मंगलवार, मई 08, 2012
माँ
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 8.5.12 7 comments
बुधवार, मई 02, 2012
कोमल नारी
होती है एक नारी ।
कोमल, शांत,मृदुल,
कठोर ।
नारी जोड़ती है
तिनके जैसे घर को,
दे देती है रूप नीड़ का ।
करती रहती है बचाव,
इसमें रहनेवाले,
पलनेवाले, व् संग चलनेवाले का |
कभी बनकर धाय, कभी जन्मदात्री,
कभी सहचरी |
और भी ना जाने कितने नामों से
उपनामों से,
रूपों से संबोधन पाती है |
सहती है जीवन में आये ताप को,
सहती है कभी संताप को
जलता है जिस्म , कभी आत्मा |
कभी रोती है
नारी होने के श्राप से,
कभी नारी होने के गर्व को
कंधे पर ढोती है |
जब कभी परेशानियाँ घेर लेती हैं
अमावस का चाँद जैसे घिर जाता है |
और " नारी " -------- ना हारी को सिद्ध कर देती है,
हर एक उलझन के गांठ को
खोल देती है आहिस्ता- आहिस्ता ,
बादलों से छँटकर जैसे आकाश हो जाता है |
बना देती है
एक उजड़े वीरान झोंपड़े को भी ,
अपने संस्कार, कर्तव्य, और परस्पर सौहार्द से |
तैयार कर देती है परिवार की पृष्ठभूमि,
ठीक वैसे ही,
जैसे मिटटी गारे से दीवार की ईंट ,
हो जाता है एक महल तैयार |
शांत कोमल, मृदुल नारी भी
बनना चाहती चाहती है
कठोर,
पर रोक लेती है
ख़ुद को इस अवतरण में आने से,
जब देखती है
मासूम बच्चों को,
जब देखती है जीवन की धूप में
दिनरात पिसते हुए
सहचर को,
और कठोरता के सांचे में
ना ढल कर
वो फिर से बन जाती है
कोमल नारी |
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 2.5.12 14 comments
रविवार, अप्रैल 29, 2012
मज़दूर हूँ अपनी मजबूरी बोल रहा हूँ
मजदूर के दर्द पर मेरी एक रचना जो बहुत पहले लिखी थी, आज आप सभी के बीच साझा कर रही
आज दिल का दर्द घोल रहा हूँ,
मज़दूर हूँ अपनी मजबूरी बोल रहा हूँ |
ग़रीबी मेरा पीछा नहीं छोड़ती,
क़र्ज़ को कांधे पर लादे डोळ रहा हूँ |
पसीने से तर -ब -तर बीत रहा है दिन,
रात पेट भरने को नमक पानी घोल रहा हूँ |
आज दिल का दर्द घोल रहा हूँ,
मज़दूर हूँ अपनी मजबूरी बोल रहा हूँ |
बुनियाद रखता हूँ सपनों की हर बार,
टूटे सपनों के ज़ख्म तौल रहा हूँ |
मज़दूरी का बोनस बस सपना है,
सपनों से ही सारे अरमान मोल रहा हूँ|
रजनी नैय्यर मल्होत्रा
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 29.4.12 10 comments
शनिवार, अप्रैल 28, 2012
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 28.4.12 0 comments
शनिवार, अप्रैल 14, 2012
ये कैसी रिश्तों की विदाई
कल तक घर था अब कमरों में सिमट गए.
भाग दौड़ करते थे सारे घर में कूदाफांदी,
छीन गयी उन मासूम बच्चो की आज़ादी.
दादा,- दादी, चाचा - चाची, रिश्तों का ये भारीपन,
बड़ों के मतभेद में ना पीसो बच्चों का मन .
बंटवारे की शर्त घरों को दीवारों में पाट गयी
दिल से जुड़े रिश्तों को मतलबों में बाँट गयी
खेल खेल में चुन्नू,मुन्नू बिन्नी का व्याह रचाते थे,
वक़्त विदाई आने पर ,एक दूजे को ताब बंधाते थे.
आज वो दिन भी आया बिन्नी हुई परायी ,
उसकी डोली को देने कान्धा, आया ना कोई भाई,
ये कैसी रिश्तों की विदाई,
ये कैसी रिश्तों की विदाई ?
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 14.4.12 12 comments
रविवार, अप्रैल 08, 2012
विमान परिचारिका
जब भी वो फुरसत के लम्हों में
मेरे साथ होती ,
"मुझे चाँद पर जाना है"
सुनकर मैं हंस देती,
तुम क्या-क्या करोगी?
अजीब सी तमन्नाएं सुनाती रहती हो ,
कभी विमान परिचारिका
बनने का सपना ,
कभी कहती काश मै परिंदा होती,
सारा आकाश नाप आती,
पर चाँद पर जाने के लिए परिंदा होना काफी नहीं ,
कह कर मायूस हो जाती
फिर कुछ पल खामोश रह कर,
करती कुछ सवाल..
क्या मन की खूबसूरती काफी नहीं,
कुछ पाने के लिए ,
तन की खूबसूरती ही जरुरी है
विमान परिचारिका
बनने के लिए मेरे पास खुबसूरत मन तो है,
पर खुबसूरत चेहरा कहाँ से लाऊं ?
उसकी वो ख़ामोशी, वो तड़प,
अंतर्मन की चाह
सब मुझे ऐसे प्रतीत होते थे
जैसे आम सी ज़िन्दगी ,
और आम इच्छाओं को लिए लोग
अंतर्मुखी स्वभाव ,
पर गहरी सोंच में वो चाहत ,
एक कील सी दबी थी|
वक़्त की बदलती करवटों में
धुंधली होती गयी हर तस्वीर
जो खिंची थी उसने
मेरे साथ बैठ कर|
अनायास ही एक दिन ,
वो ज़िन्दगी और मौत से लड़ रही,
अस्पताल के बिस्तर पर,
मुझे देखते ही बस इतना कहा .......
