शुक्रवार, मार्च 02, 2012

कोख के चिराग़ को

हर बात ,
घुमती रही उसके ज़ेहन में
सारी रात,
कहीं कल का सवेरा
न बुझा दे,
मेरी कोख के चिराग़ को
अगर फिर से कट गयी
मेरे कोख में बेटी |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

8 comments:

dheerendra ने कहा…

सशक्त रचना,...रजनी जी ..बधाई
इसी आशय पर लिखी मेरी पुरानी पोस्ट "वजूद"पढे,
एक निवेदन,..कमेंट्स मिलने पर,कमेंट्स दे,यही ब्लोगजगत का शिष्टाचार और व्योहार है,अन्यथा न ले...

NEW POST ...काव्यान्जलि ...होली में...

Rakesh Kumar ने कहा…

मार्मिक,हृदयस्पर्शी.

दिल को छूती और कचोटती हुई प्रस्तुति.

क्या कहूँ,शब्दहीन हूँ बस.

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बेहतरीन रचना

सादर

sangita ने कहा…

सशक्त रचना,...रजनी जी ..बधाई

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

बहुत खूब....
दिल को कहीं छु गयी...!!
मर्मस्पर्शी..

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

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♥ होली ऐसी खेलिए, प्रेम पाए विस्तार ! ♥
♥ मरुथल मन में बह उठे… मृदु शीतल जल-धार !! ♥



आपको सपरिवार
होली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !
- राजेन्द्र स्वर्णकार
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रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

Aap sabhi ko mera hardik aabhar.......

sath hi hOLI ki shubhkamnayen......

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

Aap sabhi ko mera hardik aabhar.......

sath hi hOLI ki shubhkamnayen......