सोमवार, मार्च 07, 2011

धरा अम्बर एक हो गए

आकाश बरस  कर
निरभ्र हो जाता है, 
मिल जाता  है
उसके रुग्णता को
एक शांत एहसास |
घुमड़ते हुए
बादलों के रूप में
मचलते रहते हैं
उसके मन में भी 
असंख्य सवाल |
 धरा का स्पर्श
देता है उसे असीम धैर्य
बूंदें  पानी की
आकाश से आ
ज़मीं  पर
ऐसे मिल जाती हैं
मानो हो  एक सीमा रेखा
जिसके पाटने से
धरा- अम्बर एक हो गए |
 मनुज मन भी
जब व्यथित,भ्रमित 
बरसने की चाह में
हो जाता है  गुमराह
पाने को 
एक स्पर्श कांधे पर 
जिसपर टिककर
उसके मन का आकाश  भी
निरभ्र हो जाये  


 
 

5 comments:

Atul Shrivastava ने कहा…

धरती और आकाश के रिश्‍तों का सुंदर चित्रण।
अच्‍छी रचना।
बधाई हो आपको।
महिला दिवस की शुभकामनाएं।

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

happy womens day...:)
bahut pyari rachna.......

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

bahut bahut aabhar aap dono ko.......

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA ने कहा…

बेहद प्रभावशाली रचना लिखी । रजनी जी आपने ।
सार्थक सशक्त अभिव्यक्ति । धन्यवाद ।

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA ने कहा…

रजनी जी Recent Visitors और You might also like यानी linkwithin ये दो विजेट आप आने ब्लाग पर लगा लीजिये । इसको लगाने की जानकारी के लिये आप " ब्लागर्स प्राब्लम " पर
Monday, 7 March 2011 को प्रकाशित ये लेख "आपके ब्लाग के लिये दो बेहद महत्वपूर्ण विजेट " देखिये । धन्यवाद ।