जिन्हें कहा गया गुदडी का लाल आज उनका भी पावन जन्मदिन है (लाल बहादुर शास्त्री)आज गाँधी जयंती है
मोहनदास करमचंद गाँधी, महात्मा गाँधी, बापू, शान्ति और अहिंसा के प्रतीक, हमारे राष्ट्रपिता का जन्म आज के ही दिन 1869 में गुजरात के पोरबंदर में हुआ|
हमने जो आज़ादी की हवा को महसूस किया है अपने सांसो में, तो वो देन उन्ही महापुरुषों की है जिन्होंने हमें ये आज़ादी दिलाने में कितने इम्तिहान दिए ज़िन्दगी के हर सुख चैन को लूटा कर . उनसे मिली इस आज़ादी की सौगात को हमें प्रेम भाईचारे ,और एकता से निभाना चाइए ,पर आज तो देश की जो हालत होती जा रही ऐसा लगता है जल्द ही फिर कोई गुलामी की ज़ंजीर न जकड ले हमें.........क्योंकि जिस सूत्र में हमें बंधे रहने का मूल मंत्र दिया गया था उसे तो कबका भूल चुके हैं और आज अपनी ही हित में सब लग गए हैं पहले अपनी रोटी सीके बाद में कुछ हो .....देश का, समाज का क्या होगा इससे .........जब बांधनेवाली डोरी ही टुकड़े में बाँटने का प्रेरणा दे ,तो कैसे उस डोरी से बंधे रहने का उम्मीद की जाये .............हमें आपसी मतभेद, जाति ,पाती ,धर्म, मजहब सब भूलकर एकता और सही मार्ग को अपनाना होगा ...........तभी पाए गए आज़ादी के मूल्य को चूका पाएंगे उन महापुरुषों को .जिन्होंने आत्म बलिदान देकर हमें ये सुनहरा भविष्य दिया ..........गाँधी जी ने सारी जीवन बस २ धोती में गुजार दिया ,क्या आज वो संयम नज़र आता है किसी भी राष्ट्र के कर्णधार में ,जो बापू में थी. आज समाज को नए दिशा देने की जरूरत है...........तभी हमारा आनेवाला कल फिर किसी बेड़ियों के बंधन से मुक्त रहेगा.........बापू अपने कर्मो से ही आज विश्व में जाने और माने जाते हैं आइये हम भी कुछ ऐसा करें जिससे युगों युगों तक सत्कर्म के रूप में याद रखे जाएँ लोगो के दिल में ...........जय हिंद , जय बापू की ........
"रघुपति राघव राजा राम, पतित पवन सीता राम ,
भज प्यारे तु सीताराम इश्वर अल्लाह तेरो नाम,
सब को सन्मति दे भगवान".
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जिन्हें कहा गया गुदडी का लाल आज उनका भी पावन जन्मदिन है (लाल बहादुर शास्त्री)लालबहादुर शास्त्री , जिनका जन्म २ अक्टूबर १९०४ में एक गरीब परिवार में ,मुग़ल सराई में हुआ .कर दिया अपने राष्ट्र को समर्पित अपना सारा जीवन , और हमें आज की ये आज़ादी भरी ज़िन्दगी देने को ख़ुद न्योछावर कर दिया देशप्रेम और सच्चाई के लिए ये महापुरुष लोग हँसते हँसते बलिदान हो गए .और दे दी हमें अपने लगाये हुए गुलशन का सारा बहार ये कह कर की अबसे इस चमन के तुम सब ही रखवाले हो..हमने उनके द्वारा लगाये चमन को अपने ही हाथों उजाड़ने में लगे हैं.....
इन दोनों महापुरुषों को हमारा श्रधा भरा नमन जिनकी आज पावन जन्मदिवस है ...
"रजनी मल्होत्रा नैय्यर"
शुक्रवार, अक्टूबर 01, 2010
नमन आपको
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गुरुवार, सितंबर 30, 2010
आह अभी तू यूँ दस्तक ना दे
"आह अभी तू यूँ दस्तक ना दे,
दर्द अभी भरा नहीं,
छलका नहीं गम के प्यालों से,
जब वो बिखर जाये पलकों से,
आ जाना तब मेरे रुखसारों पे."
"रजनी मल्होत्रा नैय्यर."
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 30.9.10 4 comments
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आज का कोर्ट का फैसला जो भी हो हम एक हैं हिन्दुस्तानी .
"घर फूटेगा तो गंवार लूटेगा,देश टूटेगा तो गद्दार लूटेगा."
आज का कोर्ट का फैसला जो भी हो हम एक हैं हिन्दुस्तानी .जाति पाति में ना बाँट कर धर्म मजहब में ना बाँट कर ,एकता के सूत्र में बंध कर देखें .हम कमजोर हैं जब लड़ते हैं ,ताकतवर हैं जब एक हैं आज फिर इम्तिहान की बारी है अपने बंधुत्व को बनाकर रखना है हमें, ऐसा ना हो की फिर हमारी एक भूल किसी फिरंगी को फायदा उठाने का मौका दे दे. ऐसे भी भारतीय एकता को तोड़ने में दुश्मन सदा लगे रहे . पर कामयाब ना हो सके,हम हिन्दू मुस्लिम सिक्ख इसाई ना होकर माँ भारती के संतान हैं ,और किसी भी बात को शांति से हल करना ही बुद्धिमानी है .और वो वक़्त आ गया है जब हमें अपनी एकता को बना कर रखना है शांति बना कर रखना है..........
बस इस बात को हर भारतीय याद रख ले.............
