रविवार, जून 21, 2015
पिता के लिए एक दिन ....(father's Day par ) दुनिया के हर पिता को समर्पित
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 21.6.15 2 comments
गुरुवार, मई 21, 2015
बुजुर्गों का भविष्य
झूलते हाथ-पांव ,
ढूंढ रहे
मुक्ति का रास्ता |
भटक रहा सड़कों पर
बिता हुआ कल
सरहद बन गयी जबसे
घर की दीवारें ...
यादें नापती हैं, ज़मीं
कभी आकाश |
हथियार डाले उनका आज
बैठ गया है
वील चेयर पर ...
पुकार रहा
धराशायी सिपाही सा ,
बुजुर्गों का भविष्य !
जी रहा है कछुआ
छिपा कर ,
खोल के भीतर का रहस्य ...
जो बिलकुल सपाट है |
" रजनी मल्होत्रा नैय्यर "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 21.5.15 4 comments
सोमवार, मई 11, 2015
साज़ -ए दिल पर गीत मोहब्बत के गाते रहो
बाद-ए-मुख़ालिफ़ में चिराग़ जलाते रहो
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहो
तिश्नगी बुझ जाएगी समंदर की' अगर
बादलो मुसलसल बूंद -बूंद बरसाते रहो
माना की एक फ़ासला है हमारे दरमियाँ
इतना करम करो की तुम याद आते रहो
ग़फलत में डूबी हुई है दुनिया सारी
तन्हा अपने हौसलों से तुम जगाते रहो
नफ़रतों से भरी इस जहाँ में रजनी
साज़ -ए दिल पर गीत मोहब्बत के गाते रहो
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 11.5.15 2 comments
हर ख़याल , हर सवाल,
हर सपनों को पूरी करती हैं आँखें |
जुबां जब साथ न दे
सैकड़ों सवाल करती हैं आँखें ...
दिल में हो खुशियाँ भर जाती है
ग़म में भी छलक जाती हैं आँखें.
जज़्बाती , कभी मासूम,
कभी अंगार भरी
कुछ बोलती सी
कभी गुमसुम,
कभी शरारत है आँखें.
सागर कभी नदिया
कभी बारिश बन बरसती है.
सपनों में खोयी,
नींद से बोझिल,
कभी जगती हैं आँखें.
ज़िन्दगी सी हंसी,
कभी मौत सी गुमसुम
वक़्त सी चंचल होती हैं आँखें.
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 11.5.15 0 comments
रविवार, मई 10, 2015
संस्कार
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 10.5.15 0 comments
बुधवार, अप्रैल 29, 2015
कौन श्रेष्ठ प्रकृति या पुरुष ?
उत्तर आधुनिकता
की ओर आ गए,
कर ली होड़
जीत ली बाज़ी
दे सकते हो मात नियति को,
फिर क्यों
कराह है, क्यों अश्रु जल से
पूरित हो ?
कर लिया है निर्माण
हर तरह का साँचा
टेस्ट ट्यूब बेबी हो या
मानव क्लोन !
कृतिम सांसें,
कृतिम अंग .
भौतिकता से
अटे पड़े हैं
तुम्हारे दिग
और जारी है विस्तार
ऐ मनुज !
कर लो निर्माण
एक और धरा की ,
ले आओ
एक सूर्य और,
चन्द्र भी कहीं से,
जब सब कुछ है
तुम्हारे हाथों में |
फिर तबाही से
क्यों विस्मित हो ?
असमय ही गर्त में
ले जायेगा
अंध दौड़ |
धरा ,
खाद की जगह लहू लेगी,
मौत की फसल खिलायेगी
अपने अंक में |
कौन श्रेष्ठ प्रकृति या पुरुष ?
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 29.4.15 1 comments
शनिवार, अप्रैल 18, 2015
आचरण का पौधा
कुछ सिक्के ,
तुम्हारी हथेली पर
जिनसे तुम खरीद सको
कुछ मूलयवान वस्तुएं,
जो धरोहर के रूप में संजो दें |
वक़्त के साथ - साथ ,
ये अपनी
मांग और कीमत को
निखारती चलें ,
जिसे कह सकें अनमोल
आनेवाले वंशज ,
दिखा सकें
और महसूस करें खुद को गौरवान्वित ,
तुम ही बोलो क्या खरीदना चाहोगे
इस सांसारिक बाजार से ?
भौतिकता की चमक
में खोना चाहते हो ?
अंधी दौड़ में शामिल
होना चाहते हो ?
या ,
बाजार में अपना
अस्तित्व ढूंढते ढूंढते
उनमे ही विलुप्त हो जाना ?
केशर हो या कस्तूरी ,
विष हो या अमृत,
ये किसी भी आकार में
किसी भी युग में
किसी भी पात्र में आकर
अपना
अस्तित्व नही खोते.
मैंने भी संजोया था एक सिक्का,
और
जीवन पर्यन्त न खोने वाली
वस्तु जिसे आचरण के नाम
से जानती हूँ ,
इसे हस्तगत स्थानांतरण
करना चाहती हूँ,
जो चलती रहे
पीढ़ी दर पीढ़ी |
समय के साथ
इसकी मांग और
कीमत में उत्तरोत्तर
बढ़ोतरी आती जाये ,
ये आचरण का पौधा
नही मिलता है
किसी भी बाजार में,
न इसे खरीदे जा सकते ,
हाँ आजकल
आचरण बिकते जरूर हैं !
चंद जरुरत ,
चंद सिक्के !
और आचरण ,
घर की दहलीज को फाँदती
पहुंच जाती है बहुत दूर ,
हो जाती है तेरे और मेरे
पहुंच से ओझल या लापता |
.
"रजनी मल्होत्रा ( नैय्यर )
बोकारो थर्मल
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 18.4.15 0 comments
एक रेखा
एक रेखा |
जिसे,
नाम नही दिया था
बस इतना पता था,
इसके घेरे से बाहर जाना है,
तभी टूटेगी भ्रामक सोच |
हर दिन के साथ
बढ़ती गयी ,
परिधि रेखा की...
छोटे होते गए
विकृत विचार,
अवमाननायें ,
जिसने उद्गार का सोता
बंद कर दिया था |
पनप चुके
धधकते ज्वालामुखी ने ,
ले लिया था आकार,
बस तलाश थी
कमजोर ज़मीं की,
एक दिन फूटा ,
सोता उद्गार का
फिर ,
हट गए सारे प्रश्नचिन्ह,
जिसने
मानदंड तय कर रखे थे ,
हर रेखा लक्ष्मण रेखा सी प्रतिबंधित होती है |
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 18.4.15 0 comments
दायरों का टूटना
" तंग "
हों या " विस्तृत "
कोई फर्क नहीं पड़ता |
यदि
मायने रखता है तो वो ,
दायरों का टूटना
या उनसे निकलना |
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मान्यताओं की
एक परिधि लाँघ कर,
हम
नवीन तथ्यों के लिए
कई रास्ते खोल देते हैं ..
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 18.4.15 0 comments
गुरुवार, अप्रैल 02, 2015
नहीं कहला रहे नीलकंठ
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 2.4.15 3 comments
