रविवार, मई 10, 2015

संस्कार



संस्कार से पोषित पौधे,
पनपते हैं
अपनी ही धरातल  में,
अपने दायरे और
मयार से बंधित
और अनुशंषित |
संस्कार विधान
कितना अनूठा है
अपने आप में ,
बहुमुखी और
विस्तारित
जीवनीशैली से
बंधा हुआ
देता है विस्तार
असंख्य अनुभूतियों को ,
जो मर्यादित और
 अनुशंसित  सोच से
 फलित  होती है
जब वही मर्यादित  बंधन
उच्श्रृंखलता
का रूप ले लें तो
 टूट जाते हैं सारे दायरे
तार तार हो जाती है
मर्यादित संस्कार
जिसे विभूषित करते आये हैं
मनीषी अपनी
कलाओं  में, पांडुलिपियों में,
और
किया गया है जिसका वर्णन 
प्राकृतिक
उपमाओं में
कभी कभी आ गयी हैं
प्रश्नो के घेरे में
ये अजंता एलोरा की
भीति चित्रावलियाँ भी ,
जिन्हे उकेरे गए थे
कभी
मानवीय संवेदनाओं को
जगाने के लिए,
और, पल्ल्वित कर दिए गए थे
उनसे एक अंकुर
जो धीरे-धीरे
 प्रस्फुटित हुआ
बनकर प्रेम का
 एक पौधा |
सोये हुए अंग -प्रत्यंग में
 जीवंत
और स्फुरित करती
भरती हुई संचारित 
शक्तियों को
कभी कभी ये जीवंत
भीति चित्रावलियां,
भर देती
मादकता और
छलकता प्रेम
जिसे जाना गया
वासना के नाम से |
पर क्या संभव है
संसार में सबका
आचरण से
शंकराचार्य  या गौतम हो जाना ?
संसार के भीति
को भी चाहिए
कुछ चित्रावलियाँ,
जिससे वो उकेर सके आनेवाली
अनुशंसाओं को,
भविष्यवली वो भी सजाये
अपने होने का उसे भी
एहसास चाहिए
बनी रहे निरंतरता
चलता रहे संसार
बस बदले गए तो युग
जैसे बदलता है हर वर्ष
गत और आनेवाले के बीच
रह जाती है
तो वो
स्मरणीय चिन्ह
 जिन्हे यादें
या इतिहास कहते हैं ...
घूमता रहता है संस्कार
अपने अक्ष पर |
कभी कभी इसके बिगड़ने पर
लांक्षित होती है मर्यादा…
जैसे  हम दोष देते हैं
प्रकृति को ,
आनेवाली सुनामी अथवा अन्य
हादसों  के लिए |
उसी तरह संस्कार से विहीन
होती पीढ़ियां,
संस्कार को लांघती पीढ़ियां
अमर्यादित कर देती हैं
अपने ही जनक को …


"रजनी मल्होत्रा नैय्यर "

बुधवार, अप्रैल 29, 2015

कौन श्रेष्ठ प्रकृति या पुरुष ?

कुछ प्रकृति की ओर से ..........
तुम आधुनिकता से ,
उत्तर आधुनिकता
की ओर आ गए,
कर ली होड़
जीत ली बाज़ी
दे सकते हो मात नियति को,
फिर क्यों
कराह है, क्यों अश्रु जल से
पूरित हो ?
कर लिया है निर्माण
हर तरह का साँचा
टेस्ट ट्यूब बेबी हो या
मानव क्लोन !
कृतिम सांसें,
कृतिम अंग .
भौतिकता से
अटे पड़े हैं
तुम्हारे दिग
और जारी है विस्तार
ऐ मनुज !
कर लो निर्माण
एक और धरा की ,
ले आओ
एक सूर्य और,
चन्द्र भी कहीं से,
जब सब कुछ है
तुम्हारे हाथों में |
फिर तबाही से
क्यों विस्मित हो ?
असमय ही गर्त में
ले जायेगा
अंध दौड़ |
धरा ,
खाद की जगह लहू लेगी,
मौत की फसल खिलायेगी
अपने अंक में |
कौन श्रेष्ठ प्रकृति या पुरुष ?

