माना सुख है सत्ता के गलियारों में
डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर ( लारा ) झारखण्ड बोकारो थर्मल से । शिक्षा -इतिहास (प्रतिष्ठा)बी.ए. , संगणक विज्ञान बी.सी .ए. , हिंदी से बी.एड , हिंदी ,इतिहास में स्नातकोत्तर | हिंदी में पी.एच. डी. | | राष्ट्रीय मंचों पर काव्य पाठ | प्रथम काव्यकृति ----"स्वप्न मरते नहीं ग़ज़ल संग्रह " चाँदनी रात “ संकलन "काव्य संग्रह " ह्रदय तारों का स्पन्दन , पगडंडियाँ " व् मृगतृष्णा " में ग़ज़लें | हिंदी- उर्दू पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित । कई राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित ।
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 1.2.22 0 comments
कहाँ रह गये हो चले आओ हमदम
यहाँ सर्दियों का गुलाबी है मौसम
दिसम्बर महीना कड़ाके की सर्दी
गिरा कर के पारा दिखाती है दमख़म
घने कोहरे में वो सूरज छिपा है
धरा पर बिछी शाख़ फूलों पे शबनम
रजाई के अंदर दुबक कर रहें हम
मिले गर्म कॉफी यही चाहे आलम
हवाएँ ये ठंडी लगें जब भी तन को
ये नश्तर सी चुभती करें साँसें बेदम
"डॉ" रजनी मल्होत्रा नैय्यर
बोकारो थर्मल
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 31.12.21 0 comments
पीछे नहीं हटती कभी इम्दाद से
मैने हुनर ये परवरिश में पाया है
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मतला व शेर ....
आँखों से ग़म ढल जाता है
एक पल ऐसा भी आता है
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दुःखों के साये सदा साथ तो नहीं होते
वो आ तो जाते हैं लेकिन चले भी जाते हैं
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कभी समझ ही नहीं सके हम, न जाने कब कैसे हो गया ये
तुम्हारा कब्ज़ा हमारे दिल पर ,हमारा कब्ज़ा तुम्हारे दिल पर
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बंद हो पड़ा जैसे सीप में रखा गौहर
आपने मुझे भी महफ़ूज कर दिया ऐसे
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देखा सुहानी झील में जब नाव का सफ़र
डल झील का सफ़र वो मुझे याद आ गया
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हमारी तिश्नगी को वो कभी समझें नहीं शायद
हमारी आरजू ये है कि बस दीदार हो जाये
कभी माँगा नहीं मैने समंदर दे मुहब्बत का
मिले क़तरा भी गर मुझको मुक़म्मल प्यार हो जाये
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कट रहा इस ज़िंदगी का हर सफ़र आराम से
कुछ अज़ीज़ों की दुआएँ काम आयी हैं सदा
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उस बात को तुम याद मत करना कभी
बरसों लगे जिस बात को भूल जाने में
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इसी बहर पर
रिसने लगे हैं ज़ख़्म फिर हो कर हरे
अरसे लगे जिस चोट को भर जाने में
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नहीं राह आसां किसी के लिए भी
अज़ीयत रसाँ है सफ़र ज़िन्दगी का
अज़ीयत रसाँ-- कष्टदायक
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ज़िंदगी जब मुख़्तसर है तो दुआएँ ये करें
ज़िंदगी जितनी मिली कुछ नेक काम कर चलें
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.मतला 1 शे'र
आँखें रोयी और कभी मुस्काई होगी
याद मेरी जब तुझको भी आयी होगी
दिल का शोर दबाया होगा दिल में ही
वस्ल की यादें होंगी जब तन्हाई होगी
"डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 30.12.21 0 comments
कुछ शेर ..व मतला
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दुःखों के साये सदा साथ तो नहीं होते
वो आ तो जाते हैं लेकिन चले भी जाते हैं
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मतला
मिटाने मन की हर उलझन चले आओ
सनम अब थामने दामन चले आओ
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इस तरह तेरी कसौटी अब नहीं मंजूर है
ज़िंदगी कह दे मुझे अब आज़माना हो गया
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पीछे नहीं हटती कभी इम्दाद से
मैने हुनर ये परवरिश में पाया है
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आँखों से ग़म ढल जाता है
एक पल ऐसा भी आता है
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काट ली शबे-फ़ुर्क़त आपकी ही यादों में
आपकी ही यादों संग वस्ल के लिए रोये
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"डॉ. रजनी मल्होत्रा नैय्यर "
बोकारो थर्मल झारखंड
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 22.11.21 2 comments