"अब तो कोई योग्यता नहीं चाहिए मुझे चाँद पर जाने के लिए "
मेरी अर्जी शायद सुन ली उपरवाले ने,
अवाक् उसे देखती रही ,
पत्थर की तरह हो गयी ,
मै एक पल को,
आज जब भी,
दिन हो या रात
चाँद देख कर
वो नज़र आती है,
जो कहीं छुप गयी
चाँद के पीछे |
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 8.4.12 8 comments
रविवार, मार्च 25, 2012
कौन सा ऐनक लगा लूँ मै
कौन सा ऐनक लगा लूँ मै,
जिससे ढँक जाये
तैरती हुई नमी आँखों की,
तुम तो आसानी से छुपा लेती हो
कई राज़,
अपने गर्भ में,
मचलते हैं कभी
लावा बनकर
जब जज्बात अन्दर,
तोड़ने को व्याकुल होकर
पाकर कमजोर सतह को,
समेट लेती हो
बड़े अनूठे अंदाज़ में,
जिसे बंजर के नाम से
पुकारते है कभी-कभी लोग,
कौन जाने,कौन समझे
जब सम्पूर्ण तरलता छा जाएगी,
तो होगा ना सृष्टि का विनाश,
तुमसे ही तो सीखा है ,
ऐ धरा ?
प्रयत्न भी है,
न तोड़कर बाहर आ जाये,
मन के उदगार का सोता,
और ले ले कोई रूप
जलते हुए ज्वालामुखी का,
या फिर लहरें हिलोर लेते,
न बदल जाएँ तूफान में,
नहीं होना चाहिए
रिश्तों के भूमि का
आच्छादन,
जिससे रिश्ते की भूमि
हो जाये बंजर,शुष्क,
डरती हूँ तरलता से भी,
क्योंकि,कमजोर नींव
तरलता पाकर
गिर जाती है|
पहना दो कोई ऐनक
मुझे भी,
जिसमे न दिख पाए
आर-पार,
शुष्क है निगाह
कि वहां नमी है |
"रजनी"
******************
जिससे ढँक जाये
तैरती हुई नमी आँखों की,
तुम तो आसानी से छुपा लेती हो
कई राज़,
अपने गर्भ में,
मचलते हैं कभी
लावा बनकर
जब जज्बात अन्दर,
तोड़ने को व्याकुल होकर
पाकर कमजोर सतह को,
समेट लेती हो
बड़े अनूठे अंदाज़ में,
जिसे बंजर के नाम से
पुकारते है कभी-कभी लोग,
कौन जाने,कौन समझे
जब सम्पूर्ण तरलता छा जाएगी,
तो होगा ना सृष्टि का विनाश,
तुमसे ही तो सीखा है ,
ऐ धरा ?
प्रयत्न भी है,
न तोड़कर बाहर आ जाये,
मन के उदगार का सोता,
और ले ले कोई रूप
जलते हुए ज्वालामुखी का,
या फिर लहरें हिलोर लेते,
न बदल जाएँ तूफान में,
नहीं होना चाहिए
रिश्तों के भूमि का
आच्छादन,
जिससे रिश्ते की भूमि
हो जाये बंजर,शुष्क,
डरती हूँ तरलता से भी,
क्योंकि,कमजोर नींव
तरलता पाकर
गिर जाती है|
पहना दो कोई ऐनक
मुझे भी,
जिसमे न दिख पाए
आर-पार,
शुष्क है निगाह
कि वहां नमी है |
"रजनी"
******************
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 25.3.12 3 comments
शुक्रवार, मार्च 16, 2012
नहीं मिलती कहीं राहत जहाँ में , ग़म के मारे को
मेरी तबीयत भी मिलती है नदिया के पानी से,
जो पल में बदल देती है अपने धारे को |
इस रास्ते मैंने गुज़ारे कई सफ़र तन्हा ,
मगर दिल ढून्ढ़ता है आज किसी सहारे को |
मिटा न दे लहर ,किनारे पर नाम लिखा तेरा
छिपा दिया पत्थर से, उस दरिया के किनारे को |
डगमगाते क़दम को जिससे मिल गयी मंजिल,
कैसे भूल जाये कोई उस राह के नज़ारे को |
मिले बातों से तस्कीन , कुछ पल भला "रजनी",
नहीं मिलती कहीं राहत जहाँ में , ग़म के मारे को |
--
रजनी मल्होत्रा नैय्यर
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 16.3.12 8 comments
बुधवार, मार्च 07, 2012
इस बार होली में
माँ चूमे मुखड़ा , घर बेटा आया होली में |
मेहँदी छूटने से पहले चला गया परदेश जो
बिछड़ी उस विरहन से मिलने , आया होली में |
जिस बेटी की हुई विदाई इसी माह के अन्दर,
पलकें भींगी राह तकेगी, इस बार होली में |
कल तक रंजिश थी जिसको जिस किसी से ,
मिलकर साथ में , धो डालो रंजिश होली में |
सूना है "रजनी" वो छोड़कर फिरसे चला जायेगा ,
जो रंग कभी ना जायेगा, डालो इस बार होली में |
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 7.3.12 17 comments
शुक्रवार, मार्च 02, 2012
कोख के चिराग़ को
घुमती रही उसके ज़ेहन में
सारी रात,
कहीं कल का सवेरा
न बुझा दे,
मेरी कोख के चिराग़ को
अगर फिर से कट गयी
मेरे कोख में बेटी |
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 2.3.12 7 comments