शनिवार, अप्रैल 18, 2015

आचरण का पौधा

रखना चाहती हूँ
कुछ सिक्के ,
तुम्हारी हथेली पर
जिनसे  तुम खरीद सको  
कुछ मूलयवान वस्तुएं,
जो धरोहर के रूप में संजो दें |
वक़्त के साथ - साथ ,

ये अपनी
मांग और कीमत को
निखारती चलें ,

जिसे कह सकें  अनमोल 
आनेवाले वंशज ,
दिखा सकें
और महसूस करें खुद को गौरवान्वित ,
तुम ही बोलो क्या खरीदना चाहोगे
इस सांसारिक बाजार से ?
भौतिकता की चमक
में खोना चाहते हो ?
अंधी दौड़ में शामिल
होना चाहते हो ?
या ,
बाजार में अपना
अस्तित्व ढूंढते ढूंढते
उनमे ही विलुप्त हो जाना ?
केशर हो या कस्तूरी ,
विष हो या अमृत,
ये किसी भी आकार में
किसी भी युग में
किसी भी पात्र में आकर
 अपना
अस्तित्व नही खोते.
मैंने भी संजोया था एक सिक्का,
और
जीवन पर्यन्त न खोने वाली
वस्तु जिसे आचरण के नाम
से जानती हूँ ,
इसे हस्तगत स्थानांतरण
करना चाहती हूँ,
जो चलती रहे
पीढ़ी दर पीढ़ी |
समय के साथ
इसकी मांग और 
कीमत में उत्तरोत्तर
बढ़ोतरी आती जाये ,
ये आचरण का पौधा
नही मिलता है
किसी भी बाजार में,
न इसे खरीदे जा सकते ,
हाँ आजकल
आचरण बिकते जरूर हैं !
चंद जरुरत ,
चंद सिक्के !
और आचरण ,
घर की दहलीज को फाँदती
पहुंच जाती है बहुत दूर ,
हो जाती है तेरे और मेरे
पहुंच से ओझल या लापता |
.
"रजनी मल्होत्रा ( नैय्यर )
बोकारो थर्मल

एक रेखा

मैंने भी खींची थी , 
एक रेखा | 
जिसे,
नाम नही दिया था 
बस इतना पता था, 
इसके घेरे से बाहर जाना है, 
तभी टूटेगी भ्रामक सोच |
हर दिन के साथ 

बढ़ती गयी ,
परिधि रेखा की...
छोटे होते गए 

विकृत विचार, 
अवमाननायें ,
जिसने उद्गार का सोता 

बंद कर दिया था |
पनप चुके 

धधकते  ज्वालामुखी  ने ,
ले लिया था आकार,
बस तलाश थी 

कमजोर ज़मीं की,
एक दिन फूटा ,

सोता उद्गार का
फिर ,
हट गए सारे प्रश्नचिन्ह,
जिसने
मानदंड तय कर रखे थे ,
हर रेखा लक्ष्मण रेखा सी प्रतिबंधित होती है |

दायरों का टूटना

दायरे 
" तंग " 
हों या " विस्तृत " 
कोई फर्क नहीं पड़ता |
यदि 
मायने रखता है तो वो ,
दायरों का टूटना
या उनसे निकलना |


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मान्यताओं की
एक परिधि लाँघ कर,
हम 
नवीन तथ्यों के लिए
कई रास्ते खोल देते हैं ..








गुरुवार, अप्रैल 02, 2015

नहीं कहला रहे नीलकंठ

कई बार खो जाते हैं ,
साथ  रहते,चलते
करीबी रिश्ते |
जब ,
सर उठाने लगती है
साथ गुजारे  
लम्हे
कुछ लौट आते हैं
उलटे क़दम
जैसे आ जाता है ,
सुबह का निकला पंछी नीड़ में |
कुछ अजनबी बन कर
नदी का किनारा सा रह जाते हैं |
पी रहे हैं ,
हमारे तुम्हारे जैसे
सरल आशुतोष
रिश्तों के मंथन से निकले विष को
पर नहीं कहला रहे नीलकंठ !
दूर खड़ी
मौन ,  टूटे मनके को
रह-रह कर  बांधती है ,
पर भावनाओं के बिखरे  मोती
छटक कर दूर चले जाते हैं !

