शनिवार, अप्रैल 14, 2012

ये कैसी रिश्तों की विदाई

घरों   के    बंटवारे   में     रिश्ते    सिमट      गए,
कल  तक घर   था  अब  कमरों   में   सिमट  गए.

भाग   दौड़   करते   थे   सारे   घर   में   कूदाफांदी,
छीन   गयी    उन   मासूम  बच्चो    की   आज़ादी.

दादा,- दादी,   चाचा - चाची, रिश्तों का ये भारीपन,
बड़ों   के   मतभेद   में   ना   पीसो  बच्चों  का  मन .

बंटवारे   की   शर्त  घरों   को दीवारों   में  पाट  गयी
दिल   से  जुड़े   रिश्तों  को   मतलबों  में   बाँट  गयी

खेल खेल में चुन्नू,मुन्नू  बिन्नी का व्याह  रचाते  थे,
 वक़्त   विदाई आने पर ,एक दूजे  को   ताब बंधाते थे.

आज   वो   दिन   भी    आया  बिन्नी   हुई  परायी ,
 उसकी डोली को देने  कान्धा, आया   ना कोई भाई,

ये       कैसी           रिश्तों        की            विदाई,
ये       कैसी          रिश्तों        की             विदाई ?

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"


रविवार, अप्रैल 08, 2012

विमान परिचारिका

अक्सर कहती थी मुझसे,
जब भी वो फुरसत के लम्हों में
मेरे साथ होती ,
"मुझे चाँद पर जाना है"
सुनकर मैं हंस देती,
तुम क्या-क्या करोगी?
अजीब सी तमन्नाएं सुनाती रहती हो ,
कभी विमान परिचारिका
बनने का सपना ,
कभी कहती काश मै परिंदा होती,
सारा आकाश नाप आती,
पर चाँद पर जाने के लिए परिंदा होना काफी नहीं ,
कह कर मायूस हो जाती
फिर कुछ पल खामोश रह कर,
करती कुछ सवाल..
क्या मन की खूबसूरती काफी नहीं,
कुछ पाने के लिए ,
तन की खूबसूरती ही जरुरी है
विमान परिचारिका
बनने के लिए मेरे पास खुबसूरत मन तो है,
पर खुबसूरत चेहरा कहाँ  से लाऊं ?
उसकी वो ख़ामोशी, वो तड़प,
अंतर्मन की चाह
सब मुझे ऐसे प्रतीत होते थे
जैसे आम सी ज़िन्दगी ,
और आम इच्छाओं को लिए लोग
अंतर्मुखी स्वभाव ,
पर गहरी  सोंच में वो चाहत ,
एक कील सी दबी थी|
वक़्त की बदलती करवटों में
धुंधली होती गयी हर तस्वीर
जो खिंची थी उसने
मेरे साथ बैठ कर|
अनायास ही एक दिन ,
वो ज़िन्दगी और मौत से लड़ रही,
अस्पताल के बिस्तर पर,
मुझे देखते ही बस इतना कहा .......
"अब तो कोई योग्यता नहीं चाहिए मुझे चाँद पर जाने के लिए "
मेरी अर्जी शायद सुन ली उपरवाले ने,
अवाक् उसे देखती रही ,
पत्थर की तरह हो गयी  ,
 मै एक पल को,
आज जब भी,
 दिन हो या रात
चाँद देख कर
वो नज़र आती है,
जो कहीं छुप गयी
चाँद के पीछे |
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

रविवार, मार्च 25, 2012

कौन सा ऐनक लगा लूँ मै

कौन सा ऐनक लगा लूँ मै,
जिससे ढँक जाये
तैरती हुई नमी आँखों की,
तुम तो आसानी से छुपा लेती हो
कई राज़,
अपने गर्भ में,
मचलते हैं कभी
लावा बनकर
जब जज्बात अन्दर,
तोड़ने को व्याकुल होकर
पाकर कमजोर सतह को,
समेट लेती हो
बड़े अनूठे अंदाज़ में,
जिसे बंजर के नाम से
पुकारते है कभी-कभी लोग,
कौन जाने,कौन समझे
जब सम्पूर्ण तरलता छा जाएगी,
तो होगा ना सृष्टि का विनाश,
तुमसे ही तो सीखा है ,
ऐ धरा ?
प्रयत्न भी है,
न तोड़कर बाहर आ जाये,
मन के उदगार का सोता,
और ले ले कोई रूप
जलते हुए ज्वालामुखी का,
या फिर लहरें हिलोर लेते,
न बदल जाएँ तूफान में,
नहीं होना चाहिए
रिश्तों के भूमि का
आच्छादन,
जिससे रिश्ते की भूमि
हो जाये बंजर,शुष्क,
डरती हूँ तरलता से भी,
क्योंकि,कमजोर नींव
तरलता पाकर
गिर जाती है|
पहना दो कोई ऐनक
मुझे भी,
जिसमे न दिख पाए
आर-पार,
शुष्क है निगाह
कि वहां नमी है |
"रजनी"
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शुक्रवार, मार्च 16, 2012

