सोमवार, अगस्त 02, 2010

मैं और मेरी तन्हाई



हर   लम्हा अब   मुझे   तड़पा   रहा है,
भीड़ में भी अकेलापन नज़र आ रहा है.

हर तरफ ख़ामोशी एक सवाल करती है,
अकेलापन अब जीना दुश्वार करती  है.

कभी भागते फिरते  थे वक़्त के साथ हम,
अब तो हर क्षण लगता है रुक गया है. 

मेरी   तरह   शायद   वो  भी  थक  गया  है,
चलते - चलते समय का चक्र  रुक गया है.

रौशनी   की किरण    दूर  नजर  आ रही है,
लगता   है   शायद     मुझे   बुला   रही   है.

एक   सितारा  भी   अगर  मुझको मिल जाये,
तन्हाई में   भी उम्मीद की किरण जगमगाए.

मिलने को तो सारा   समन्दर   मुझे  मिला  है,
पर   समन्दर में  कभी कोई गुल न   खिला  है.

पलकों   पर अधूरे ख़्वाब   न  जाने क्यों आये,
जो बादल सा   अब तक हैं पलकों  पर   छाये.

कभी तो बदलियों की ओट से चाँद नज़र आये 
ऐसी    अधूरी ख़्वाब     कोई        न    सजाये.

पूरी  होने से  पहले  जो  ख़्वाब   चूर हो   जाते  है,
टूटकर    वो लम्हें    बड़ा    दर्द    दे    जाते     हैं.

शीशे    की   उम्र   सिर्फ    शीशा ही बता पाता है,
या   उसे   पता है जो    शीशे सा   बिखर जाता है.

हमने       भी   ख़ुद    को   जोड़ा   है    तोड़कर,
अपने वजूद को एक   जा   किया    है   जोड़कर ,

टूट  कर भी   जुड़ना   कहाँ हर किसी को  आता है,
हर   कोई        कहाँ    ऐसी  क़िस्मत    पाता    है.

हर लम्हा  जब    तडपाये  भीड़ भी तन्हा कर जाये
जीने   की चाह   में     फिर जीने   वाले कहाँ जाएँ.

हर    लम्हा     अब    मुझे  तड़पा       रहा   है,
भीड़   में   भी   अकेलापन   नज़र   आ   रहा है.

"रजनी"






सोमवार, जुलाई 26, 2010

ये नशा , शराब का नहीं, उनकी आँखों का है.

 लोग कहते हैं मुझे,
बिन पिए ही झूमते हो,
क्या बताऊ ,
उनकी आँखों में ,
नशा ही,
 सौ बोतल का है
ये नशा ,
शराब का नहीं,
उनकी आँखों का है.

रविवार, जुलाई 25, 2010

बस अब एक, दूरी रह गयी , ख्वाब और, पलकों के दरमियाँ ."

" आज भी वो ख्वाब है,
मेरे पलकों पर,
जो मुद्दत पहले ,
कभी देखा था,
पूरी ना हुई,
बस अब एक,
दूरी रह गयी ,
ख्वाब और,
पलकों के दरमियाँ ."

बुधवार, जुलाई 21, 2010

खुद की पहचान भूल गयी.

"मुद्दत से संवारा था,
जिस अक्स को निगाहों ने,
आज उसे देखते ही,
खुद की पहचान भूल गयी.
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

