गुरुवार, मार्च 07, 2013
फिर पड़ेंगे ओले जरा सर तो मुड़ायिये
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 7.3.13 7 comments
बुधवार, फ़रवरी 27, 2013
बंजर आदमी
फिरता है लिए हाथों में खंजर आदमी |
वैर की अग्न से सूखा, प्रेम की नदी को,
बन बैठा विष भरा समंदर आदमी,
देख कर दूसरे की शांति अमन को ,
सुलग रहा अंदर ही अंदर आदमी
गैर भी थे अपने, ऐसा चलन था
रहता था मस्त कलंदर आदमी
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 27.2.13 5 comments
शुक्रवार, फ़रवरी 01, 2013
समय का यह ठिठुरा संवाद
वेदना के तारों का ,
छिड़ा मन से विवाद,
देख कर ,
समय का यह ठिठुरा संवाद !
रुग्न बसंती बयार,
कुपित श्रृष्टि का सार,
प्रकृति भी मौन ,
वो संचालक कौन ?
प्रत्यक्ष है प्रमाणित,
फिर भी है निर्विवाद !
सलज से अब मूक नैनों के शील,
पाप की सरिका कान्तिमान ,
अँधेरे का चारण बना विहान |
समीहा में जलते प्राण
कैसे हो युगनिर्माण ?
वेदना के तारों का ,
छिड़ा मन से विवाद,
देख कर ,
समय का यह ठिठुरा संवाद !
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 1.2.13 4 comments
शनिवार, दिसंबर 22, 2012
नारी सिर्फ एक मादा देह नहीं |
प्रकृति की सुन्दरतम रचना है |
जैसे तुम हो पुतले ,
हाड़ मास के बने हुए |
जीती , जागती , साँस लेती है ,
वो भी बिलकुल तुम्हारी तरह |
कैसे समझ लिया नारी को,
सिर्फ भोग की वस्तु ?
जब चाहा रौंद डाला |
इससे तुम्हारी पुरुषता
उसी दिन नामर्दी में तब्दील हो गयी ,
जिस दिन किया ,
किसी अबला के हया को तार -तार |
भूल गए शायद ?
तुम्हारे अस्तित्व का कारण भी ,
वो ही है एक मादा देह |
फिर कैसे मिलाते हो ,
नज़रें , किसी से ?
जो अपने कमजोरी को ,
पुरुषत्व समझ कर समझता है,
एक निरीह को रौंद कर ,
अपनी मर्दानगी साबित कर दी है ,
धिक्कार है ऐसे कापुरुषों पर,
अपनी ही रचना पर आज प्रकृति क्यों है मौन ?
अबला के जख्म पर दे ऐसी मरहम ,
ऐसे कापुरुषों का पुरूषत्व
कई सदियों तक न जागे |
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 22.12.12 13 comments
गुरुवार, दिसंबर 20, 2012
सरस्वती वंदना
सरस्वती वंदना
मां शारदे, वीणाधारी हे श्वेत कमल आसिनी ,
हे ज्ञान की देवी, श्वेत पुष्प अभिलाषिनी
संसार के मानस हो गए धूसरित ,खोकर व्यभिचार में
कर दो अपने ज्ञान की बारिश, अज्ञानी संसार में
कर जोड़ है विनय निवेदन , चरण कमल में आपकी
लाज रखो ज्ञान की देवी संसार से नाश करो पाप की
हो गए हैं सभी नेत्रविहीन, भोग के प्रकाश से
करते जा रहे कर्म अनैतिक , रोको ऐसे राह से
छा गया है दुराचार क्यों ? अज्ञानियों के आचार में
न चित सयंम , न वाक् संयम, न संयम व्यवहार में
हे बुधिज्ञान प्रदायिनी , हे मधुर कंठ दायिनी
भावयुक्त साधना की , अमोघ फल प्रदायिनी
सुर - मुनि मानस पाने को कला ज्ञान - विज्ञान
कर वंदन , नित करें तेरे चरणों का ध्यान
हत्यारे वाल्मीकि को दिया तूने , उत्तम ज्ञान
रामचरित की रचना कर पाई जग में सम्मान
माँ शारदे "रजनी" को भी दो नैतिकता का ज्ञान
आई मां शरण आपकी ,रहे मेरा सत्कर्मों में ध्यान
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
बोकारो थर्मल (झारखण्ड)
