शनिवार, अप्रैल 18, 2015

दायरों का टूटना

दायरे 
" तंग " 
हों या " विस्तृत " 
कोई फर्क नहीं पड़ता |
यदि 
मायने रखता है तो वो ,
दायरों का टूटना
या उनसे निकलना |


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मान्यताओं की
एक परिधि लाँघ कर,
हम 
नवीन तथ्यों के लिए
कई रास्ते खोल देते हैं ..








गुरुवार, अप्रैल 02, 2015

नहीं कहला रहे नीलकंठ

कई बार खो जाते हैं ,
साथ  रहते,चलते
करीबी रिश्ते |
जब ,
सर उठाने लगती है
साथ गुजारे  
लम्हे
कुछ लौट आते हैं
उलटे क़दम
जैसे आ जाता है ,
सुबह का निकला पंछी नीड़ में |
कुछ अजनबी बन कर
नदी का किनारा सा रह जाते हैं |
पी रहे हैं ,
हमारे तुम्हारे जैसे
सरल आशुतोष
रिश्तों के मंथन से निकले विष को
पर नहीं कहला रहे नीलकंठ !
दूर खड़ी
मौन ,  टूटे मनके को
रह-रह कर  बांधती है ,
पर भावनाओं के बिखरे  मोती
छटक कर दूर चले जाते हैं !

"रजनी मल्होत्रा (नैय्यर )


शुक्रवार, मार्च 13, 2015

ग़ज़ल

 'द  सोहेल 'कोलकाता  की मासिक पत्रिका में छपी मेरी ग़ज़ल

और कितने आसमान चाहिए उसअत के लिए
ज़मीं  कम पड़ने  लगी    है    राहत  के   लिए

  कीदोस्ती   का   एक   पौधा  लगा दें
बहुत  वक़्त  पड़ा    है  अदावत    के     लिए

हर  सु  है   गिराँबारी   का   आलम अल्लाह
वक़्त माकूल   सा  लगत  है बगावत के लिए

कई  पेच - व्- ख़म    बाक़ी     हैं   ज़ीस्त  के
साज़ - वो - नगमा उठा  रखो  फुर्सत के लिए 

लफ़्ज़ों   में बयाँ  कर      सकूंगी   जज़बात 
हौसले  दिल में  हैं उर्दू   की अज़मत  के लिए

बस  इक किरण  उजाले  की  ज़माने  को  दूँ
है ग़ज़ल "रजनी " दुनिया की मुसर्रत के लिए

उसअत -   फैलाव
अदावत -   दुश्मंनी
गिराँबारीमहंगाई
ज़ीस्त -     ज़िन्दगी
अजमतमहत्व
मुसर्रत  -  खुशी

" रजनी मल्होत्रा नैय्यर " 
 (बोकारो थर्मल )



    

मंगलवार, जनवरी 06, 2015

" वो औरत नहीं "

         

 घना कोहरा सा  दबा हुआ दर्द मासूम मजबूर का , आहिस्ता -आहिस्ता  फैलता हुआ  समेट  लेता  है संपूर्ण जीवन के हर कोण - त्रिकोण को |   परिवर्तन और परावर्तन के नियम से कोसों दूर उसका संवेग और सोचने की क्षमता बस लांघना चाहती है उस उठते लपट को जिसने  घेर कर बना रखी है शोषक और शोषित के बीच की एक मजबूत सी दीवार और कुछ रेखाएँ |   यह कुदरत के नियम का कैसा  मखौल है , सम शारीरिक संरचना को सिर्फ रंग भेद और कुछ सिक्कों की खनक  कर देती है अलग जैसे कागों और बगुलों की अपनी-अपनी सभा | इस आदम भेड़िये के बीच की खाई देख सहसा कह उठता है मन ये क्या ? इस तकरार और भेद की नीति में एक सिक्का कैसे सिमट कर रह गया | शायद इस संरचना के साथ कोई जाति ,  रंग भेद की नीति नहीं चलती , चलती  है तो बस एक देह की जो मांसल और कोमल है जिसके आस्वादन के लिए जरुरी नहीं उसकी इच्छा की  मंजूरी , उसकी उम्र, भावना , परिपक्वता, अपरिपक्व होना | गिद्धों के पंजे और नाख़ून उसमे समाकर ढूंढ़ ही लेते  हैं अपना आहार | दिन के उजाले में कभी रात के अंधकार में तलाशता हुआ चला जाता है भूखे भेड़ियों का  झुण्ड किसी निरीह मेमने की शिकार को |
देता हुआ  प्रलोभन सुनता है हर आलाप को , और मिट जाते हैं टुकड़े भर कागज में लगे अंगूठे के निशान जो कभी गवाही बने शोषक की लाचारी का |
अब एक कोने में सिमटते हुए सूखे पत्ते  सी टूटती नार  को करना है तार- तार  अपनी अस्मत  त्याग के हवनकुंड में , जिसमे जलकर उसका स्वाभिमान हो जायेगा कई तड़पते और भूखे पेटों  का पोषक |
चाहे नश्वर शरीर को जीत ले कोई  ,पर आत्मा तो उसे ही प्राप्य है  स्व को सौपा हो जिसे | वो अपने अहं को मार कर कर लेगी जिन्दा कई निष्प्राण शरीर को जिनसे वो जुडी है कई रिश्तों के साथ अम्मा, पत्नी , बेटी  पर कहीं से भी वो औरत नहीं " सिर्फ एक देह है जो नश्वर है

