मंगलवार, जनवरी 06, 2015
" वो औरत नहीं "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 6.1.15 2 comments
शनिवार, मई 11, 2013
थपकी, चुम्बन, मीठी लोरी , ऐसे प्यार जताती है माँ
थपकी, चुम्बन, मीठी लोरी , ऐसे प्यार जताती है माँ,
लाल - पीली होकर गुस्से से, फटकार लगाती है माँ .
सीने से लिपट जाती है,छोड़- चूल्हा -चौका, झाड़ू बर्तन ,
बच्चों के दुःख में खुशियों का उपहार बन जाती है माँ
देकर अपने ममता का संबल, जीते जीवन का हर दंगल
कभी ढाल बनकर डटे ,कभी तलवार बन जाती है माँ .
काँटों के गुलशन में भी फूलों का हार बन जाती है
बच्चों की खुशियों में त्यौहार बन जाती है माँ
दे कर ममता स्नेह की बहती धार बन जाती है
प्यासे धरा पर सावन की बौछार बन जाती है माँ,
जीवन के हर एक उलझन , ले कर अपने अंकों में ,
कर दे मात नियति को भी ,ऐसी औजार बन जाती है माँ |
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
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गुरुवार, मई 09, 2013
हो जाता है रिश्तों का रासायनिकरण
कफ़स में कैद से लगते हैं, तब
दो लोगों के बीच की डोर ,
छूटने लगती है ,
टूटने के लिए |
या फिर गिरह पड़ जाते हैं
उस डोर में
जिसने दो सोच को,दो आत्माओं को,
दो शरीर को एक करने में
अपनी अस्तित्व ही मिटा दी |
बरबस ही,
मैं और तुम से हम का हो जाना ,
और फिर से वापस मैं और तुम में बदल जाना ,
ऐसा ही लगता है न ?
जैसे जीवन की प्रयोगशाला में भी ,
कोई रासायनिक क्रिया चल कर ,
बदल देती है एक ही पल में,
रिश्तों का समीकरण
हो जाता है रिश्तों का भी रासायनिकरण |
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
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सोमवार, मार्च 25, 2013
अब आग पर चलने जैसा, हो गया है चौराहा,
जिसे भी अपना समझा , बदले में पाया गाली |
किस बात का अचम्भा किस बात का है झगड़ा,
स्वीस बैंक भर उनके, है दामन अपना खाली |
क्योंकर वो सुनेंगे शोर तेरे , हों जिसके हाथ सेंसर ?
कहीं पे बदनाम मुन्नी , कहीं हुई शीला कहानी |
अब आग पर चलने जैसा, हो गया है चौराहा,
मौवालियों को दिखें हर आती-जाती कलियाँ साली |
कई सराफ़त के पुतलों के घरों में , आ गया बवंडर ,
एक बेवा ने अपनी मर्ज़ी से घर क्या बसा ली |
वो मासूम कली रोकर ,पकड़ कर पांव उसके बोली,
बाबा ब्याह ना कराना ,अभी तो मेरी उमरिया बाली |
"रजनी मल्होत्रा नैय्यर "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 25.3.13 6 comments
मंगलवार, मार्च 19, 2013
हम दास्ताँ अपनी , दीवारों को सुनाने लगे .
जब गीत तिरंगे की शान में गाने लगे,
कुछ लोग सियासत की आग भड़काने लगे.
जब पूछा गया शहीदों का नाम और पता,
चोर - उचक्के नाम अपना लिखाने लगे.
जूठे बर्तनों को माँजकर जिन्हें थी पाली ,
कह मुस्काने लगी, मेरे बच्चे कमाने लगे .
वक़्त ने चाल ही कुछ ऐसी बदली ,
संभल कर चलनेवाले भी, मुंह की खाने लगे,
सुना जबसे होते हैं दीवारों के भी कान,
हम दास्ताँ अपनी , दीवारों को सुनाने लगे .
छोड़ दिया साथ , तक़दीर ने ज़माने से मिलकर ,
मन में हौसलों के दिये जगमगाने लगे .
