जिस पर टिका है ,
अस्तित्व मेरा ,
वो बुनियाद ,
तुम्हारा कांधा है,
जानती हूँ ,
टूट कर भी मेरा वजूद,
बिखर नहीं पायेगा ,
क्योंकि ,
इसे ,
तुम्हारे संबल ने,
मजबूती से बांधा है .
मंगलवार, जून 01, 2010
टूट कर भी मेरा वजूद, बिखर नहीं पायेगा
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 1.6.10 5 comments
Labels: Poems
सदस्यता लें
संदेश (Atom)