रविवार, मई 10, 2015
संस्कार
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 10.5.15 0 comments
बुधवार, अप्रैल 29, 2015
कौन श्रेष्ठ प्रकृति या पुरुष ?
उत्तर आधुनिकता
की ओर आ गए,
कर ली होड़
जीत ली बाज़ी
दे सकते हो मात नियति को,
फिर क्यों
कराह है, क्यों अश्रु जल से
पूरित हो ?
कर लिया है निर्माण
हर तरह का साँचा
टेस्ट ट्यूब बेबी हो या
मानव क्लोन !
कृतिम सांसें,
कृतिम अंग .
भौतिकता से
अटे पड़े हैं
तुम्हारे दिग
और जारी है विस्तार
ऐ मनुज !
कर लो निर्माण
एक और धरा की ,
ले आओ
एक सूर्य और,
चन्द्र भी कहीं से,
जब सब कुछ है
तुम्हारे हाथों में |
फिर तबाही से
क्यों विस्मित हो ?
असमय ही गर्त में
ले जायेगा
अंध दौड़ |
धरा ,
खाद की जगह लहू लेगी,
मौत की फसल खिलायेगी
अपने अंक में |
कौन श्रेष्ठ प्रकृति या पुरुष ?
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 29.4.15 1 comments
शनिवार, अप्रैल 18, 2015
आचरण का पौधा
कुछ सिक्के ,
तुम्हारी हथेली पर
जिनसे तुम खरीद सको
कुछ मूलयवान वस्तुएं,
जो धरोहर के रूप में संजो दें |
वक़्त के साथ - साथ ,
ये अपनी
मांग और कीमत को
निखारती चलें ,
जिसे कह सकें अनमोल
आनेवाले वंशज ,
दिखा सकें
और महसूस करें खुद को गौरवान्वित ,
तुम ही बोलो क्या खरीदना चाहोगे
इस सांसारिक बाजार से ?
भौतिकता की चमक
में खोना चाहते हो ?
अंधी दौड़ में शामिल
होना चाहते हो ?
या ,
बाजार में अपना
अस्तित्व ढूंढते ढूंढते
उनमे ही विलुप्त हो जाना ?
केशर हो या कस्तूरी ,
विष हो या अमृत,
ये किसी भी आकार में
किसी भी युग में
किसी भी पात्र में आकर
अपना
अस्तित्व नही खोते.
मैंने भी संजोया था एक सिक्का,
और
जीवन पर्यन्त न खोने वाली
वस्तु जिसे आचरण के नाम
से जानती हूँ ,
इसे हस्तगत स्थानांतरण
करना चाहती हूँ,
जो चलती रहे
पीढ़ी दर पीढ़ी |
समय के साथ
इसकी मांग और
कीमत में उत्तरोत्तर
बढ़ोतरी आती जाये ,
ये आचरण का पौधा
नही मिलता है
किसी भी बाजार में,
न इसे खरीदे जा सकते ,
हाँ आजकल
आचरण बिकते जरूर हैं !
चंद जरुरत ,
चंद सिक्के !
और आचरण ,
घर की दहलीज को फाँदती
पहुंच जाती है बहुत दूर ,
हो जाती है तेरे और मेरे
पहुंच से ओझल या लापता |
.
"रजनी मल्होत्रा ( नैय्यर )
बोकारो थर्मल
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 18.4.15 0 comments
एक रेखा
एक रेखा |
जिसे,
नाम नही दिया था
बस इतना पता था,
इसके घेरे से बाहर जाना है,
तभी टूटेगी भ्रामक सोच |
हर दिन के साथ
बढ़ती गयी ,
परिधि रेखा की...
छोटे होते गए
विकृत विचार,
अवमाननायें ,
जिसने उद्गार का सोता
बंद कर दिया था |
पनप चुके
धधकते ज्वालामुखी ने ,
ले लिया था आकार,
बस तलाश थी
कमजोर ज़मीं की,
एक दिन फूटा ,
सोता उद्गार का
फिर ,
हट गए सारे प्रश्नचिन्ह,
जिसने
मानदंड तय कर रखे थे ,
हर रेखा लक्ष्मण रेखा सी प्रतिबंधित होती है |
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 18.4.15 0 comments
दायरों का टूटना
" तंग "
हों या " विस्तृत "
कोई फर्क नहीं पड़ता |
यदि
मायने रखता है तो वो ,
दायरों का टूटना
या उनसे निकलना |
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मान्यताओं की
एक परिधि लाँघ कर,
हम
नवीन तथ्यों के लिए
कई रास्ते खोल देते हैं ..
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 18.4.15 0 comments
गुरुवार, अप्रैल 02, 2015
नहीं कहला रहे नीलकंठ
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 2.4.15 3 comments
शुक्रवार, मार्च 13, 2015
ग़ज़ल
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 13.3.15 3 comments
मंगलवार, जनवरी 06, 2015
" वो औरत नहीं "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 6.1.15 2 comments
शनिवार, मई 11, 2013
थपकी, चुम्बन, मीठी लोरी , ऐसे प्यार जताती है माँ
थपकी, चुम्बन, मीठी लोरी , ऐसे प्यार जताती है माँ,
लाल - पीली होकर गुस्से से, फटकार लगाती है माँ .
सीने से लिपट जाती है,छोड़- चूल्हा -चौका, झाड़ू बर्तन ,
बच्चों के दुःख में खुशियों का उपहार बन जाती है माँ
देकर अपने ममता का संबल, जीते जीवन का हर दंगल
कभी ढाल बनकर डटे ,कभी तलवार बन जाती है माँ .
काँटों के गुलशन में भी फूलों का हार बन जाती है
बच्चों की खुशियों में त्यौहार बन जाती है माँ
दे कर ममता स्नेह की बहती धार बन जाती है
प्यासे धरा पर सावन की बौछार बन जाती है माँ,
जीवन के हर एक उलझन , ले कर अपने अंकों में ,
कर दे मात नियति को भी ,ऐसी औजार बन जाती है माँ |
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 11.5.13 7 comments
गुरुवार, मई 09, 2013
हो जाता है रिश्तों का रासायनिकरण
कफ़स में कैद से लगते हैं, तब
दो लोगों के बीच की डोर ,
छूटने लगती है ,
टूटने के लिए |
या फिर गिरह पड़ जाते हैं
उस डोर में
जिसने दो सोच को,दो आत्माओं को,
दो शरीर को एक करने में
अपनी अस्तित्व ही मिटा दी |
बरबस ही,
मैं और तुम से हम का हो जाना ,
और फिर से वापस मैं और तुम में बदल जाना ,
ऐसा ही लगता है न ?
जैसे जीवन की प्रयोगशाला में भी ,
कोई रासायनिक क्रिया चल कर ,
बदल देती है एक ही पल में,
रिश्तों का समीकरण
हो जाता है रिश्तों का भी रासायनिकरण |
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 9.5.13 4 comments