कोयले की खान से घुम कर जो आ गए,
काजल की कोठरी से दामन बचाने लगे,
जब भी कहा ख्वाहिशों से बातें तहज़ीब की,
मुझसे रूठ कर वो, मुंह मोड़ जाने लगे .
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 19.3.13 6 comments
रविवार, मार्च 10, 2013
उनका क्या होगा , जो मोम से ढले हैं
उनका क्या होगा , जो मोम से ढले हैं ?
चलता जा रहा मेरे दिल का काफिला,
जाने क्या है मंजिल जिस ओर पग चले हैं .
मेरी ही अदालत में मेरा ही मुजरिम,
देकर अगली तारीख़ मुझको ही छले हैं ?
फूल पर पड़े कि शोलों पर पड़े हैं ,
एक बिजली कौंधती है जब पाँव जलें हैं
जैसे देखता हो कोई दिन में सितारे,
वैसे गरीब के मन कोई ख़्वाब पले हैं.
जाते हैं कई उड़ कर बुलंदी की मकाँ पर,
वो गिर कर उंचाईयों से हाथ मले हैं |
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 10.3.13 2 comments
गुरुवार, मार्च 07, 2013
फिर पड़ेंगे ओले जरा सर तो मुड़ायिये
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 7.3.13 7 comments
बुधवार, फ़रवरी 27, 2013
बंजर आदमी
फिरता है लिए हाथों में खंजर आदमी |
वैर की अग्न से सूखा, प्रेम की नदी को,
बन बैठा विष भरा समंदर आदमी,
देख कर दूसरे की शांति अमन को ,
सुलग रहा अंदर ही अंदर आदमी
गैर भी थे अपने, ऐसा चलन था
रहता था मस्त कलंदर आदमी
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 27.2.13 5 comments
शुक्रवार, फ़रवरी 01, 2013
समय का यह ठिठुरा संवाद
वेदना के तारों का ,
छिड़ा मन से विवाद,
देख कर ,
समय का यह ठिठुरा संवाद !
रुग्न बसंती बयार,
कुपित श्रृष्टि का सार,
प्रकृति भी मौन ,
वो संचालक कौन ?
प्रत्यक्ष है प्रमाणित,
फिर भी है निर्विवाद !
सलज से अब मूक नैनों के शील,
पाप की सरिका कान्तिमान ,
अँधेरे का चारण बना विहान |
समीहा में जलते प्राण
कैसे हो युगनिर्माण ?
वेदना के तारों का ,
छिड़ा मन से विवाद,
देख कर ,
समय का यह ठिठुरा संवाद !
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 1.2.13 4 comments
शनिवार, दिसंबर 22, 2012
नारी सिर्फ एक मादा देह नहीं |
प्रकृति की सुन्दरतम रचना है |
जैसे तुम हो पुतले ,
हाड़ मास के बने हुए |
जीती , जागती , साँस लेती है ,
वो भी बिलकुल तुम्हारी तरह |
कैसे समझ लिया नारी को,
सिर्फ भोग की वस्तु ?
जब चाहा रौंद डाला |
इससे तुम्हारी पुरुषता
उसी दिन नामर्दी में तब्दील हो गयी ,
जिस दिन किया ,
किसी अबला के हया को तार -तार |
भूल गए शायद ?
तुम्हारे अस्तित्व का कारण भी ,
वो ही है एक मादा देह |
फिर कैसे मिलाते हो ,
नज़रें , किसी से ?
जो अपने कमजोरी को ,
पुरुषत्व समझ कर समझता है,
एक निरीह को रौंद कर ,
अपनी मर्दानगी साबित कर दी है ,
धिक्कार है ऐसे कापुरुषों पर,
अपनी ही रचना पर आज प्रकृति क्यों है मौन ?
अबला के जख्म पर दे ऐसी मरहम ,
ऐसे कापुरुषों का पुरूषत्व
कई सदियों तक न जागे |
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 22.12.12 13 comments
