बुधवार, जून 23, 2010

इतिफाक से ही , सामना तो, हो ही जाता है, मुश्किलों से,

इतिफाक से ही ,
पर,
सामना तो,
हो ही जाता है,
मुश्किलों से,
सबका.
हम उसे,
स्वीकार करें,
या ना करें,
पर,
नियति अपने,
तय समय पर,
हर कार्य को करती है .

मंगलवार, जून 22, 2010

बस एक इरादा ही, काफी है, फैसले, बदलने ले लिए,

उस ज़िन्दगी को,
 क्या कहें ?
जो भरी ना हो,
चुनौती से ,
बस एक इरादा ही,
काफी है,
फैसले,
बदलने ले लिए,
हर पल जो,
तैयार हो,
मुश्किलों  में भी,
चलने के लिए.

मंगलवार, जून 01, 2010

टूट कर भी मेरा वजूद, बिखर नहीं पायेगा

जिस पर टिका है ,
अस्तित्व मेरा ,
वो बुनियाद ,
तुम्हारा कांधा है,
जानती हूँ ,
टूट कर भी मेरा वजूद,
बिखर नहीं पायेगा ,
क्योंकि ,
इसे ,
तुम्हारे संबल ने,
मजबूती से बांधा है .

बुधवार, मई 26, 2010

शब भर जलकर भी, मेरा सवेरा नहीं



"सबने जलाया ,
शब भर मुझे ,
सम्स के आते ही,
बुझा दिया.
क्यों मांगते हो,
मुझसे,
जो मेरा नहीं,
शब भर जलकर भी,
मेरा सवेरा नहीं ."

"रजनी "

सोमवार, मई 24, 2010

ये बंदिशें भी कैसी हैं

"ये बंदिशें भी कैसी हैं ,
कभी जुड़तीं हैं,
रस्मों के नाम से,
तो  कभी ,
बगावत से टूट जाती हैं,
ये  एक  ऐसी माला  है,
जिसके मनके की डोरी ,
खुद ,
गुन्धनेवाले  के हाथों ,
टूट  जाती है."

मंगलवार, मई 18, 2010

पत्थर समझता रहा

पत्थर समझता रहा मुझे,
आजतक शायद ,
तभी तो,
मेरे टूटने पर,
छू कर देखता रहा.

सोमवार, मई 10, 2010

फिर कैसे हँसकर, मिलन हो तुझसे

"ज़िन्दगी ,
तुझे,
मेरी खुशियाँ रास नहीं,
और,
मुझे समझौता ,
बता,
फिर कैसे हँसकर,
मिलन हो तुझसे "

Rajni Nayyar Malhotra.

शुक्रवार, मई 07, 2010

माँ का आँचल,


हम उम्र के किसी भी पड़ाव में हों,
हमें कदम,कदम पर,
कुछ शरीरिक, मानसिक कठिनाइयों का सामना,
करना ही पड़ता है,
वैसे क्षण में ,
यदि कुछ बहुत ज्यादा याद आता है तो वो है..
... माँ का आँचल,
माँ  की स्नेहल गोद ,माँ के प्रेम भरे बोल.
माँ क्या है?
तपती रेगिस्तान में पानी की फुहार जैसी,
थके राही के,
  तेज़ धूप में छायादार वृक्ष के जैसे.
कहा भी जाता है,
मा ठंडियाँ छांवा,
माँ ठंडी छाया के सामान है
.जिनके सर पर माँ का साया हो ,
वो तो बहुत किस्मत के धनी होते है,
जिनके सर पे ये साया नहीं ,
उनसा बदनसीब कोई नहीं.
.. पर,
कुछ बच्चे ,
अपने पैरों पर खड़े होकर,
 माता पिता से आँखें चुराने लगते हैं,
उन्हें  उनकी सेवा,
  देखभाल
उन्हें बोझ लगने लगती है..
जबकि उन्हें ,
अपना कर्तव्य,
पूरी निष्ठां से करने चाहिए.

"रजनी"

मैंने तो लकीरों पर भरोसा करना छोड़ दिया

"क्यों ,
उसे ही पाना चाहता है मन ,
जो किस्मत की
लकीर में  नहीं होता,
 मैंने  तो लकीरों पर,
भरोसा  करना छोड़ दिया ."

 " रजनी "

गुरुवार, मई 06, 2010

हम जहाँ खड़े थे वहीं खड़े रह जाते हैं,

जब जब सावन कि बूंदें कुछ,
टप,टप राग सुनाती हैं,
जब , जब कोयल   ,
अपनी ही राग गाती हैं,
हाँ कुछ,कुछ पल बीते लम्हों के,
मुझे भी सताते  है,
ये जब गुजरते हैं रुत के संग ,
मुझे भी कुछ याद दिलाती है,

बैठे अपने आंगन में ,
जब भ्रमरों का गुंजन सुनते है,
तब मन ही मन हम,
लाखों सपने अपने धुन में बुनते हैं,
कभी कभी तो नयन हमारे
 मूक दर्शक से रह जाते हैं,

जब टूट जाए सागर के बाँध तो
कमल को मेरे भिंगाते है,
खगों के कलरवों में गूंजती ,
मेरे भी अग्न बुझ जाते है,
जब हम भी अपनी अरमानों के संग
ऊँची उड़ान भर आते हैं,

कभी तितलियों के साथ
अपनी सांग लड़ते हैं,
कभी शबनम सा
खुद को ओझल पाते है,
पर कल्पनाओं का क्या,
कल्पना में तो हम
सारा ख्वाब पा जाते हैं,

जब टूटती है मेरी तन्द्रा,
तो खुद को वहीं बड़ी बेबस सा पाते है,
हम जहाँ खड़े थे वहीं खड़े रह जाते हैं,
कभी,कभी तो फूटकर,
फूटकर भाव विह्वल हो जाते है,
बस ये सोंचकर रह जाते हैं,
हम जहाँ थे क्यों वही पर रह जाते हैं,

जब जब सावन कि बूंदें ,
कुछ टप,टप राग सुनाती हैं,
जब कोयल कि कूक,
अपनी ही राग गाती हैं,
 हाँ कुछ,कुछ पल बीते लम्हों के
मुझे भी सताती है.


"रजनी ".