मंगलवार, जनवरी 25, 2011

(फिर भी कहती हूँ जननी हूँ)

बालिका दिवस पर एक अजन्मी लड़की की व्यथा  (फिर भी कहती हूँ जननी हूँ)

जन्म लेकर क्या करूँ मै,
तुम्हारे इस संसार में.
क्या दे सकोगे ?
मुझे ख़ुद सा जीने का अधिकार,
अन्यथा करते रहोगे,
तमाम उम्र  ,
हर रिश्तों में मेरा व्यापार.
 हर साँस बस ,
घुट कर ही जीना ज़िन्दगी ,
तो,
अच्छा है मुझे ,
जन्म से पहले ही मार दो.
आ जाऊं इस संसार में तो ,
मांगूगी अपना अधिकार.
जब भी अधिकार के लिए ,
आवाज़ मैंने उठाई,
जन्मदाता ने ,
एक ही बात दुहराई.
क्यों पढ़ाया चार अक्षर इसे,
रहती ये भी अनपढ़,
ना दिखाती ये आँखें,
ना रहते ऐसे तेवर.
चुप्पी और सहनशीलता ही,
ऐ  लड़की तेरे ज़ेवर .
क्या तेरी माँ,दादी ने कभी ,
ऊँची आवाज़ लगायी,
किया किसी ने विरोध कभी ,
मर्दों के फैसले पर.
फिर क्यों तू ?
फैला रही अपने कटे हुए पर.
जब भी अधिकार के लिए ,
आवाज़ मैंने उठाई,
विरोध किया जब भी ,
किसी अनर्गल बातों का,
तो झट कह दिया जन्मदाता ने,
बेटी न  पैदा लेती,
या  पैदा लेते ही मर जाती.
इसके ऐसे  कर्म से तो ,
कुल की मर्यादा ना जाती |
फिर भी कहती हूँ जननी हूँ,
जन्म देने का ही नहीं,
इच्छित सांसो से ,
जीने का है अधिकार मुझे |
दे पाओ ये अधिकार,
 तो लाना इस संसार में,
आ जाऊं संसार में तो,
 मांगूंगी अपना अधिकार.

" रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

सोमवार, जनवरी 17, 2011

ख़ुशी हूँ मै.

चंचलता की मै मूरत हूँ,
लोग कहते हैं , मै खूबसूरत  हूँ.
बोलो कौन हूँ मै ?
ख़ुशी हूँ मै.

जिसके ज़िन्दगी में  ,
वो तो मालामाल है,
जिसके ज़िन्दगी से बाहर,
 वो तो कंगाल है.

हर कोई चाहता है,
मेरा  ज़िन्दगी में साथ.
तीखी जीवन में मैं मिठास हूँ,
सूखे अधरों की मै प्यास हूँ.
आसां नहीं,
हर ज़िन्दगी में मेरा आना,
क्योंकि,
ख़ुशी चीज़ ही है ,
मुश्किल से मिल पाना.

हर कोई जीवन में ,
मेरी तमन्ना रखता है,
भर जाये सागर  जीवन में,
ऐसी चाहत रखता है.
कोई तो मुझे पाकर,
सागर सा ज़िन्दगी जीता है,
जहाँ मै नही,
वो बूंद बूंद को रोता है,

मुझसे ही पूरी है ,
जीवन की कहानी,
बस जाऊं  मै जहाँ,
ना आये आँखों में ,
गम की पानी.

हर आँख की चाहत है ,
बस मेरे आंसू भरना.
चंचलता की मै मूरत हूँ,
लोग कहते हैं , मै खूबसूरत  हूँ.
बोलो कौन हूँ मै ?
ख़ुशी हूँ मै.

" रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

गुरुवार, जनवरी 06, 2011

कदम कदम पर बेबसी का शिकार ज़िन्दगी है

कुछ शाजिसों से होती शर्मशार ज़िन्दगी है,
कदम कदम पर बेबसी का शिकार ज़िन्दगी  है.

साथ मिला कदम से कदम ,जिनके हम चलते रहे,
वो ही छूपा कर खंजर, हमें बन रहनुमा छलते रहे.

एक  चेहरे पर कितने ही  चेहरे बदले आज इन्सान ने,
हैवान है या आदमी  शक्ल आये ना पहचान में.

बने फिरते हैं योद्धा तो आयें सामने  मैदान में,
छूप कर वार करना आदत  कायर इन्सान में.