अपवित्र नहीं है  कर लेगी फिर से वो अपना परिष्कार , बना लेगी इस बात का साक्ष्य अपने वेणी के गांठ को | उसका शोषण और दोहन हो ही नहीं सकता वो जानती है कहीं से भी वो औरत नहीं " सिर्फ एक देह है जो नश्वर है औरत कभी नहीं मरती उससे ही वजूद है संसार का | शैतान,  संत , राग, वैराग सब उसकी ही उत्पति हैं |
उसकी पवित्रता की साक्ष्य स्वयं धरा है जो कहती है  परिष्कार की आवश्यकता नहीं उसे क्योंकि उसके क़दमों से ही धरा उर्वर होती है , महक उठता है फिजा उसकी देह की महकती धुनी से | वो तोड़ती है हर चक्रव्यूह  को तब जीत पाता है मनु (mnushy) महाभारत का युद्ध | वो दौड़ती है  शुष्क से जीवन में बनकर रक्त वाहिका तभी स्पंदित होता है परिवार | बनकर परिधि वो बांधे रखती है अपनी स्नेह के गुरुत्वकर्ष्ण से तब जाकर सम्भलता है जीवन का रेला | परिषेचक  बनकर महकाती है बगिया , कभी मृदुल कभी लवन बनाकर अपने अंतस को |
पर कुटुंब को समर्पित परिचारिका पाती है वंचना, लांछन, परिघात  और कभी - कभी कर दिया जाता है उसका परित्याग उसी के द्वारा  जिसने अग्नि को साक्षी बना फेरों व् कसमों की मजबूत कफ़स में क़ैद  कर अपने कुत्सित विचारों को बन बैठता है किसी का भाग्यविधाता, परित्राता |
" वो औरत नहीं "  पावन धाम है जिसे पवित्र निगाहें छुकर मोक्ष पा जाते हैं |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

बोकारो थर्मल 

शनिवार, मई 11, 2013

थपकी, चुम्बन, मीठी लोरी , ऐसे प्यार जताती है माँ

 दुनियां की हर माँ को नमन ...........   

थपकी, चुम्बन, मीठी लोरी , ऐसे प्यार जताती   है   माँ,
लाल  - पीली  होकर गुस्से से, फटकार   लगाती   है  माँ .

सीने से लिपट जाती है,छोड़- चूल्हा -चौका, झाड़ू  बर्तन ,
बच्चों  के दुःख में  खुशियों  का उपहार बन  जाती है माँ

देकर अपने ममता का संबल, जीते जीवन का हर दंगल
कभी  ढाल बनकर  डटे ,कभी  तलवार बन जाती  है  माँ .

काँटों के  गुलशन में   भी फूलों  का हार   बन   जाती    है
बच्चों    की    खुशियों  में   त्यौहार   बन  जाती    है   माँ

दे कर   ममता   स्नेह     की बहती   धार बन   जाती है
प्यासे   धरा पर   सावन की   बौछार   बन जाती  है माँ,

जीवन  के हर   एक उलझन , ले   कर अपने    अंकों   में ,
कर दे मात नियति को भी ,ऐसी औजार बन जाती है माँ |


 "रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

गुरुवार, मई 09, 2013

हो जाता है रिश्तों का रासायनिकरण

 जब रिश्ते पारदर्शी होकर भी,
कफ़स में कैद से लगते हैं, तब
दो लोगों के बीच की डोर ,
छूटने लगती है ,
टूटने के लिए |
या फिर गिरह पड़ जाते हैं
उस डोर में   
जिसने दो सोच को,दो आत्माओं  को,
दो शरीर को एक करने में
अपनी  अस्तित्व ही मिटा दी  |
बरबस ही,
मैं और तुम से हम का हो जाना ,
और फिर से वापस मैं और तुम में बदल जाना ,
ऐसा ही लगता है न ?
जैसे जीवन की प्रयोगशाला में भी ,
कोई रासायनिक क्रिया चल कर ,
बदल देती है एक ही पल में,
रिश्तों का समीकरण
 हो जाता है  रिश्तों  का भी    रासायनिकरण |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

