मंगलवार, मार्च 19, 2013

हम दास्ताँ अपनी , दीवारों को सुनाने लगे .


जब   गीत    तिरंगे   की  शान   में    गाने   लगे,
कुछ  लोग सियासत   की   आग   भड़काने   लगे.

जब  पूछा    गया  शहीदों  का  नाम    और   पता,
चोर - उचक्के    नाम    अपना    लिखाने      लगे.

जूठे  बर्तनों   को    माँजकर   जिन्हें    थी    पाली ,
कह   मुस्काने  लगी,   मेरे   बच्चे     कमाने   लगे .

वक़्त   ने     चाल      ही      कुछ     ऐसी    बदली   ,
संभल  कर चलनेवाले  भी,  मुंह   की    खाने   लगे,

सुना   जबसे  होते    हैं    दीवारों    के    भी   कान,
हम  दास्ताँ   अपनी , दीवारों    को    सुनाने   लगे .

छोड़ दिया साथ , तक़दीर ने ज़माने   से  मिलकर ,
मन   में   हौसलों  के     दिये    जगमगाने    लगे .

कोयले   की खान  से  घुम    कर   जो    आ   गए,
काजल   की   कोठरी   से   दामन    बचाने     लगे,

जब   भी  कहा    ख्वाहिशों  से  बातें  तहज़ीब   की,
मुझसे  रूठ   कर    वो, मुंह   मोड़     जाने     लगे .

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

रविवार, मार्च 10, 2013

उनका क्या होगा , जो मोम से ढले हैं

पत्थर  पिघल गए  इन  सांसों  की  गर्मी  से,
उनका   क्या  होगा , जो  मोम   से    ढले  हैं ?

चलता    जा   रहा  मेरे  दिल  का    काफिला,
जाने  क्या है मंजिल जिस  ओर पग  चले   हैं .


मेरी   ही   अदालत   में   मेरा   ही   मुजरिम,
देकर  अगली   तारीख़  मुझको   ही छले   हैं ?

फूल     पर   पड़े   कि   शोलों   पर    पड़े    हैं , 
एक बिजली   कौंधती   है    जब पाँव  जलें  हैं


जैसे    देखता   हो   कोई    दिन   में    सितारे,
वैसे  गरीब   के   मन   कोई    ख़्वाब   पले   हैं.

जाते  हैं  कई   उड़  कर  बुलंदी   की   मकाँ   पर,
 वो  गिर कर  उंचाईयों     से     हाथ     मले   हैं |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

गुरुवार, मार्च 07, 2013

फिर पड़ेंगे ओले जरा सर तो मुड़ायिये



शर्त है  ये चट्टान    भी    गिर   जाएगी  ,मगर,
एक   बार    हौसलों की तूफान  को  तो  लाईये,

ढूंढने   पर गीदड़ों   का  काफ़िला  मिल  जायेगा,
एक      बार    ढूंढने  को   शहर      तो    जाईये.

हर    बार    की  तरह  ही दम  तोड़ती    हुई   है,
इस   बार   इस  विधि पर  रौशनी   तो  लाईये

ओहदे   के   दंभ   में  जो  आसमां   में   उड़  रहे,
हकीकत की ज़मीं पर  उन्हें खींच कर तो लाईये .

बदले मिजाज़  मौसम  के,  बदले  हालात   से
फिर   पड़ेंगे    ओले   जरा   सर  तो  मुड़ायिये  .

सोचते हो   थम   जायेगा गरजने से  ये बवंडर ,
"रजनी"  बरसने   को घटा  बनकर  तो  छाईए,

बुधवार, फ़रवरी 27, 2013

बंजर आदमी

 भावना   से     हो  गया     बंजर    आदमी,
  फिरता  है  लिए  हाथों   में  खंजर  आदमी |

 वैर   की अग्न   से  सूखा,  प्रेम  की नदी को,
 बन    बैठा     विष    भरा   समंदर   आदमी,

देख    कर   दूसरे     की   शांति   अमन  को ,
सुलग    रहा     अंदर   ही     अंदर    आदमी 

 गैर     भी     थे   अपने,    ऐसा    चलन   था
रहता       था     मस्त       कलंदर     आदमी

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

शुक्रवार, फ़रवरी 01, 2013

समय का यह ठिठुरा संवाद

वेदना के तारों का ,
छिड़ा मन से विवाद,
देख कर ,
समय का यह ठिठुरा संवाद !
रुग्न बसंती बयार,
कुपित श्रृष्टि का सार,
प्रकृति भी मौन ,
वो संचालक कौन ?
प्रत्यक्ष है प्रमाणित,
फिर भी है निर्विवाद !
सलज से अब मूक नैनों के शील,
पाप की सरिका कान्तिमान ,
अँधेरे का चारण बना विहान |
समीहा में जलते प्राण
कैसे हो युगनिर्माण ?
वेदना के तारों का ,
छिड़ा मन से विवाद,
देख कर ,
समय का यह ठिठुरा संवाद !

