शुक्रवार, मार्च 16, 2012
नहीं मिलती कहीं राहत जहाँ में , ग़म के मारे को
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 16.3.12 8 comments
बुधवार, मार्च 07, 2012
इस बार होली में
दिल का टुकड़ा , रहा बरस भर घर से बाहर
माँ चूमे मुखड़ा , घर बेटा आया होली में |
मेहँदी छूटने से पहले चला गया परदेश जो
बिछड़ी उस विरहन से मिलने , आया होली में |
जिस बेटी की हुई विदाई इसी माह के अन्दर,
पलकें भींगी राह तकेगी, इस बार होली में |
कल तक रंजिश थी जिसको जिस किसी से ,
मिलकर साथ में , धो डालो रंजिश होली में |
सूना है "रजनी" वो छोड़कर फिरसे चला जायेगा ,
जो रंग कभी ना जायेगा, डालो इस बार होली में |
माँ चूमे मुखड़ा , घर बेटा आया होली में |
मेहँदी छूटने से पहले चला गया परदेश जो
बिछड़ी उस विरहन से मिलने , आया होली में |
जिस बेटी की हुई विदाई इसी माह के अन्दर,
पलकें भींगी राह तकेगी, इस बार होली में |
कल तक रंजिश थी जिसको जिस किसी से ,
मिलकर साथ में , धो डालो रंजिश होली में |
सूना है "रजनी" वो छोड़कर फिरसे चला जायेगा ,
जो रंग कभी ना जायेगा, डालो इस बार होली में |
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 7.3.12 17 comments
शुक्रवार, मार्च 02, 2012
कोख के चिराग़ को
हर बात ,
घुमती रही उसके ज़ेहन में
सारी रात,
कहीं कल का सवेरा
न बुझा दे,
मेरी कोख के चिराग़ को
अगर फिर से कट गयी
मेरे कोख में बेटी |
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
घुमती रही उसके ज़ेहन में
सारी रात,
कहीं कल का सवेरा
न बुझा दे,
मेरी कोख के चिराग़ को
अगर फिर से कट गयी
मेरे कोख में बेटी |
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 2.3.12 7 comments
शुक्रवार, फ़रवरी 24, 2012
जैसे कोई ख़्वाब से हिलाकर जगा दिया हो
दिन इधर जो बीते कुछ इस तरह से मेरे
जैसे कोई ख़्वाब से हिलाकर जगा दिया हो
दे कर सामने मुरादों से भरी थाली
लेने की सूरत में फ़ौरन हटा दिया हो
हसरतें देकर"रजनी" उमंगों से जीने की
आख़िरी ख्वाहिश में कज़ा दे दिया हो
जैसे कोई ख़्वाब से हिलाकर जगा दिया हो
दे कर सामने मुरादों से भरी थाली
लेने की सूरत में फ़ौरन हटा दिया हो
हसरतें देकर"रजनी" उमंगों से जीने की
आख़िरी ख्वाहिश में कज़ा दे दिया हो
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 24.2.12 8 comments
शुक्रवार, फ़रवरी 17, 2012
गुजरे बरस ये तेरह , जैसे कटे बनवास
गुजरे बरस ये तेरह , जैसे कटे बनवास ,
फिर उठी मन में कामना मधुमास की.
आज मेरे विवाह को तेरह वर्ष पूरे हो गए, अपने मन के विचारों को शब्दों में पिरो कर हर वर्ष की तरह आज भी एक रचना अपने पति राजेश के लिए
फिर उठी मन में कामना मधुमास की.
आज मेरे विवाह को तेरह वर्ष पूरे हो गए, अपने मन के विचारों को शब्दों में पिरो कर हर वर्ष की तरह आज भी एक रचना अपने पति राजेश के लिए
******************************
मैं शब्दों में बंधकर लड़ी बनू,
तुम मेरे गीत के तान बनो.
थक गए पग मेरे चलकर तन्हा ,
मेरे ज़र्जर तन के प्राण बनो.
