हमने दास्तान सुना दी गम -ए- ज़िन्दगी की |
कभी हवा के झोंके संग "रजनी" उड़ा दिए ,
जितने भी मिले दस्तूर दुनिया के चलन से |
कबतक मेरे दर से वो खाली हाथ जाये ?
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औरों की तरह तू मुझमें हाथ धोता क्यों नहीं "
जैसे ग़रीब झोपड़े को महल कहते हैं |
जमाने में किसी काम की आगाज़ को ,
कुछ लोग , आरम्भ, कुछ पहल कहते हैं |
फूलों से राह सजाईये , काँटों को छांटिए |
हमदर्दी से दिल मिलाईये, दुश्मनी को पाटिये ,
अमन का पैगाम "रजनी" सरहदों में बाँटिये |
सहरा के अनल सा न हो , बस समां सा जलता चल |
एक मिटे तो दूसरी उभर आती है "