हर घर में जले दीप न हो कोई सवाली
हिल मिल के मनाएँगे सभी लोग दीवाली
"डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 3.11.21 1 comments
ज़मज़म के पानी सी पावन,गंगाजल सी निर्मल है
ख़ुशियों का सागर है बेटी , बेटी है तो ही कल है
बिन इसके जीवन सूना, जैसे ग़मों का क्रंदन है
ये है दिल की धड़कन सी ,जैसे साँसों का स्पंदन है
रिश्तों की मीनारें इनसे ये झरनों की कल-कल है
ख़ुशियों का सागर है बेटी, बेटी है तो ही कल है
ईश का दिया वरदान है बेटी,अधरों की मुस्कान है
महादान का पुण्य दिला दे,ये वो अमोघ सामान है
तपती धरा में शीतल छाया मरुभूमि में ये जल है
ख़ुशियों का सागर है बेटी, बेटी है तो ही कल है
इसकी साँसों की माला पर इसका ही अधिकार है
ये मानव की जननी , इससे मानव का विस्तार है
करुणा,स्नेह,त्याग से भरकर मन बेटी का निश्छल है
ख़ुशियों का सागर है बेटी, बेटी है तो ही कल है
जिसे भूलना आसान नहीं, उसी बात का संज्ञान नहीं
पूजी जाती थी नारी यहाँ, पर अब वो हिंदुस्तान नहीं
कंटक, खार भरा बेटी के जीवन का अब हर पल है
ख़ुशियों का सागर है बेटी , बेटी है तो ही कल है
डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर
बोकारो थर्मल (झारखंड)
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 26.9.21 0 comments
अक्स अपना देखने को चाँद जब बेताब था
आइना बन आ गया दरिया तब उसके सामने
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आज यादों के दरीचे को खुला रहने दिया
साथ बीते पल सुहाने चलचित्र से आ गए
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मुहब्बत के लिए मख़्सूस है बारिश का मौसम ही
सजन आजा चला जाए न ये बरसात का मौसम
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नचाती है सभी को ज़िंदगी ये
तमाशाई बने सब देखते हैं
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तू दे कभी गुलाब मुझे इंतज़ार है
इज़हार मैं करूँगी तुझे इंतज़ार
"डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर"
बोकारो थर्मल झारखंड
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 14.9.21 3 comments
लेखनी का गान हिंदी
आपकी पहचान हिंदी
चेतना औ ज्ञान इससे
वाणी का वरदान हिंदी
"रजनी"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 14.9.21 4 comments
ख़ुशियों के साथ मेरा आशियाना हो गया
दर्द दरिया बन बहा औ मुस्कुराना हो गया
रास अब आने लगा है साथ होना आपका
आप नज़राना मिले दिल शायराना हो गया
छल रहा था ये जहाँ मुझको परख के नाम पर
की पलट कर वार तो दुश्मन ज़माना हो गया
ज़िंदगी तेरी कसौटी अब नहीं मंजूर है
ज़िंदगी कह दे मुझे अब आज़माना हो गया
मत दुहाई दो किसी को साथ के नाम पर
साथ रह कर जब कठिन रिश्ता निभाना हो गया
"रजनी मल्होत्रा नैय्यर
बोकारो थर्मल (झारखंड)
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 29.8.21 0 comments
दशरथ के घर पुत्र रूप में जन्म लिए थे रघुवर जी
एक घड़ी फिर ऐसी आई हुए राम जी वनवासी
अवधपुरी में सभी ओर बस राम राज की थी चर्चा
किया मंथरा की बातों ने मन भारी कैकेई का
कोपभवन में हारे राजा और हुईं विजयी रानी
एक घड़ी फिर ऐसी आई हुए राम जी वनवासी
पुत्र धर्म का पालन करने चले राम जी वन में रहने
और संग में पत्नी सीता साथ अनुज लक्ष्मण भी चले
मात-पिता गुरु और महल सँग छोड़ी अपनी नगरी
एक घड़ी फिर ऐसी आई हुए राम जी वनवासी
हाथ जोड़कर जन-जन करते श्रीराम जी का वंदन
मत जाओ वन मत जाओ वन मत जाओ हे रघुनन्दन
चौदह वर्ष नयन तरसेंगे प्रभु दरस के अभिलाषी
एक घड़ी फिर ऐसी आई हुए राम जी वनवासी
क्या अंतर नारायण नर में नियति बड़ी दुखदायी है
भटक रहे वन-वन भाई द्वय दशा दुखी रघुवर की है
सभी राजसी भोग छोड़कर रीति संत की अपनायी
एक घड़ी फिर ऐसी आई हुए राम जी वनवासी
लंकापति ने रची योजना हरण सिया का करने की
और लक्ष्मण की रेखा से बाहर निकलीं सीता जी
लंकापति ले उनको भागा विकल हुए जग के स्वामी
एक घड़ी फिर ऐसी आई हुए राम जी वनवासी
राम लखन जब सिया खोज में किष्किंधा तक आ पहुँचे
महाबली बजरंगबली अपने प्रभु से तब वहाँ मिले
मूर्छित हुए लखन जब युद्ध में तो घबराए अवतारी
एक घड़ी फिर ऐसी आई हुए राम जी वनवासी
रावण का वध किये रामजी हुआ युद्ध भीषण भारी
राम लौटकर वापस आए हर्षित हुए अवध वासी
जगमग-जगमग दीपों से तब हुई अवध की गली गली
एक घड़ी फिर ऐसी आई हुए राम जी वनवासी
"रजनी मल्होत्रा नैय्यर
बोकारो थर्मल झारखंड
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 9.8.21 0 comments