"रजनी मल्होत्रा (नैय्यर )


शुक्रवार, मार्च 13, 2015

ग़ज़ल

 'द  सोहेल 'कोलकाता  की मासिक पत्रिका में छपी मेरी ग़ज़ल

और कितने आसमान चाहिए उसअत के लिए
ज़मीं  कम पड़ने  लगी    है    राहत  के   लिए

आ  की !  दोस्ती   का   एक   पौधा  लगा दें
बहुत  वक़्त  पड़ा    है  अदावत    के     लिए

हर  सु  है   गिराँबारी   का   आलम अल्लाह
वक़्त माकूल   सा  लगत  है बगावत के लिए

कई  पेच - व्- ख़म    बाक़ी     हैं   ज़ीस्त  के
साज़ - वो - नगमा उठा  रखो  फुर्सत के लिए 

लफ़्ज़ों   में बयाँ  कर   न   सकूंगी   जज़बात 
हौसले  दिल में  हैं उर्दू   की अज़मत  के लिए

बस  इक किरण  उजाले  की  ज़माने  को  दूँ
है ग़ज़ल "रजनी " दुनिया की मुसर्रत के लिए

उसअत -   फैलाव
अदावत -   दुश्मंनी
गिराँबारी -  महंगाई
ज़ीस्त -     ज़िन्दगी
अजमत – महत्व
मुसर्रत  -  खुशी

" रजनी मल्होत्रा नैय्यर " 
 (बोकारो थर्मल )



    

मंगलवार, जनवरी 06, 2015

" वो औरत नहीं "

         

 घना कोहरा सा  दबा हुआ दर्द मासूम मजबूर का , आहिस्ता -आहिस्ता  फैलता हुआ  समेट  लेता  है संपूर्ण जीवन के हर कोण - त्रिकोण को |   परिवर्तन और परावर्तन के नियम से कोसों दूर उसका संवेग और सोचने की क्षमता बस लांघना चाहती है उस उठते लपट को जिसने  घेर कर बना रखी है शोषक और शोषित के बीच की एक मजबूत सी दीवार और कुछ रेखाएँ |   यह कुदरत के नियम का कैसा  मखौल है , सम शारीरिक संरचना को सिर्फ रंग भेद और कुछ सिक्कों की खनक  कर देती है अलग जैसे कागों और बगुलों की अपनी-अपनी सभा | इस आदम भेड़िये के बीच की खाई देख सहसा कह उठता है मन ये क्या ? इस तकरार और भेद की नीति में एक सिक्का कैसे सिमट कर रह गया | शायद इस संरचना के साथ कोई जाति ,  रंग भेद की नीति नहीं चलती , चलती  है तो बस एक देह की जो मांसल और कोमल है जिसके आस्वादन के लिए जरुरी नहीं उसकी इच्छा की  मंजूरी , उसकी उम्र, भावना , परिपक्वता, अपरिपक्व होना | गिद्धों के पंजे और नाख़ून उसमे समाकर ढूंढ़ ही लेते  हैं अपना आहार | दिन के उजाले में कभी रात के अंधकार में तलाशता हुआ चला जाता है भूखे भेड़ियों का  झुण्ड किसी निरीह मेमने की शिकार को |
देता हुआ  प्रलोभन सुनता है हर आलाप को , और मिट जाते हैं टुकड़े भर कागज में लगे अंगूठे के निशान जो कभी गवाही बने शोषक की लाचारी का |
अब एक कोने में सिमटते हुए सूखे पत्ते  सी टूटती नार  को करना है तार- तार  अपनी अस्मत  त्याग के हवनकुंड में , जिसमे जलकर उसका स्वाभिमान हो जायेगा कई तड़पते और भूखे पेटों  का पोषक |
चाहे नश्वर शरीर को जीत ले कोई  ,पर आत्मा तो उसे ही प्राप्य है  स्व को सौपा हो जिसे | वो अपने अहं को मार कर कर लेगी जिन्दा कई निष्प्राण शरीर को जिनसे वो जुडी है कई रिश्तों के साथ अम्मा, पत्नी , बेटी  पर कहीं से भी वो औरत नहीं " सिर्फ एक देह है जो नश्वर है

