व ही खो देती है, वो खुद को गिरवी रख देती है,अपने ही अर्धांगिनी होने का मतलब भी खो देती है.......... आशा है मेरे विचारों
से आपलोग सहमत हों.......

मेरी एक कोशिश है (उन नारियों के लिए जो खुद को बेबस बना कर रखी हैं ) उनके लिए ... बंधन में बंधो,पर खुद को जक्ड़ो नहीं..........

अर्धांगिनी का मतलब समझ जा,
तेरी खुद की सांसों पर भी,
तुम्हारा अधिकार है,

एक चुटकी सिंदूर के बदले,
उसे साँसे गिरवी दे देती है,

लहू से अपने,सींचे आँगन जिसका,
खुशियाँ अपनी सूद में उसे देती है,

त्याग और ममता की मूरत बनकर,
कब तक और पिसोगी तुम,

आँखों में आँसू रहेगा कबतक ?
कबतक होंठों पर झूठी ख़ुशी होगी ?

कब तक रहोगी सहनशील ?
कब तक तेरी बेबसी होगी ?

त्याग ,दया,ममता, में बहकर,
अबतलक पिसती आई,

जिस सम्मान की हक़दार हो,
अपनी खता से ही ना ले पाई,

शर्म, हया तेरा गहना है,
बस आँखों में ही रहे तो काफी है,

खुद को बेबस जानकार,
ना दबा दे आरजू सारी,

पहचान ले खुद को,
तेरा ही रूप रही दुर्गा काली,

मांगने से नहीं मिलता,
छिनना पड़ता अधिकार है,

अर्धांगिनी का मतलब समझ जा,
तेरी खुद की सांसों पर भी,
तुम्हारा अधिकार है,

गुरुवार, दिसंबर 10, 2009

हिन्दुस्तानी एकेडेमी: कुमार विश्वास की लुटायी मस्ती में झूमते रहे श्रोता...

हिन्दुस्तानी एकेडेमी: कुमार विश्वास की लुटायी मस्ती में झूमते रहे श्रोता...

बुधवार, दिसंबर 09, 2009

मै तुझे बरसने का आधार नही दे पाऊँगी

मैं तुझे बरसने का आधार नहीं दे पाऊँगी,

चाहते हो जो खुशियों का संसार,
तुम्हें वो खुशियों का संसार नहीं दे पाऊँगी,

मै वो धरा नही जो बेसब्री से ,
करे बादल का इंतजार,

ये बावले बादल कहीं और बरस,
मै तुझे बरसने का आधार नही दे पाऊँगी,

पता है तेरे जिगर में मेरे लिए ,
अगाध छिपा अनुराग है,
पर मै तेरे अनुरोध को स्वीकार नहीं पाऊँगी,

क्योंकि मै वो धरा नही जो बेसब्री से ,
करे बादल का इंतजार,
ये बावले बादल कहीं और बरस,
मै तुझे बरसने का आधार नही दे पाऊँगी,

 मै वो दीया हूँ जो जलती तो हूँ ,
पर तुम्हे रौशनी नही दे पाऊँगी,

मत कर खुद को बेकरार इतना,
तुझको मै करार नही दे पाऊँगी,

मै वो सरिता हूँ जो भरी तो हुई नीर से,
पर तेरे प्यास को बुझा नही पाऊँगी,

क्यों आंजना चाहते हो मुझे आँखों में ?
मै वो काजल हूँ,
जो आँखों को कजरारी कर,
शीतलता नही दे पाऊँगी,

मत कर खुद को बेकरार इतना,
तुझको मै करार नही दे पाऊँगी,

क्योंकि मै वो धरा नही जो बेसब्री से ,
करे बादल का इंतजार,

ये बावले बादल कहीं और बरस,
मै तुझे बरसने का आधार नही दे पाऊँगी,

सुमन से भरी बाग़ हूँ मै,पर
तेरे संसार को सुगन्धित नहीं कर पाऊँगी,

क्यों लिखना चाहते हो मुझको गीतों में ?
मै वो शब्द का जाल हूँ जो,
गीतों का माल नही बन पाऊँगी,

ये बावले बादल कहीं और बरस,
मै तुझे बरसने का आधार नही दे पाऊँगी,

चाहते हो जो खुशियों का संसार,
तुम्हें वो खुशियों का संसार नहीं दे पाऊँगी,

काँटों से आँचल छुड़ाना सीख लिया मैंने,

काँटों से आँचल छुड़ाना,
सीख लिया मैंने,

कदम डगमगाते थे,
लड़खड़ाते कदम ,
आसानी से,
आगे बढ़ाना,
सीख लिया मैंने,
तन्हा चलने लगे हैं,
कदम संभलने लगे हैं,

पथरीली राहों पर भी,
अब तो ,
हँस कर चलने लगे हैं,

वक़्त के साथ खुद को,
आजमाना ,
सीख लिया मैंने,

बात बात पर,
सागर छलकाने वाले,
कैसे,बन जाते हैं,
पत्थर,सीख लिया मैंने,

कड़वे बोल भी ,बन जाते हैं ग़ज़ल,
गजल बनाना सीख लिया मैंने,

अग्न में खुद को मोम सा ,
जलाना सीख लिया मैंने,

तन्हा चलने लगे हैं,
कदम संभलने लगे हैं,

पथरीली राहों पर भी,
अब तो ,
हँस कर चलने लगे हैं,

सागर के तेज़ धारे से,
कस्ती बचाना,
सीख लिया मैंने,

मौन रह कर भी सबकुछ ,
कह जाना सीख लिया मैंने,

गम के सागर में भी रहकर,
मुस्कुराना सीख लिया मैंने,

तन्हा चलने लगे हैं,
कदम संभलने लगे हैं,

पथरीली राहों पर भी ,
अब तो,
हँसकर चलने लगे हैं.

"रजनी "

फिर खामोश हैं ये निगाहें

फिर खामोश हैं ये निगाहें,
ये दिल फिर बेकरार है,
जो रहते हैं हर पल दिल में,
फिर क्यों उनका इंतजार है |

सिवा तेरे दिल ने मेरे दूसरे को अपनाया नहीं|

जामे इश्क तुने ,
कभी पिलाया नहीं,
किसी पैमाने और को,
हमने उठाया नहीं,
यूँ तो मिले थे ,
तुमसे भी बढ़कर
कई और,
सिवा तेरे,
दिल ने मेरे,
दूसरे को अपनाया नहीं.

"rjni"

ये तो मेरी अदा है, दिल की दर्द छुपाने की

हम हंसते हैं तो उन्हें लगता है ,
हमें आदत है मुस्कुराने की,
नादाँ इतना भी नहीं समझ पाते,
ये तो मेरी अदा है,
दिल की दर्द छुपाने की|

अपना सबकुछ लगाये बैठे हैं दाव पर

बिन खेले ही,
जीत कर ,
ले गए वो,
हमसे,
मुहब्बत,
की बाज़ी,
अब तक ,
हम  ,
लगाये बैठे हैं,अपना ,
सब कुछ ,
दांव पर.

"रजनी"