मै बनूँ दीपों की मालिका,
तुम अमर लौ की बान बनो.
मै बन जाऊं ग़ज़ल तेरी,
तुम महफ़िल की शान बनो.
मै पावस की सुरभित रजनीगंधा,
तुम खुला निलाभ आसमान बनो.
मै बनू सुहासिनी तेरी "रजनी" ,
तुम जन्मों तक मेरे सुजान बनो.
"रजनी"
************************************
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 17.2.12 18 comments
गुरुवार, फ़रवरी 16, 2012
टूटी कश्ती थी, मझधार में चल रही थी
टूटी हुई कश्ती थी मझधार में चल रही थी
कभी डूब रही थी कभी संभल रही थी
वक़्त की मुट्ठी में थी तकदीर मेरी
कभी बिखर रही थी कभी बदल रही थी
हिकायत -ये माज़ी में डूबे चश्म- तर
आंसुओं की बारिश में भी जल रही थी
अमा निशा की ख़ामोश फिज़ा थी, "रजनी"
ख़्वाब था हक़ीकत सा और मै बहल रही थी
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 16.2.12 10 comments
मंगलवार, फ़रवरी 14, 2012
ये गुलाब
एक सुर्ख़ गुलाब देकर
कर देते हैं
अपनी भावनाओं का
इजहार लोग़
यदि
यही है
अपने प्रीत को बयाँ करना
तो कई बार बांधे मैंने
तुम्हारे जुड़े में सुर्ख़ गुलाब |
और , तुम मुस्कुरा कर
अपने हाथों से
छू कर गुलाब को
कह देती हर बार
कितनी फबती है
मेरे गौर वर्ण पर,
काले बालों में
यह लाल गुलाब !
मै हर बार ठगा सा रह गया
शायद
कभी तो समझ पाओगी
मेरे अनकहे अहसास को |
क्या ये गुलाब
जिसे ,
प्रेम का प्रतीक कहते आये हैं लोग़
वो रह गया
मात्र एक
श्रृंगार बन कर |
कभी देवताओं के सर का,
कभी रमणी के ?
कर देते हैं
अपनी भावनाओं का
इजहार लोग़
यदि
यही है
अपने प्रीत को बयाँ करना
तो कई बार बांधे मैंने
तुम्हारे जुड़े में सुर्ख़ गुलाब |
और , तुम मुस्कुरा कर
अपने हाथों से
छू कर गुलाब को
कह देती हर बार
कितनी फबती है
मेरे गौर वर्ण पर,
काले बालों में
यह लाल गुलाब !
मै हर बार ठगा सा रह गया
शायद
कभी तो समझ पाओगी
मेरे अनकहे अहसास को |
क्या ये गुलाब
जिसे ,
प्रेम का प्रतीक कहते आये हैं लोग़
वो रह गया
मात्र एक
श्रृंगार बन कर |
कभी देवताओं के सर का,
कभी रमणी के ?
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 14.2.12 6 comments
सोमवार, फ़रवरी 13, 2012
प्रेम , प्रेम ही होता है
प्रेम गहरा हो , या आकर्षण ,
प्रेम , प्रेम ही होता है.....
चंचल मन को मिलन की तिश्नगी,
जीवन को दर्पण देता है|
तन,मन धन सर्वस्व न्योछावर ,
पथरीले राहों में मंजिल को संबल देता है|
दुःख-सुख के पलों में आलिंगन देता है
प्रेम गहरा हो , या आकर्षण ,
प्रेम , प्रेम ही होता है.....
अदभुत है इस प्रेम की रीत,
त्याग का दूजा नाम है प्रीत|
जहाँ त्याग नहीं हो प्यार में,
वो प्यार वफ़ा नहीं देता है |
प्रेम से सुगन्धित संसार है,
ये फूलोँ में काँटों का हार है|
त्याग,बलिदान,वफ़ा से ,
जुड़ा प्यार का नाता है|
सिर्फ प्रेम को पाना ही नहीं,
लूट जाना भी प्यार है|
संसार से जुड़ा हर रिश्ता प्रेम से गहराता है,
वो प्रेमी,प्रेमिका,भाई ,बहन, दोस्त,पिता - माता है |
प्रेम गहरा हो , या आकर्षण ,
प्रेम , प्रेम ही होता है.....