" घर फूटेगा तो गंवार लूटेगा,
देश टूटेगा तो गद्दार लूटेगा."
"रजनी मल्होत्रा नैय्यर "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 30.9.10 1 comments
रविवार, सितंबर 19, 2010
जरा अँधेरा होने से रात नहीं होती
जरा अँधेरा होने से रात नहीं होती,
अश्कों के बहने से बरसात नहीं होती.
दीपक के बुझ जाने से,
ज्योति गरिमा नहीं खोती.
दीया खुद जलकर,
औरों को रौशनी देता है.
खुद तो जलता रहकर ,
अन्धकार हमारा लेता है.
ये देता सीख हमें,
अच्छाई की राह पर चलना.
दीया की तरह ही जलकर हम भी ,
औरों को रौशनी दे पाए.
कुछ करें ऐसा जिससे ,
जीवन सफल ये कहलाये.
छोटी सी ये दीया की बाती,
पाती हमें ये देती है.
बदल जाता जहाँ ये सारा,
हम भी हर लेते किसी के गम.
पर ये बात अब कहाँ रह गयी,
मतलबी दुनियाँ में कहाँ ये दम.
हम अपने अंदर ही इतने हो गए हैं गुम ,
कौन है अपना कौन पराया मालूम नहीं .
खुद को लगी बनाने में ये दुनिया,
किसी की किसी को खबर नहीं,
दो वक़्त की रोटी कपड़ा में,
अब तो किसी को सबर नहीं.
जल जायेगा जहाँ ये सारा,
सारी दुनिया डूबेगी.
सदी का अंत लगता है आ गया,
गहराई में डूबोगे तो ,
पता चले हर बात की,
रंग बदलते फितरत सारे,
पता चले ना दिन रात की.
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 19.9.10 5 comments
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गुरुवार, सितंबर 16, 2010
पाना आसान नहीं , मंजिल की राह,
"ख़्वाब सजते हैं,
पलकों पर,
आसानी के साथ,
साकार करने में ,
मुद्दत भी लग जाते हैं,
पाना आसान नहीं ,
मंजिल की राह,
पाने में मंजिल,
पैर को ,
छाले भी पड़ जाते हैं."
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 16.9.10 9 comments
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मंगलवार, सितंबर 14, 2010
जो एक हैं , उनमे कैसी दूरी
क्यों कहते हो ?
उन ख़्वाबों को,
कल तक जो
तुम्हारे थे
आज वो मेरे हैं |
ऐसा नहीं,
कि जो ख़्वाब
कल तक
तुम्हारे पलकों पर सजते थे
रूठ गए तुमसे |
सच तो ये है
अब वो
हमदोनों के हो गए हैं |
और जो एक हैं
उनमें कैसी दूरी
कैसा बंटवारा ?
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 14.9.10 11 comments
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सोमवार, सितंबर 13, 2010
वो भी तड़पा होगा उसी तरह खुद को बदलने में
"कहते हैं लोग महबूब सनम को,
बदल गयी तुम्हारी नज़रे,
पर ये समझ नहीं पाते,
वो भी तड़पा होगा उसी तरह ,
खुद को बदलने में,
जैसे आत्मा तड़पती है,
तन से निकलने में."
-"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 13.9.10 5 comments
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बुधवार, सितंबर 08, 2010
आज डूबने को छोड़ गए , भर कर सैलाब.
"समझ ना पाए वो ,
चाहत हमारी बताने के भी बाद ,
कभी आंसू हटाया था रुखसार से मेरे,
आज डूबने को छोड़ गए ,
भर कर सैलाब."
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 8.9.10 5 comments
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मंगलवार, सितंबर 07, 2010
आज तब्बसुम लबों पे खिला ना सके
"सजदा किया है मन से , ख़ुदा की तरह ,
तुझे मंदिर - मस्जिद में बिठा न सके.
मन में तू बसा है ख़ुदा की तरह ,
चाह कर भी तुझे, बाहर ला न सके.
फूलों सा सहेजा है ज़ख्मों को,
उनके रिसते लहू दिखा न सके.
बहलते रहे हम भूलावे में मन के,
हक़ीक़त से खुद को बहला न सके.
दूर होकर भी हम कहाँ दूर हैं,
पास आकर भी पास आ न सके.
निगाह भर के देखा उसने हमें,
पर ज़रा सा भी हम मुस्कुरा न सके.
हमें शगुफ़्ता कहा था कभी ,
आज तब्बसुम लबों पे खिला न सके.
आरज़ू थी खियाबां-य- दिल सजाने की ,
ज़दा से उजड़ा सज़र फिर लगा न सके.
पूछते हैं कहनेवाले ज़र्द रंग क्यों ?
मुन्तसिर से हैं हम, बता न सके.
ला-उबाली सा रहना देखा सभी ने,
जिगर में रतूबत है बता न सके.
दौर-ए - अय्याम बदलती रही करवटें ,
शब् -ए- फ़ुरक़त में लिखी ग़ज़ल सुना न सके.
सोज़ -ए- दरूँ कर देती है नीमजां लोगों को,
हम मह्जूरियां में भी तुम्हें भूला न सके.
सजदा किया है मन से ख़ुदा की तरह ,
तुझे मंदिर - मस्जिद में बिठा न सके.
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 7.9.10 4 comments
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गुरुवार, अगस्त 26, 2010
हर जर्रे में तू है ये अहसास तो है
गुलजार है गुलशन मेरा आज भी तसव्वुर में ,
हर जर्रे में तू है ये अहसास तो है ,
उन कहकहों का क्या करूँ ?
जो याद आ कर आज दिल को जलाती हैं ".
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 26.8.10 9 comments
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