जब चाँद पूछता है मुझसे

जब चाँद पूछता है मुझसे,
तुम किस बात पे,
यूँ इठलाती हो,
तब मेरा इठलाना ,
कुछ और बढ़  jata   है,
बड़े ही इठलाते अंदाज़ में ,
मैं उससे कहती हूँ,
 जैसे तेरी चांदनी है,
 तेरी चांदनी से भी प्यारा ,
 मेरा जीवनसाथी है ,
जब चाँद पूछता है मुझसे,
तुम किस बात पे यूँ ,
इठलाती हो,
तब मेरी धड़कन सीने की,
 और बढ़ जाती है,
बड़े ही इठलाते अंदाज़ में ,
मैं उससे कहती हूँ,
जैसे चकोर ,
तुझे देखने को ,
रोज आता है,
मेरे चाँद का भी,
 मुझसे ,
ऐसा प्यारा नाता है,
जब चाँद पूछता है मुझसे,
तुम किस बात पे यूँ ,
शर्माती हो,
तब मेरा शरमाना ,
और बढ़ जाता है,
बड़े ही शर्माते अंदाज़ में ,
मैं उससे कहती हूँ,
मेरे चाँद का ये कहना है,
वो चाँद आसमां  का,
 तेरा ही एक टुकडा है,
 उस चाँद से प्यारा ,
सलोना तेरा मुखड़ा है,
जब सुनती हूँ अपने बारे में,
 मेरा इठलाना ,
और बढ़ जाता है,
मै कहती हूँ चाँद से ,
तेरे पास जैसे ,
तेरी चांदनी है,
 तेरी चांदनी से भी प्यारा ,
 मेरा जीवनसाथी है ,
अब चाँद कहता है मुझसे,
बिना तेल जो जल जाए ,
तू वैसी बाती है,
किस्मतवाला है वो ,
तू जिसकी जीवनसाथी है,
अब चाँद कहता है मुझसे,
इठ्लानेवाली बात है ये,
तू जिसपे इठलाती है,
किस्मतवाला है वो,
तू जिसकी साथी है.
"rajni"
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मंगलवार, जुलाई 20, 2010

बादलों की , आगोश में जाकर, चाँद और निखर गया,

"बादलों की ,
आगोश में जाकर,
चाँद और निखर गया,
मिली जब ,
चांदनी उससे ,
बहुत उलझन में,
पड़ गयी ."
"rajni "

हर कोई , बन जायेगा , समंदर यहाँ "

" निगाहें ,
दरिया नहीं बन पायेगी,
जब ,
हर कोई ,
बन जायेगा ,
समंदर यहाँ "

सोमवार, जुलाई 19, 2010

कि ढल रही है शाम , अब तो आ जाओ".

"पथरा सी गयी निगाहें,
दीदार को,
फुरकत से ,
अब तो ख्वाब बन ,
कर छा जाओ,
 तेरी मंजिल कि  ,
डगर रुक गयी है .
कि ढल रही है शाम ,
अब तो आ जाओ".

गुरुवार, जुलाई 15, 2010

बिन पिए ही, मदहोश बना डाला , उनकी नशीली आँखों ने,

बिन पिए ही, मदहोश बना डाला ,
उनकी नशीली आँखों ने,
देखो क्या हाल हमारा है,
डूब के उनकी आँखों में,
सोंच इस मयकदे में आया,
ज़िन्दगी मिल जाएगी,
हमें क्या मालूम था,
डूब मरने को ,
ये निगाहें दरिया मिल जाएगी.

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

बुधवार, जुलाई 14, 2010

पर मेरे मन की धरा तो प्यासी ही रह जाती है

ऐ  सावन जब भी आता तू ,प्यास ज़मीन   की बुझ जाती है,
पर   मेरे   मन   की  धरा  तो  प्यासी  ही रह  जाती  है.

तेरे    आने से   ये  मौसम  रंगीं, रुत  जवां  हो  जाता है ,
खिल जाती हैं बाग़ की कलियाँ, भवरों के मन मुस्काते हैं.

मेरा   गुलशन     ऐसे     बिखरा ,  जैसे   टूटी   डाली हो,
मेरा    अंतर   ऐसे   सूना ,जैसे    बाग़   बिन   माली  हो.

इस   विरह से आतप  धरती को  तो ,दुल्हन कर जाते हो,
पर  मेरे   नस-नस    में दामिनियों   के दंश   गिराते   हो .

ए सावन  जब  भी  आता तू ,प्यास ज़मीन  की बुझ जाती है,
पर     मेरे  मन  की  धरा   तो  प्यासी    ही रह   जाती  है.

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"