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 13.2.12 4 comments
गुरुवार, फ़रवरी 09, 2012
प्रेम , प्रेम ही होता है
प्रेम गहरा हो , या आकर्षण ,
प्रेम , प्रेम ही होता है.....
चंचल मन को मिलन की तिश्नगी,
जीवन को दर्पण देता है|
तन,मन धन सर्वस्व न्योछावर ,
पथरीले राहों में मंजिल को संबल देता है|
दुःख-सुख के पलों में आलिंगन देता है
प्रेम गहरा हो , या आकर्षण ,
प्रेम , प्रेम ही होता है.....
अदभुत है इस प्रेम की रीत,
त्याग का दूजा नाम है प्रीत|
जहाँ त्याग नहीं हो प्यार में,
वो प्यार वफ़ा नहीं देता है |
प्रेम से सुगन्धित संसार है,
ये फूलोँ में काँटों का हार है|
त्याग,बलिदान,वफ़ा से ,
जुड़ा प्यार का नाता है|
सिर्फ प्रेम को पाना ही नहीं,
लूट जाना भी प्यार है|
संसार से जुड़ा हर रिश्ता प्रेम से गहराता है,
वो प्रेमी,प्रेमिका,भाई ,बहन, दोस्त,पिता - माता है |
प्रेम गहरा हो , या आकर्षण ,
प्रेम , प्रेम ही होता है.....
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 9.2.12 13 comments
रविवार, जनवरी 29, 2012
बाक़ी है हर तहजीब पुरानी अभी तक गाँव में
बाक़ी है हर तहजीब पुरानी अभी तक गाँव में,
जिस्म से हैं शहरों में बूढ़े जान अभी तक गाँव में.
फ़ैल गया नफ़रत का ज़हर शहर के धूप-छाँव में,
प्रेम का पौधा फला खड़ा है अभी तक गाँव में .
ईमेल और चैट पर होती है शहरी गुफ़्तगू,
डाकिये की राह देखें लोग अभी तक गाँव में.
कट रहे पेड़ शहरों में अंधी भौतिक दौड़ में,
पूजते है लोग नीम ,पीपल अभी तक गाँव में.
उफ़न -उफ़न आती थी एक पगली नदी की धारा,
बरसात में सबको डराती है अभी तक गाँव में.
नए जमाने को पसंद डिस्को, पब, चाईनीज़, थाई,
पुवों-पकवानों की महक आती है अभी तक गावं में.
दिन ढले तक सोते हैं ये मगरिब को ढोने वाले,
तड़के ही उठ जाते हैं लोग अभी तक गाँव में.
रजनी मल्होत्रा नैय्यर
जिस्म से हैं शहरों में बूढ़े जान अभी तक गाँव में.
फ़ैल गया नफ़रत का ज़हर शहर के धूप-छाँव में,
प्रेम का पौधा फला खड़ा है अभी तक गाँव में .
ईमेल और चैट पर होती है शहरी गुफ़्तगू,
डाकिये की राह देखें लोग अभी तक गाँव में.
कट रहे पेड़ शहरों में अंधी भौतिक दौड़ में,
पूजते है लोग नीम ,पीपल अभी तक गाँव में.
उफ़न -उफ़न आती थी एक पगली नदी की धारा,
बरसात में सबको डराती है अभी तक गाँव में.
नए जमाने को पसंद डिस्को, पब, चाईनीज़, थाई,
पुवों-पकवानों की महक आती है अभी तक गावं में.
दिन ढले तक सोते हैं ये मगरिब को ढोने वाले,
तड़के ही उठ जाते हैं लोग अभी तक गाँव में.
रजनी मल्होत्रा नैय्यर
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 29.1.12 9 comments
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