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 20.12.12 0 comments
सोमवार, दिसंबर 17, 2012
चांदनी रात मिलती रहे |
जीवन की आपाधापी के ,
उठते हुए बादल से,
अहसास की धरा पर,
उम्मीद की फ़सल खिलती रहे |
घुमड़ते हुए ख्याल ,
कुछ उलझे से सवाल,
कभी बूंद बनकर बरसे ,
कभी ज्योति सी जलती रहे |
जुगनुओं सी भटकाव में,
कुछ धूप में कुछ छाँव में ,
असंख्य अनुभूतियाँ
जीवन में मिलती रहे |
अश्रुपूरित नयन लिए ,
कभी उल्लसित तरंग लिए
एक सम्पूर्ण गगन लिए,
विह्वल ,आकुल चातक से
चांदनी रात मिलती रहे |
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 17.12.12 6 comments
सोमवार, अक्टूबर 15, 2012
मुरझा गयी हैं कलियाँ बिन बागवान के
हो जाती ग़ज़ल खिलकर गुलाब सी,
एक बार वो फिर से दीदार दे जाते |
हो जाती मदहोश लिपट कर "चांदनी रात"
संग जागकर फिर वही ख़ुमार दे जाते |
ले जाते मेरी भीनी सी खुशबू की सौगात
एक बार पहलू में आकर वो प्यार दे जाते |
मुरझा गयी हैं कलियाँ बिन बागवान के,
उन कलियों को फिर वही बहार दे जाते |
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 15.10.12 8 comments
बुधवार, अक्टूबर 10, 2012
जल रहा दिया अब तक अपनी तकदीर से
मगर डर है ज़ुबां पर लाएँ तो कैसे ?
जल रहा दिया अब तक अपनी तकदीर से,
मगर डर है छोड़ तूफान में जाएँ तो कैसे ?
करने लगे हैं हर तरफ अब ग़म पहरेदारी ,
खुशियाँ घर में आएँ तो कैसे ?
मुफ़लिसी बन गयी जिनका उमरभर का साथ ,
वो ईद और दिवाली मनाएँ तो कैसे ?
बहुत कुछ बदल दिया मगरीब की हवा ने,
पर अपनी तहज़ीब :रजनी" भुलाएँ तो कैसे ?
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 10.10.12 12 comments
शुक्रवार, सितंबर 28, 2012
एक दरिया ख्वाब में आकर यूँ कहने लगा
हमने दास्तान सुना दी गम -ए- ज़िन्दगी की |
कभी हवा के झोंके संग "रजनी" उड़ा दिए ,
जितने भी मिले दस्तूर दुनिया के चलन से |
कबतक मेरे दर से वो खाली हाथ जाये ?
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औरों की तरह तू मुझमें हाथ धोता क्यों नहीं "
जैसे ग़रीब झोपड़े को महल कहते हैं |
जमाने में किसी काम की आगाज़ को ,
कुछ लोग , आरम्भ, कुछ पहल कहते हैं |
फूलों से राह सजाईये , काँटों को छांटिए |
हमदर्दी से दिल मिलाईये, दुश्मनी को पाटिये ,
अमन का पैगाम "रजनी" सरहदों में बाँटिये |
सहरा के अनल सा न हो , बस समां सा जलता चल |
एक मिटे तो दूसरी उभर आती है "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 28.9.12 7 comments
सोमवार, सितंबर 17, 2012
दुपट्टे कांधे का बोझ बन गए
आ जाती थी हया की रेखाएं,
आँखों में
जब भी ढल जाता था ,
कांधे से दुपट्टा |
शर्माए नैन तकते थे
राहों में
जाने -अनजाने निगाहों को,
जब भी हट जाता वक्ष से
आंचल |
ख़ुद को
लाज के चादर में
सिमट कर
एकहरी
कर लेती थी ,
जब भी होती थी हवाओं संग
दुपट्टे की आँख मिचौली ,
हवाओं के रफ़्तार से ही
हाथ थामते थे आँचल को ...
पर ये क्या हो गया ?
अचानक कैसी आंधी आई
उड़ा ले गयी
निगाहों का पानी !
अब दुपट्टे
कांधे का बोझ बन गए
आंचल वक्ष पर थमते नहीं
ढलक जाते हैं !
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 17.9.12 7 comments
