बातों को |
मंगलवार, अप्रैल 05, 2011
तुम्हारे बगैर
बातों को |
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 5.4.11 11 comments
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शनिवार, मार्च 12, 2011
कर्म भाग्य बनाता है. बेटों का भी और बेटियों का भी.
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 12.3.11 12 comments
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सोमवार, मार्च 07, 2011
नारी तेरे रूप अनेक
ये रचना मेरी प्रथम काव्य संग्रह "स्वप्न मरते नहीं " से ली है
नारी निभा रही है हर जिम्मेवारी,
कैद ना करे इन्हें घर की चहारदीवारी,
कंधे से कंधा मिलाकर,
कम की है इसने,
पुरुषों की जिम्मेवारी,
जीवनसाथी बनकर,
पूरी करती अपनी हिस्सेदारी,
कभी रूप सलोना प्यारा लगे,
रहे शांत समुंद्र सी न्यारी,
अगर जरुरत पड़ जाये ,
ये बन जाये चिंगारी,
कभी दूध का क़र्ज़ निभाने को,
कभी माँ,बहू, बहन का फ़र्ज़ निभाने को,
पल पल पीसी जाती रही नारी,
हर कदम इम्तिहान से गुजरी ,
फिर भी उफ़ ना मुख से निकली,
ये तो महानता है इसकी,
जो दिखती नहीं इसकी बेकरारी,
आधा रूप बदला इसने जो,
समाज का अक्स सुधारी,
तुलना करोगे किससे ?
हर कुछ छोटा पड़ जायेगा.
ममता की गहराई मापने में ,
सागर भी बौना खुद को पायेगा.
ये अनमोल तोहफा है,
जो कुदरत ने दी है प्यारी,
हर मोड पर फिर क्यों ?
बुरी नज़रों का करना पड़ता है ,
सामना इसे करारी.
ये क्यों भूल जाते हो ?
तुम्हें संसार में लानेवाली भी,
है एक नारी.
चुटकी भर सिंदूर को ,
मांग में सजाती है,
उसका मोल चुकाने को,
कभी कभी ,
जिन्दा भी जल जाती है नारी.
हर जीवन पर करती अहसान,
फिर भी ना पा सकी सम्मान.
नारी निभा रही है हर जिम्मेवारी,
कैद ना करे इन्हें घर की चहारदीवारी.
"रजनी मल्होत्रा नैय्यर "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 7.3.11 13 comments
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धरा अम्बर एक हो गए
आकाश से आ
ऐसे मिल जाती हैं
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 7.3.11 5 comments
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सोमवार, फ़रवरी 21, 2011
मेरे शब्द ,मेरे विचार .
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 21.2.11 16 comments
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गुरुवार, फ़रवरी 17, 2011
विवाह के बारहवे वर्षगांठ पर
तुम्हारे साथ लिए,
सात फेरे,
व् सात वचन ,
के साथ
बारह वर्ष ,
गुजर गए.
पर ,
सारे वचनों के मोल,
मैंने ही निभाए ,
तुमने तो,
जो वक़्त बीते,
उन्हें निभाया नहीं,
बस गुजारा है.
फिर भी ,
ये कामना है ,
अब आनेवाला हर पल,
हमारे विवाह के ,
सात फेरों व्
सात वचनों की तरह,
पूरी मजबूती से ,
गठबंधन की तरह ,
बंध जाये.
एक दुसरे के प्रति,
प्रेम, विश्वास ,
समर्पण के साथ.
जिस अग्नि को ,
साक्षी मानकर ,
हमने जीवनसाथी,
बन आजीवन ,
साथ निभाने की ,
कसमे उठायी थीं.
ये गठबंधन ,
किसी भी हालात में,
ना टूटे.
ना ही ,
क्रोध की अग्नि में ,
भस्म हो.
ये शिकायत नहीं तुमसे,
तुम तो सदा ही ,
निन्यानबे के चक्कर में ,
पड़े रहे,
शायद हमारा फेरा ही ,
निन्यानबे का पड़ा.
क्योंकि ,
उस दिन ,(१८ -२-१९९९)
अठारह फरवरी उन्नीस सौ निन्यानबे था .
चाहती हूँ ऐसे रहना,
तेरे साथ,
जैसे गुलाब में उसकी खुशबू.
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 17.2.11 24 comments
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बुधवार, फ़रवरी 16, 2011
जिसके घर में , कदम पड़ते ही
घर में क़दम पड़ते ही
मेरा धर्म भ्रष्ट हो गया
ये कह कर
वो स्नान को चली गयी |
उसने छुआ जिस वस्तु को
उसमे गंगाजल डाल
कई बार धोती रही |
अचानक एक दिन
समाचार मिला
तेरा बेटा गिर पड़ा है
सड़कों पर |
वो बदहवास भागी,
तेज़ धूप और गर्मी के मारे
वो बेहोश हो गया था ,
उसने आनन् फानन में
दिया अपने पल्लू से हवा ...
तभी किसी ने कहा
इसे पानी पिलाओ
और,
जिसके घर में
क़दम पड़ते ही
धर्म भ्रष्ट हो रहा था
आज उसी की हाथों से
पानी पीकर
उसका बेटा
नया जीवन पा गया |
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 16.2.11 21 comments
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शुक्रवार, फ़रवरी 11, 2011
१४ फरवरी वेलेंटाइंस डे’ प्रेम दिवस
पाश्चात्य के पीछे अपनी संस्कृति भुनाने में.
स्कूल कालेज बंद आज, पर भीड़ लगी उद्यानों में,
लगे क़तार में खरीदारी को फूलों के दुकानों में.
१४ फरवरी वेलेंटाइंस डे’ प्रेम दिवस,
क्या कहें युवाओं, इसे सर दर्द या प्रेम रस.???
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 11.2.11 15 comments
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सोमवार, जनवरी 31, 2011
ये आईना
एक स्त्री को
भददी- भददी
गालियाँ दे रहा था
और निरंतर
उस स्त्री की
पिटाई कर रहा था |
कुछ लोग,
जिनमें स्त्रियों की
संख्या ज़्यादा
थी
पास से देखते
आपस में कहते रहे,
ये पति- पत्नी का
मामला है
हमें इससे क्या ?
ये कुछ भी करें !
सभी
ये कह वहां से
खिसक गए ।
कुछ दिनों बाद
पत्नी,
पति को
अपने हाथों से
खिला रही थी
अपने घर के
प्रांगन में ।
तभी,पड़ी
उनदोनों पर
एक
पड़ोसन की नज़र ,
ये देख आसपास
चर्चे फ़ैल गए
कितने बेशर्म हैं
ये लोग ,
क्या पति- पत्नी को
ऐसे रहा जाता है ?
ये आईना है
हमारे सभ्य
समाज का
जिसमें
हम रहते हैं ।
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 31.1.11 25 comments
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शुक्रवार, जनवरी 28, 2011
बेटी होना गुनाह है ?
बेटी होना गुनाह है ?
माँ ,
बस तीन बातें याद रख .....
भगिनी ,
भोग,
भरण.
तू इसी लिए
पैदा हुई है |
बेटी ने कहा
ये ठीक नहीं माँ
मुझे
ये बंधन नहीं,
ख़ुद का
फैसला भी चाहिए,
जो मुझे
अपने रूप से जीने दे
माँ :
अच्छा होता
ये कुल कलंकिनी
पैदा ही ना लेती |
तू तो ,
नारी जाति के ,
नाम पर
कलंक है
जो वर्षों से
चली आ रही
इस
मर्यादा को
तोड़ने पर
उतारू है |
"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 28.1.11 4 comments
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