"ख़्वाब सजते हैं,
पलकों पर,
आसानी के साथ,
साकार करने में ,
मुद्दत भी लग जाते हैं,
पाना आसान नहीं ,
मंजिल की राह,
पाने में मंजिल,
पैर को ,
छाले भी पड़ जाते हैं."
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
गुरुवार, सितंबर 16, 2010
पाना आसान नहीं , मंजिल की राह,
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 16.9.10 9 comments
Labels: Poems
मंगलवार, सितंबर 14, 2010
जो एक हैं , उनमे कैसी दूरी
क्यों कहते हो ?
उन ख़्वाबों को,
कल तक जो
तुम्हारे थे
आज वो मेरे हैं |
ऐसा नहीं,
कि जो ख़्वाब
कल तक
तुम्हारे पलकों पर सजते थे
रूठ गए तुमसे |
सच तो ये है
अब वो
हमदोनों के हो गए हैं |
और जो एक हैं
उनमें कैसी दूरी
कैसा बंटवारा ?
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 14.9.10 11 comments
Labels: Poems
सोमवार, सितंबर 13, 2010
वो भी तड़पा होगा उसी तरह खुद को बदलने में
"कहते हैं लोग महबूब सनम को,
बदल गयी तुम्हारी नज़रे,
पर ये समझ नहीं पाते,
वो भी तड़पा होगा उसी तरह ,
खुद को बदलने में,
जैसे आत्मा तड़पती है,
तन से निकलने में."
-"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 13.9.10 5 comments
Labels: Poems
बुधवार, सितंबर 08, 2010
आज डूबने को छोड़ गए , भर कर सैलाब.
"समझ ना पाए वो ,
चाहत हमारी बताने के भी बाद ,
कभी आंसू हटाया था रुखसार से मेरे,
आज डूबने को छोड़ गए ,
भर कर सैलाब."
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 8.9.10 5 comments
Labels: Poems
मंगलवार, सितंबर 07, 2010
आज तब्बसुम लबों पे खिला ना सके
"सजदा किया है मन से , ख़ुदा की तरह ,
तुझे मंदिर - मस्जिद में बिठा न सके.
मन में तू बसा है ख़ुदा की तरह ,
चाह कर भी तुझे, बाहर ला न सके.
फूलों सा सहेजा है ज़ख्मों को,
उनके रिसते लहू दिखा न सके.
बहलते रहे हम भूलावे में मन के,
हक़ीक़त से खुद को बहला न सके.
दूर होकर भी हम कहाँ दूर हैं,
पास आकर भी पास आ न सके.
निगाह भर के देखा उसने हमें,
पर ज़रा सा भी हम मुस्कुरा न सके.
हमें शगुफ़्ता कहा था कभी ,
आज तब्बसुम लबों पे खिला न सके.
आरज़ू थी खियाबां-य- दिल सजाने की ,
ज़दा से उजड़ा सज़र फिर लगा न सके.
पूछते हैं कहनेवाले ज़र्द रंग क्यों ?
मुन्तसिर से हैं हम, बता न सके.
ला-उबाली सा रहना देखा सभी ने,
जिगर में रतूबत है बता न सके.
दौर-ए - अय्याम बदलती रही करवटें ,
शब् -ए- फ़ुरक़त में लिखी ग़ज़ल सुना न सके.
सोज़ -ए- दरूँ कर देती है नीमजां लोगों को,
हम मह्जूरियां में भी तुम्हें भूला न सके.
सजदा किया है मन से ख़ुदा की तरह ,
तुझे मंदिर - मस्जिद में बिठा न सके.
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 7.9.10 4 comments
Labels: Gazals
गुरुवार, अगस्त 26, 2010
हर जर्रे में तू है ये अहसास तो है
गुलजार है गुलशन मेरा आज भी तसव्वुर में ,
हर जर्रे में तू है ये अहसास तो है ,
उन कहकहों का क्या करूँ ?
जो याद आ कर आज दिल को जलाती हैं ".
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 26.8.10 9 comments
Labels: Poems
शनिवार, अगस्त 21, 2010
बाबुल की लाडली आँखों का तारा
किसी और का घर महकाती हैं .
जन्म के बंधन को छोड़ कर ,
रस्मों के बंधन को जतन से निभाती हैं.
जिस कंधे ने झूला झूलाया, जिन बाँहों ने गोद उठाया,
उस कंधे को छोड़ किसी और का संबल बन जाती हैं.
बाबुल की लाडली, आँखों का तारा ,
बाबुल से दूर किसी और का सपना बन जाती हैं.
बाबुल के जिगर का टुकड़ा, वो गुड़िया सी छुईमुई,
एक दिन ख़ुद टुकड़ों में बँट कर रह जाती हैं .
सींच कर बाबुल के हाथों , किसी और की हो जाती हैं,
मेहंदी सी पीसकर , किसी के जीवन में रच जाती हैं.
लड़कियां खिल कर बाबुल के आँगन में,
किसी और का घर महकाती हैं.
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 21.8.10 9 comments
Labels: Poems
शुक्रवार, अगस्त 20, 2010
मंजिल तक आकर कदम फिसलते देखा है
जीवन की सफर में लय से सुर को छूटते देखा है.
अक्सर लोगों को बन कर भी बिखरते देखा है,
एक छोटी सी भटकाव भी बदल देती है रास्ता.
मंजिल तक आकर कदम फिसलते देखा है.
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 20.8.10 2 comments
Labels: Poems
हर चाह सिसक कर तब आह बन जाती है
"बदलती है किस्मत जो रूख अपना,
हर चाह सिसक कर तब आह बन जाती है,
वफा करके भी जब बेगैरत ज़िन्दगी से ,
ज़फ़ा की सौगात मिल जाती है. "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 20.8.10 0 comments
Labels: Poems
रु-ये -ज़िन्दगी उतनी हँसीं नहीं
ek urdu shayri zindaki ke bare me
रु-ये -ज़िन्दगी उतनी हँसीं नहीं, मालूम तब होता है जब दर्स दे जाती है,
दौरे-अय्याम जब सरशारी-ये -मंजिल से पहले नामुरादी जबीं पे सिकन लाती हैं.
रु-ये -ज़िन्दगी --- ज़िन्दगी का चेहरा
दर्स -- सबक
दौरे-अय्याम --समय का फेर
सरशारी-ये -मंजिल -- मंजिल की पहुँच
नामुरादी ------ असफलता
जबीं पे -- माथे पे
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 20.8.10 2 comments
Labels: Poems
