शुक्रवार, मार्च 16, 2012

नहीं मिलती कहीं राहत जहाँ में , ग़म के मारे को

मेरी तबीयत भी मिलती है नदिया के पानी से,
जो पल में बदल देती है अपने धारे को |

इस रास्ते मैंने गुज़ारे कई सफ़र तन्हा ,
मगर दिल ढून्ढ़ता है आज किसी सहारे को |

मिटा न दे लहर ,किनारे पर नाम लिखा तेरा
छिपा दिया पत्थर से, उस दरिया के किनारे को |

डगमगाते क़दम को जिससे मिल गयी मंजिल,
कैसे भूल जाये कोई उस राह के नज़ारे को |

मिले बातों से तस्कीन , कुछ पल भला "रजनी",
नहीं मिलती कहीं राहत जहाँ में , ग़म के मारे को |

--
रजनी मल्होत्रा नैय्यर

9 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बेहतरीन

सादर

dheerendra ने कहा…

सुंदर,बहुत अच्छी गजल ..रजनी जी,..बधाई

MY RESENT POST...काव्यान्जलि ...: तब मधुशाला हम जाते है,...

रविकर ने कहा…

बढ़िया है जी ||

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

वाह वाह वाह, गजब तेवर हैं आज तो………।

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

Yashvant ji bahut-bahut shukriya.......

dhirendra ji.........hardik shukriya...

Ravikar ji ........bahut-bahut shukriya..........
Lalit ji sahi kaha tabiyat hai na badalti rahti hai..........

संगीता पुरी ने कहा…

अच्‍छी प्रस्‍तुति !!

दर्शन कौर 'दर्शी' ने कहा…

गम के मारो को कही जगह नहीं मिलती ..सच कहा --इसीलिए कहते हैं --खुश रहो !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

boletobindas ने कहा…

अच्छी कविता