"नहीं सीख पाया मन मेरा छलावा,
जो लगाती मै भी मुखौटा ,
मुझ पर भी चढ़ जाते रंग जमाने के.
"रजनी मल्होत्रा नैय्यर"
बुधवार, अक्टूबर 13, 2010
नहीं सीख पाया मन मेरा छलावा
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 13.10.10 7 comments
Labels: Poems
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