शनिवार, दिसंबर 22, 2012

नारी सिर्फ एक मादा देह नहीं |

नारी   सिर्फ एक मादा  देह नहीं ,
 प्रकृति की सुन्दरतम रचना है |
जैसे  तुम हो पुतले  ,
हाड़ मास  के बने हुए |
जीती , जागती , साँस लेती है ,
वो भी बिलकुल  तुम्हारी  तरह |
कैसे समझ लिया नारी  को,
 सिर्फ भोग की वस्तु ?
जब चाहा रौंद डाला |
इससे तुम्हारी पुरुषता
उसी दिन नामर्दी में तब्दील हो गयी ,
जिस दिन किया ,
 किसी अबला के हया को तार -तार |
भूल गए शायद ?
तुम्हारे अस्तित्व का कारण भी ,
वो ही है एक मादा देह |
फिर कैसे मिलाते हो ,
नज़रें , किसी से ?
जो अपने कमजोरी को ,
पुरुषत्व समझ कर समझता है,
 एक निरीह  को रौंद कर ,
अपनी मर्दानगी साबित  कर दी  है ,
धिक्कार है ऐसे कापुरुषों पर,
अपनी ही रचना पर आज प्रकृति  क्यों है मौन ?
अबला के जख्म पर दे ऐसी मरहम ,
ऐसे कापुरुषों का  पुरूषत्व
कई सदियों तक न जागे  |

गुरुवार, दिसंबर 20, 2012

सरस्वती वंदना

सरस्वती वंदना

मां    शारदे,     वीणाधारी     हे  श्वेत   कमल आसिनी ,
हे     ज्ञान   की     देवी,    श्वेत   पुष्प    अभिलाषिनी

संसार के मानस हो गए धूसरित ,खोकर व्यभिचार में
कर   दो    अपने  ज्ञान की     बारिश, अज्ञानी संसार में
 
कर जोड़    है विनय निवेदन , चरण   कमल में  आपकी
लाज    रखो ज्ञान की    देवी  संसार से 
नाश करो पाप की 

हो    गए     हैं सभी    नेत्रविहीन,   भोग    के   प्रकाश से
करते   जा   रहे कर्म     अनैतिक , रोको      ऐसे   राह से

छा    गया है   दुराचार क्यों ? अज्ञानियों   के  आचार में
न   चित सयंम , न   वाक् संयम, न  संयम व्यवहार में

हे    बुधिज्ञान       प्रदायिनी , हे     मधुर    कंठ   दायिनी
भावयुक्त     साधना    की   , अमोघ    फल     प्रदायिनी

सुर -    मुनि    मानस पाने   को    कला  ज्ञान - विज्ञान
कर    वंदन  ,   नित    करें    तेरे    चरणों    का    ध्यान

हत्यारे     वाल्मीकि    को      दिया   तूने , उत्तम  ज्ञान
रामचरित    की    रचना    कर   पाई   जग  में सम्मान

माँ   शारदे   "रजनी"    को  भी  दो नैतिकता का ज्ञान
आई    मां शरण आपकी ,रहे   मेरा   सत्कर्मों में ध्यान

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
बोकारो थर्मल (झारखण्ड)

सोमवार, दिसंबर 17, 2012

चांदनी रात मिलती रहे |


जीवन की आपाधापी  के ,
उठते  हुए    बादल     से,  
अहसास  की   धरा    पर,
उम्मीद की फ़सल खिलती रहे |

घुमड़ते   हुए  ख्याल  ,
कुछ उलझे से  सवाल,
कभी बूंद बनकर बरसे ,
कभी ज्योति सी  जलती  रहे  |

जुगनुओं सी भटकाव में,
कुछ धूप  में कुछ छाँव में ,
असंख्य   अनुभूतियाँ
जीवन  में मिलती रहे |


अश्रुपूरित नयन  लिए ,
कभी उल्लसित तरंग लिए
एक सम्पूर्ण गगन लिए,
विह्वल ,आकुल चातक से
चांदनी रात  मिलती रहे |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

सोमवार, अक्टूबर 15, 2012

मुरझा गयी हैं कलियाँ बिन बागवान के

एक ग़ज़ल महबूब के नाम ..........

हो जाती ग़ज़ल खिलकर गुलाब सी,
एक बार वो फिर से दीदार दे जाते |

हो जाती मदहोश लिपट कर "चांदनी रात"
संग जागकर फिर वही ख़ुमार दे जाते |

ले जाते मेरी भीनी सी खुशबू की सौगात
एक बार पहलू में आकर वो प्यार दे जाते |


मुरझा गयी हैं कलियाँ बिन बागवान के,
उन कलियों को फिर वही बहार दे जाते |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
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बुधवार, अक्टूबर 10, 2012

जल रहा दिया अब तक अपनी तकदीर से

तेरे  ख्याल   से    कर    लिए   दिल  को    रौशन,
मगर  डर     है   ज़ुबां    पर   लाएँ     तो     कैसे ?

जल रहा  दिया  अब   तक    अपनी   तकदीर  से,
 मगर डर   है  छोड़  तूफान    में जाएँ    तो   कैसे ?

करने लगे    हैं  हर     तरफ  अब    ग़म  पहरेदारी ,
खुशियाँ     घर        में          आएँ       तो       कैसे ?

मुफ़लिसी बन   गयी    जिनका उमरभर  का साथ ,
वो   ईद     और      दिवाली    मनाएँ     तो     कैसे ?

बहुत  कुछ   बदल     दिया    मगरीब    की  हवा ने,
पर   अपनी    तहज़ीब   :रजनी" भुलाएँ    तो    कैसे ?