नहीं मिलती कहीं राहत जहाँ में , ग़म के मारे को

मेरी तबीयत भी मिलती है नदिया के पानी से,
जो पल में बदल देती है अपने धारे को |

इस रास्ते मैंने गुज़ारे कई सफ़र तन्हा ,
मगर दिल ढून्ढ़ता है आज किसी सहारे को |

मिटा न दे लहर ,किनारे पर नाम लिखा तेरा
छिपा दिया पत्थर से, उस दरिया के किनारे को |

डगमगाते क़दम को जिससे मिल गयी मंजिल,
कैसे भूल जाये कोई उस राह के नज़ारे को |

मिले बातों से तस्कीन , कुछ पल भला "रजनी",
नहीं मिलती कहीं राहत जहाँ में , ग़म के मारे को |

--
रजनी मल्होत्रा नैय्यर

बुधवार, मार्च 07, 2012

इस बार होली में

 दिल  का टुकड़ा , रहा बरस भर घर से  बाहर
माँ  चूमे  मुखड़ा , घर  बेटा आया होली   में |

मेहँदी   छूटने  से पहले  चला गया  परदेश   जो
बिछड़ी उस विरहन से मिलने , आया  होली   में |

जिस बेटी की हुई विदाई इसी माह  के अन्दर,
पलकें भींगी राह तकेगी, इस बार   होली  में |

कल तक  रंजिश   थी  जिसको  जिस किसी  से ,
मिलकर  साथ  में ,  धो  डालो  रंजिश होली  में |

सूना है "रजनी" वो छोड़कर  फिरसे   चला जायेगा ,
जो  रंग कभी ना जायेगा,   डालो इस बार  होली में |




शुक्रवार, मार्च 02, 2012

कोख के चिराग़ को

हर बात ,
घुमती रही उसके ज़ेहन में
सारी रात,
कहीं कल का सवेरा
न बुझा दे,
मेरी कोख के चिराग़ को
अगर फिर से कट गयी
मेरे कोख में बेटी |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

शुक्रवार, फ़रवरी 24, 2012

जैसे कोई ख़्वाब से हिलाकर जगा दिया हो

दिन इधर जो  बीते कुछ इस तरह से  मेरे
जैसे कोई ख़्वाब से हिलाकर जगा दिया हो

दे  कर   सामने    मुरादों  से   भरी  थाली
लेने   की सूरत  में  फ़ौरन  हटा   दिया हो

हसरतें  देकर"रजनी" उमंगों से  जीने  की
आख़िरी ख्वाहिश    में कज़ा दे   दिया   हो


शुक्रवार, फ़रवरी 17, 2012

गुजरे बरस ये तेरह , जैसे कटे बनवास

गुजरे बरस   ये   तेरह , जैसे कटे बनवास ,
फिर उठी मन में  कामना   मधुमास   की.

आज मेरे विवाह को तेरह वर्ष पूरे हो गए, अपने मन के विचारों को शब्दों में पिरो कर हर वर्ष की तरह आज भी एक रचना  अपने पति राजेश के लिए


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मैं शब्दों    में बंधकर   लड़ी  बनू,
तुम   मेरे  गीत के तान  बनो.

थक गए पग मेरे  चलकर  तन्हा ,
मेरे ज़र्जर  तन   के प्राण  बनो.

मै   बनूँ   दीपों  की    मालिका,
तुम अमर  लौ   की   बान बनो.

मै   बन   जाऊं  ग़ज़ल    तेरी,
तुम    महफ़िल  की  शान बनो.

मै पावस की सुरभित  रजनीगंधा,
तुम खुला निलाभ आसमान बनो.

मै बनू   सुहासिनी तेरी  "रजनी" ,
तुम जन्मों  तक मेरे सुजान बनो.

"रजनी"
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गुरुवार, फ़रवरी 16, 2012

टूटी कश्ती थी, मझधार में चल रही थी

टूटी हुई कश्ती थी मझधार में चल रही थी 
कभी   डूब रही  थी    कभी संभल रही  थी

वक़्त की  मुट्ठी में  थी   तकदीर   मेरी  
कभी बिखर रही थी कभी बदल रही थी

हिकायत -ये माज़ी में   डूबे   चश्म- तर
आंसुओं की बारिश में  भी जल रही  थी

अमा निशा की ख़ामोश फिज़ा थी, "रजनी"
ख़्वाब था हक़ीकत सा और मै बहल रही थी

मंगलवार, फ़रवरी 14, 2012

ये गुलाब




एक सुर्ख़ गुलाब देकर
कर देते हैं
अपनी  भावनाओं का
इजहार लोग़
यदि
यही है
अपने प्रीत को बयाँ करना
तो कई बार बांधे मैंने
तुम्हारे जुड़े में सुर्ख़ गुलाब |
और , तुम मुस्कुरा कर
अपने हाथों से
छू कर गुलाब को
कह देती हर बार
कितनी फबती है
मेरे  गौर वर्ण पर,
काले बालों में
यह लाल गुलाब !
मै हर बार ठगा सा रह गया
शायद
कभी तो समझ पाओगी
मेरे अनकहे अहसास को |
क्या ये गुलाब
जिसे ,
प्रेम का प्रतीक कहते  आये हैं लोग़
वो  रह गया
मात्र एक
श्रृंगार  बन कर |
कभी देवताओं के सर का,
कभी रमणी के ?

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"