बुधवार, मई 02, 2012

कोमल नारी

हर नारी के अन्दर ,
होती है एक नारी ।
 कोमल, शांत,मृदुल,
कठोर ।
नारी  जोड़ती  है
तिनके  जैसे घर को,
दे देती है रूप नीड़  का ।
करती रहती है बचाव,
इसमें रहनेवाले,
पलनेवाले, व् संग चलनेवाले का |
कभी बनकर धाय, कभी जन्मदात्री,
कभी सहचरी |
और भी ना जाने कितने नामों से
उपनामों से,
रूपों से संबोधन पाती है |
सहती है जीवन में आये ताप को,
सहती है कभी संताप को
जलता है  जिस्म , कभी आत्मा |
कभी रोती है
नारी होने के श्राप से,
कभी नारी  होने  के गर्व को
कंधे पर ढोती है |
जब कभी परेशानियाँ घेर लेती हैं
अमावस का  चाँद जैसे घिर जाता है |
और " नारी " -------- ना हारी को सिद्ध कर देती है,
हर एक उलझन के गांठ को
खोल देती है आहिस्ता- आहिस्ता ,
बादलों से छँटकर जैसे आकाश  हो जाता है |
बना देती है
एक उजड़े वीरान  झोंपड़े को भी ,
अपने संस्कार, कर्तव्य, और परस्पर सौहार्द  से |
तैयार कर देती है परिवार की पृष्ठभूमि,
ठीक वैसे ही,
 जैसे मिटटी गारे से दीवार की ईंट ,
हो जाता है एक महल तैयार |
शांत कोमल, मृदुल नारी भी
बनना चाहती चाहती है
कठोर,
पर रोक लेती है
ख़ुद को इस अवतरण में आने से,
जब देखती है
मासूम बच्चों को,
जब देखती है जीवन की धूप में
दिनरात पिसते हुए
सहचर को,
और  कठोरता के सांचे में
ना ढल कर
वो फिर से बन जाती है
कोमल नारी |
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "








 

15 comments:

रविकर फैजाबादी ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव |
आभार रजनी जी ||

dheerendra ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना के भाव,सुंदर अभिव्यक्ति रजनी जी,.....

MY RECENT POST.....काव्यान्जलि.....:ऐसे रात गुजारी हमने.....

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बेहतरीन


सादर

Anupama Tripathi ने कहा…

सार्थक कविता नारी पर ....
शुभकामनायें ...

Rajesh Kumari ने कहा…

bahut lajabaab likha hai nari na--hari sabit kar deti hai...vaah

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

रजनी जी बहुत सुन्दर ...नारी काश ऐसे ही ना-हारी बनी रहे ...इस जिन्दगी के तमाम उत्ताप सह कर वो और निखरे कोमल बनाये सुसंस्कृत रहे ..लोगों का भरपूर सम्मान पाए रचे बनाये ..ऐसी हर नारी को नमन ..
भ्रमर ५
रजनी जी अपने ब्लॉग की चौडाई कुछ अडजस्ट कर लें दायीं तरफ हिंदी बनाने का उपकरण कुछ कट रहा है इस तरफ कुछ बढ़ा लें ले आउट में जा कर
भ्रमर ५

sangita ने कहा…

नारी के सार्थक व्यक्तित्व को परिभाषित कर रहीं है |
बधाई|

udaya veer singh ने कहा…

संवेदनशील कविता...आभार

दिलबाग विर्क ने कहा…

आपकी पोस्ट 3/5/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें

चर्चा - 868:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सटीक और सार्थक रचना ... बधाई

M VERMA ने कहा…

नारी आखिर कब हारी
बहुत सुन्दर

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आज चार दिनों बाद नेट पर आना हुआ है। अतः केवल उपस्थिति ही दर्ज करा रहा हूँ!

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

Aap sabhi ke is sneh k liye mera hardik aabhar ,,,,,,,,,,

mridula pradhan ने कहा…

bahot khoobsurat......

Dr.R.Ramkumar ने कहा…

achchhe bhav aur chintan ka samanvay hai kavita mein