आज हम पर दागी हैं अंगुलियाँ , तो शेर ना बन जायेंगे,
खुद की ही निगाहों में गिर, वो शर्म से मर जायेंगे.

किस हद तक आज गिर रहा इस दौड़ में जमाना  है ,
सच्चाई दम तोड़ने लगी हर कोई झूठ का दीवाना है.

"   रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

रविवार, दिसंबर 26, 2010

ख़्वाब सजते हैं पलकों पर , बिखर जाते हैं

ख़्वाब  सजते हैं   पलकों पर , बिखर जाते  हैं,
हम डूबकर पलभर ही ,  इनमे निखर जाते हैं.

कह नहीं पाते अधर किस बात से सकुचाते हैं,
बस देखकर उन्हें हम, मंद मंद मुस्काते    हैं.

क्यों रोकते हैं खुशियों को ,ये कैसे अहाते हैं,
न    हम   तोड़ पाते हैं , न वो  तोड़ पाते  हैं.

उन्मुक्त हो अरमान भी शिखर चढ़ जाते हैं,
 टूट न  जाएँ  हम   ये सोंच,  सिहर  जाते हैं.

ख़्वाब   सजते हैं पलकों पर  बिखर जाते  हैं,
हम डूबकर पलभर ही, इनमे निखर जाते हैं.

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

मंगलवार, दिसंबर 14, 2010

रहकर जिगर में कर देते हैं चाक चाक

रहकर जिगर में कर देते हैं चाक चाक,
जिनपर जिगर ये निसार होता है.

वो छोड़ जाता है हर हाल में साथ,
जो सीरत से ही फरेबी फनकार होता है. 

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

गुरुवार, नवंबर 18, 2010

क्योंकि जानती हूँ उसमे काफी गहराई है

छोड़ आई हूँ ,
सारा खारापन
आज सागर के पास |
किनारे पर,
मुझे विचलित सा देख
एक लहर मुझसे टकराई
और कहा ?
दे दो,  अपनी आँखों की नमी
इसके खारापन को
 इसे समेट लूँ  मै  ख़ुद में ।
क्योंकि,
मुझमे असीम धैर्य
और  गहराई है ।
मै भी
शांत चित से छोड़ आई
अपना सारा खारापन ,
सागर के पास ।
क्योंकि जानती हूँ
उसमें  काफी गहराई है।

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

शुक्रवार, अक्टूबर 29, 2010

ज़िन्दगी के सफ़र के सिलसिले तय कर लेते हैं

"एक जन्म भी नहीं निभा पाते लोग वफादारी के साथ,
यूँ ही सात जन्मों के बंधन का सौदा कर लेते हैं.

राहें जुदा सही ,मंजिल साथ मिले ना मिले ,
ज़िन्दगी के सफ़र के सिलसिले तय कर लेते हैं ."

"रजनी मल्होत्रा नैय्यर "

सोमवार, अक्टूबर 25, 2010

मेहंदी ने तय कर दी, तेरे प्रीत का रंग कितना गहरा है

करवा चौथ  पर ................

" मेहंदी ने तय कर दी, तेरे प्रीत का रंग कितना गहरा है,
आज मेरी निगाहें बार बार, हथेली पर टिक जाती है. "

हो जाता है इस बात का यकीं देखकर ,
हर सुहागन क्यों मेहंदी के रंग पर इतराती हैं ??

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अमर सुहाग का मिले आभा ,मेरे चेहरे के नूर को,
कभी भी ना चाँद मेरा ,मेरे फलक से दूर हो.

एक दिन इंतजार होता है, करवा चौथ के चाँद का ,
पर मेरे चाँद का मुझे , हर दिन इंतज़ार रहता है".

"रजनी मल्होत्रा नैय्यर "

गुरुवार, अक्टूबर 21, 2010

क्या फर्क मुझमे और जमाने में

क्या फर्क मुझमे और जमाने में ,
मैंने भी ना छोड़ा कसर कोई,
अपने बदले रंग दिखाने में,
जिसने मुझे पार लगाया,
डुबो दिया उसे ही,पा कर किनारा ,
ख़ुद को भंवर से बचाने में".

"रजनी मल्होत्रा नैय्यर "

बुधवार, अक्टूबर 13, 2010

नहीं सीख पाया मन मेरा छलावा

"नहीं सीख पाया मन मेरा  छलावा,
जो लगाती मै भी मुखौटा ,
मुझ पर भी चढ़ जाते रंग जमाने के.

"रजनी मल्होत्रा नैय्यर"