सोमवार, मार्च 25, 2013

अब आग पर चलने जैसा, हो गया है चौराहा,

ख़ुदा  कैसा   लिखा  मुकद्दर   ,  क्या   रंजिश   निकाली ?
जिसे  भी     अपना   समझा , बदले   में   पाया    गाली  |

किस   बात   का   अचम्भा   किस   बात   का  है  झगड़ा,
स्वीस  बैंक  भर  उनके,     है    दामन    अपना    खाली |


क्योंकर वो  सुनेंगे  शोर   तेरे ,  हों   जिसके हाथ  सेंसर ?
कहीं   पे   बदनाम   मुन्नी   , कहीं  हुई     शीला  कहानी  |


अब   आग   पर  चलने   जैसा,    हो  गया     है   चौराहा,
मौवालियों  को दिखें  हर  आती-जाती   कलियाँ    साली |


कई  सराफ़त के पुतलों  के  घरों  में , आ   गया   बवंडर ,
एक  बेवा  ने  अपनी  मर्ज़ी    से   घर   क्या    बसा   ली  |

वो   मासूम   कली  रोकर ,पकड़ कर   पांव   उसके  बोली,
बाबा ब्याह  ना   कराना ,अभी  तो  मेरी  उमरिया    बाली |

 "रजनी मल्होत्रा नैय्यर "

मंगलवार, मार्च 19, 2013

हम दास्ताँ अपनी , दीवारों को सुनाने लगे .


जब   गीत    तिरंगे   की  शान   में    गाने   लगे,
कुछ  लोग सियासत   की   आग   भड़काने   लगे.

जब  पूछा    गया  शहीदों  का  नाम    और   पता,
चोर - उचक्के    नाम    अपना    लिखाने      लगे.

जूठे  बर्तनों   को    माँजकर   जिन्हें    थी    पाली ,
कह   मुस्काने  लगी,   मेरे   बच्चे     कमाने   लगे .

वक़्त   ने     चाल      ही      कुछ     ऐसी    बदली   ,
संभल  कर चलनेवाले  भी,  मुंह   की    खाने   लगे,

सुना   जबसे  होते    हैं    दीवारों    के    भी   कान,
हम  दास्ताँ   अपनी , दीवारों    को    सुनाने   लगे .

छोड़ दिया साथ , तक़दीर ने ज़माने   से  मिलकर ,
मन   में   हौसलों  के     दिये    जगमगाने    लगे .

कोयले   की खान  से  घुम    कर   जो    आ   गए,
काजल   की   कोठरी   से   दामन    बचाने     लगे,

जब   भी  कहा    ख्वाहिशों  से  बातें  तहज़ीब   की,
मुझसे  रूठ   कर    वो, मुंह   मोड़     जाने     लगे .

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

रविवार, मार्च 10, 2013

उनका क्या होगा , जो मोम से ढले हैं

पत्थर  पिघल गए  इन  सांसों  की  गर्मी  से,
उनका   क्या  होगा , जो  मोम   से    ढले  हैं ?

चलता    जा   रहा  मेरे  दिल  का    काफिला,
जाने  क्या है मंजिल जिस  ओर पग  चले   हैं .


मेरी   ही   अदालत   में   मेरा   ही   मुजरिम,
देकर  अगली   तारीख़  मुझको   ही छले   हैं ?

फूल     पर   पड़े   कि   शोलों   पर    पड़े    हैं , 
एक बिजली   कौंधती   है    जब पाँव  जलें  हैं


जैसे    देखता   हो   कोई    दिन   में    सितारे,
वैसे  गरीब   के   मन   कोई    ख़्वाब   पले   हैं.

जाते  हैं  कई   उड़  कर  बुलंदी   की   मकाँ   पर,
 वो  गिर कर  उंचाईयों     से     हाथ     मले   हैं |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

गुरुवार, मार्च 07, 2013

फिर पड़ेंगे ओले जरा सर तो मुड़ायिये



शर्त है  ये चट्टान    भी    गिर   जाएगी  ,मगर,
एक   बार    हौसलों की तूफान  को  तो  लाईये,

ढूंढने   पर गीदड़ों   का  काफ़िला  मिल  जायेगा,
एक      बार    ढूंढने  को   शहर      तो    जाईये.

हर    बार    की  तरह  ही दम  तोड़ती    हुई   है,
इस   बार   इस  विधि पर  रौशनी   तो  लाईये

ओहदे   के   दंभ   में  जो  आसमां   में   उड़  रहे,
हकीकत की ज़मीं पर  उन्हें खींच कर तो लाईये .

बदले मिजाज़  मौसम  के,  बदले  हालात   से
फिर   पड़ेंगे    ओले   जरा   सर  तो  मुड़ायिये  .

सोचते हो   थम   जायेगा गरजने से  ये बवंडर ,
"रजनी"  बरसने   को घटा  बनकर  तो  छाईए,