अपवित्र नहीं है  कर लेगी फिर से वो अपना परिष्कार , बना लेगी इस बात का साक्ष्य अपने वेणी के गांठ को | उसका शोषण और दोहन हो ही नहीं सकता वो जानती है कहीं से भी वो औरत नहीं " सिर्फ एक देह है जो नश्वर है औरत कभी नहीं मरती उससे ही वजूद है संसार का | शैतान,  संत , राग, वैराग सब उसकी ही उत्पति हैं |
उसकी पवित्रता की साक्ष्य स्वयं धरा है जो कहती है  परिष्कार की आवश्यकता नहीं उसे क्योंकि उसके क़दमों से ही धरा उर्वर होती है , महक उठता है फिजा उसकी देह की महकती धुनी से | वो तोड़ती है हर चक्रव्यूह  को तब जीत पाता है मनु (mnushy) महाभारत का युद्ध | वो दौड़ती है  शुष्क से जीवन में बनकर रक्त वाहिका तभी स्पंदित होता है परिवार | बनकर परिधि वो बांधे रखती है अपनी स्नेह के गुरुत्वकर्ष्ण से तब जाकर सम्भलता है जीवन का रेला | परिषेचक  बनकर महकाती है बगिया , कभी मृदुल कभी लवन बनाकर अपने अंतस को |
पर कुटुंब को समर्पित परिचारिका पाती है वंचना, लांछन, परिघात  और कभी - कभी कर दिया जाता है उसका परित्याग उसी के द्वारा  जिसने अग्नि को साक्षी बना फेरों व् कसमों की मजबूत कफ़स में क़ैद  कर अपने कुत्सित विचारों को बन बैठता है किसी का भाग्यविधाता, परित्राता |
" वो औरत नहीं "  पावन धाम है जिसे पवित्र निगाहें छुकर मोक्ष पा जाते हैं |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

बोकारो थर्मल 

शनिवार, मई 11, 2013

थपकी, चुम्बन, मीठी लोरी , ऐसे प्यार जताती है माँ

 दुनियां की हर माँ को नमन ...........   

थपकी, चुम्बन, मीठी लोरी , ऐसे प्यार जताती   है   माँ,
लाल  - पीली  होकर गुस्से से, फटकार   लगाती   है  माँ .

सीने से लिपट जाती है,छोड़- चूल्हा -चौका, झाड़ू  बर्तन ,
बच्चों  के दुःख में  खुशियों  का उपहार बन  जाती है माँ

देकर अपने ममता का संबल, जीते जीवन का हर दंगल
कभी  ढाल बनकर  डटे ,कभी  तलवार बन जाती  है  माँ .

काँटों के  गुलशन में   भी फूलों  का हार   बन   जाती    है
बच्चों    की    खुशियों  में   त्यौहार   बन  जाती    है   माँ

दे कर   ममता   स्नेह     की बहती   धार बन   जाती है
प्यासे   धरा पर   सावन की   बौछार   बन जाती  है माँ,

जीवन  के हर   एक उलझन , ले   कर अपने    अंकों   में ,
कर दे मात नियति को भी ,ऐसी औजार बन जाती है माँ |


 "रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

गुरुवार, मई 09, 2013

हो जाता है रिश्तों का रासायनिकरण

 जब रिश्ते पारदर्शी होकर भी,
कफ़स में कैद से लगते हैं, तब
दो लोगों के बीच की डोर ,
छूटने लगती है ,
टूटने के लिए |
या फिर गिरह पड़ जाते हैं
उस डोर में   
जिसने दो सोच को,दो आत्माओं  को,
दो शरीर को एक करने में
अपनी  अस्तित्व ही मिटा दी  |
बरबस ही,
मैं और तुम से हम का हो जाना ,
और फिर से वापस मैं और तुम में बदल जाना ,
ऐसा ही लगता है न ?
जैसे जीवन की प्रयोगशाला में भी ,
कोई रासायनिक क्रिया चल कर ,
बदल देती है एक ही पल में,
रिश्तों का समीकरण
 हो जाता है  रिश्तों  का भी    रासायनिकरण |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "