सोमवार, सितंबर 10, 2012

आ गए घर जलानेवाले , हाथों में मरहम लिए

थम   गया  दंगा,  कत्ल   हुआ      आवाम     का , 
आ  गए घर जलानेवाले   ,  हाथों में  मरहम  लिए |

तारीकी  के अंजुमन   में,        साज़िश की  गुफ़्तगू,
आ गए सुबह    अमन का ,  हाथों  में  परचम  लिए |

सज़ावार     जो  हैं, "रजनी"  वो       खतावार     भी,
आ गए  चेहरे पर डाले नक़ाब  ,हाथों में दरपन लिए |
 

जुड़ा है दर्द ज़िन्दगी से,सूदखोर की तरह

 ख़्वाब आयें पलकों पर ,तमन्ना नहीं रही,
 कि  रातें  भी तो अब सुकून से कटती नहीं ,| 

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लिखनेवाले   ने, कतरे  को   भी  दरिया  लिखा ,
जब बात आई इतिहास की दरिया नहीं मिला कहीं |

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 हर  बार चुकाने की  सोचूँ   दर्द का ब्याज,
पर जुड़ा है  दर्द ज़िन्दगी से,सूदखोर की  तरह |
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" जो हर   बात पर दाद देते हैं , हर   बात  पर  वाहवाही ,
"सब धान बाईस पसेरी "उनकी महफ़िल  में गया तो पाया |

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एक राह है जो   मंजिल तक जाती है,
एक राह है   जो  मंजिल   भुलाती   है |

"रजनी"




रविवार, अगस्त 19, 2012

अल्लाह मेरे मुल्क में अम्नो अमाँ रहे


ईद मुबारक हो आप सभी को.........

अल्लाह मेरे मुल्क में अम्नो  अमाँ  रहे,
इत्तेहाद  भाईचारगी सदा    यहाँ   रहे |

हर दिन   ईद ,  हर   रात   दिवाली   हो
हिंदुस्तान    पर       ख़ुदा  मेहरबाँ   रहे |

झुक-झुक    कर  दुनिया   करे    सलाम,
दुनिया के आँखों का  तारा हिन्दुस्तां रहे |

दुनिया को  दिया  है  हमने  पैगामे अमन ,
ये  पैगाम  ता- कयामत  रवाँ- दवां    रहे |

हिन्दू,   मुस्लिम, और   सिक्ख,  ईसाई ,
हर रंग के फूल से  सजा गुलिस्ताँ   रहे |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा
बोकारो थर्मल (झारखण्ड )

मंगलवार, अगस्त 07, 2012

मंगलसूत्र और नारी




काले मोतियों में पिरोये ,
अनगिनत विश्वास
और शंकाओं को पाले,
डाले रहती है गले में
जान से भी बढ़कर
सहेजती है
इस काले मोती के धागे को |
खोने का
कभी  बिखरने का डर
सताता रहता है |
कुंदन में जड़ी हो
या कोरे धागे में,
कोई फर्क नहीं पड़ता ,
आस्थावान  होती है नारी,
विश्वास,अविश्वास से परे
 हर तीज-त्योहर पर,
मंगलसूत्र के लंबी उम्र की
करती है कामना |
बीते दिन  एक नारी की
 ले ली जान  मंगलसूत्र ने,
ये   खबर सुनकर भी,
आसपास
बरबस दुहरा गयी नारियाँ,
लंबी हो उम्र मेरे मंगलसूत्र  की |
पीट  गयी एक नारी  ,
शराबी के हाथों ,
होश में आते ही
बात जुबां पर आई,
लंबी हो उम्र मेरे मंगलसूत्र  की |
एक धागे की बढ़ा देती है बिसात,
कर देती है अमर
मनके के हर दाने को
अपने विश्वास से |
नारियां कहाँ छोड़ पाई हैं
आज भी अपने पुरातनपंथी  को ?
वो गंगू बाई हो या,
कंपनी की मीटिंग में बैठी
पुरुष से होड़ करती नारी ,
बातों -बातों में ,
छू जाते हैं उसके हाथ
गले के मंगलसूत्र को |
जन्म से ही बंध जाती है
मंगलसूत्र से नारी
और चाहती है जीवनपर्यंत
इससे बंधे रहना |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

रविवार, अगस्त 05, 2012

कलम के सिपाही उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी की जन्मदिवस पर




कल कलम के सिपाही उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी की जन्मदिवस पर बोकारो के नावाडीह ग्राम के आदर्श ग्राम विकास सेवा समिति की ओर से मुझे भी निमंत्रण मिला नावाडीह आने के लिए | नावाडीह पहले से ही उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र के रूप में आम
लोगों मन में बसा है , बात काव्यगोष्ठी की थी और उस पर एक चुनौती उग्रवाद क्षेत्र | किसी ने कहा मुझे मत जाईये वहां , खतरा कब आ जाये , और वैसे भी जगह बिलकुल जंगल से भरा है और ग्रामीण इलाका है , पर, मेरी जाने की इच्छा को देखते हुए पति और स्वसुर जी ने मुझे जाने की इजाज़त दे दी| देवर के साथ मैं बाइक पर ही निकली, कभी पक्की सड़क ,कभी पगडंडियों के रास्ते जंगलों का विहार करते हमलोग कई गांवों ( पिलपिलो, सरुबेड़ा, पलामू ) से गुजरते हुए , आखिर नावाडीह पहुँच गए , ये मेरा पहला अनुभव था ऐसे किसी ग्रामीण क्षेत्र में काव्यगोष्ठी के लिए जाना , और एक चुनौती के रूप में स्वीकार कर उग्रवाद क्षेत्र में जाना , पर वहां जाकर सबकुछ सामान्य लगा ,सभी आम इन्सान हमसभी के जैसे ही अपने-अपने कार्यों में थे | आदर्श ग्राम विकास सेवा समिति की और से एक ये काव्यगोष्ठी प्रेमचंद जी को सम्मान देने के लिए रखा गया था| मेरे साथ अन्य लोग भी मौजूद थे जिनमें श्यामल बिहारी महतो जी कथाकार ,जो तारमी कोलियरी के कार्मिक विभाग कार्यालय सहायक के पद पर कार्यरत है, इनकी पुस्तक कहानी संग्रह "बहेलियों के बीच" व् लतखोर प्रकाशित हो चुकी है , जलेश्वर रंगीला जी कवि व् पत्रकार जिन्होंने अपनी २ कविता सरकार और समाज पर सुनाई | कवि शिरोमणि महतो जी जिनकी " काव्य संग्रह "कभी अकेले नहीं आ चुकी है , इन्होने भी अपने विचार प्रेमचंद जी से सम्बंधित रखे |
वासु बिहारी जी खोरठा के प्रतिष्ठित कवि जिनकी काव्यपाठ आकाशवाणी व् दूरदर्शन में हो चुकी है | नेता पर इनके शब्द्वान निशाना लगाते रहे | हिंदी और मैथिली के विख्यात कवि हरिश्चंद्र रज़क जिन्होंने नारी के सम्मान में अपनी एक कविता पढ़ी "कौन कहता है नारी अनाड़ी है ,जबकि ये देश की खिंच रही गाड़ी है, समाजसेवी व् उभरते कवि सुमन कुमार सुमन के साथ वासुदेव तुरी ने अपनी रचना पढ़ी | सेवा समिति के सचिव वासुदेव शर्मा , व् कोषाध्यक्ष प्रेमचंद महतो ने समापन व् धन्यवाद विचार रखा | सभी के उपस्थिति में ये गोष्ठी हुई .मुझे बताते हुए अति हर्ष का अनुभव हो रहा , जहाँ जाने के नाम पर लोगों के कयास ने मुझे अन्दर से डरा कर रख दिया था वहां श्यामल बिहारी महतो जी, वासु बिहारी जी , और मुझे सम्मान के साथ मुख्य अतिथि के पद पर आसीन किया गया | गोष्ठी का मुख्य मुद्दा रहा उपन्यास सम्राट से सम्बंधित अपने अपने विचारों का प्रस्तुतिकरण और साथ ही अपनी किसी भी विधा में कविता पाठ , हल्की- हल्की बारिश में ही ये गोष्ठी करीब ४ घंटे तक शांति रूप से चली और सांयकाल के 5 बजते तक समाप्त हो गयी | जिस डर से मैं बेफिक्र निकली थी घर से, उसी निर्भयता के साथ वापस अपने घर भी आई |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
बोकारो थर्मल

शुक्रवार, जुलाई 20, 2012

 मैं   बहुत   परेशान हूँ  अपने  देश   के   हालत   पर,
 कोई लड़ रहा भाई- भतीजा कोई      जातिवाद  पर |

सरहद  पर   खून शहीदों का  जैसे  वारि की  धारी  है ,
हर दिन नए  घोटालों में  सनी    सियासत    सारी   है |


 जज़्बे पर हालात कभी,  हालात पर जज्बा भारी है ,
 हो जाओ तैयार नस्ल-ए-नव अब तुम्हारी  बारी है |

 "रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

गुरुवार, जुलाई 19, 2012

चला कहाँ बलखाते लश्कर सहाब का

क्यों न कहूँ इसे मौसम की  साहिरी,
बूटे-बूटे में सब्ज़ की सावनी छटा है |


चला कहाँ बलखाते लश्कर सहाब का,
ऐसे लगे किसी की जुल्फों की घटा है |


झील के सीने पर रवाँ हंस का जोड़ा,
शायद एक - दूसरे पर मर   मिटा है  |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

बुधवार, जुलाई 04, 2012

बाद मरने के भी "रजनी" लोग याद करें

ग़मगीन बेसहारों के घर को आबाद करें,
कुछ पल ही सही यतीमों को शाद करें |


ता -दम -ए ज़ीस्त नेकी में बर्बाद करें ,
शायिस्तगी हो सब में फरियाद करें |

बन कर शब माह तारीकी को बर्बाद करें,
सहराई को गुलशन सा आबाद करें|

दर्दमंदों के खिदमत में आगे हाथ करें,
बाद मरने के भी "रजनी" लोग याद करें |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

शनिवार, जून 09, 2012

मुझे जन्मदिन  की स्नेह और शुभकामनायें देने  के  लिए, दिल की गहराइयों से आभार सहित आपको  शुक्रिया , इसी तरह स्नेह के सागर में डूबे  हुए , अमूल्य मोती सा  ,  आपका स्नेह मुझे सदा मिलता रहे ।
 स्नेह के साथ ........ 
" रजनी नैय्यर  मल्होत्रा "


शुक्रवार, मई 11, 2012

उल्टा चोर कोतवाल को डांटे (लघु कथा)


शेखर जंक्शन पर दामिनी के आने का इंतजार रात के ग्यारह बज़े से ही कर रहा था , जैसे जैसे रात गहराती गयी स्टेशन  की दुकाने बंद होती गयी और सन्नाटा पसरने लगा | रात के ठीक 1.30 बज़े इंटरसिटी  एक्सप्रेस अपने समय पर पहुँच  गयी , रात होने के कारण जंक्शन सुनसान सा था दो-चार लोग नज़र आ रहे थे | शेखर का इंतजार ख़त्म हुआ ट्रेन आकर लग गयी उसने कोच २ में दामिनी को खिड़की  से देखते हुए  हुए आवाज़ लगायी , दामिनी अपने सामान समेट रही थी और अपने माता-पिता  से विदा लेते हुए शेखर के साथ नीचे आ गयी, दामिनी अपने माता पिता के साथ कई धार्मिक स्थलों से  घुमकर  वापस आ रही थी , जिसे शेखर ने ही उस जंक्शन पर उतरने को कहा था कि वो उसे लेने आ रहा  यहीं से वो वापस घर चली आएगी | वे  प्रतिक्षालय में ना जाकर  सामान और बच्चों को लेकर प्लेटफोर्म ३ कि तरफ बढ़ने लगे वही पर उनके घर जानेवाली ट्रेन लगी हुई थी जो सुबह के ३.३० में उस जंक्शन से खुलती है | बच्चों को लेकर सीट में दामिनी भी सोने की कोशिश करने लगी पर कुछ मच्छरों कि फ़ौज और प्यास लगने से वो सो नहीं पाई उसने शेखर को पानी लाने के लिए कहा पर उसने दामिनी को ही कहा  बाहर जाकर नल से आँखों और चेहरे को धोले जिससे वो कुछ अच्छा महसूस करेगी | बेटी नंदिनी को लेकर बाहर नल से चेहरे को धोकर  पानी लेकर  दामिनी वापस डब्बे में  चली जाती है | वो रात १३ अप्रैल की रात थी ,ना जाने क्यों उस दिन काफी आवारा से  लड़के स्टेशन पर घूम रहे थे , शक्ल और हुलिए से  न तो मजदूर दिखते थे न ही विद्यार्थी | सबके सब रंगदार से कमीज पैंट, कुर्ता पैंट | सबके हाथों में कुत्ते बांधनेवाली  चैन , मोबाइल  और सर पर रुमाल ऐसे बंधे जैसे कफ़न बांध  कर घर से चले हों| उनमे से कुछ गोल बनाकर पानीवाले नल के पास खा भी रहे थे , और उन्होंने दामिनी को डब्बे में चढ़ते हुए देखा भी | खाने के बाद उनमे से तीन-चार लोग उठे और ठीक उसी डब्बे के सामने लगे बैठकर मोबाइल पर  गाना बजाना बार-बार ---छूना न छूना न, कभी चिकनी चमेली | पन्द्रह बीस मिनट तक ये तमाशा  देखने के बाद दामिनी ने ही शालीनता से डब्बे के खिड़की से कहा बेटा तुमलोगों को गाना ही बजाना है तो जाओ कहीं और जाकर बजाओ या आवाज़ कम कर लो , सुबह जल्द स्कूल बच्चों को जाना  है , मुझे भी निकलना है,  सारी रात ट्रेन में भी उतरने के लिए जागते रहे सो नहीं पाए हमसब,  नींद आ रही सोने दो | उनमे से एक ने कहा ठीक है आंटी हमलोग अब नहीं बजायेंगे , पांच मिनट तक उनकी ओर से कोई शोर नहीं आया, पर अचानक ही एक साथ तीन-तीन मोबाइल पर अलग-अलग गाने जैसे कान फाड़ने वाले  हों बजने लगे | इस पर दामिनी ने शेखर से कहा कितने उदंड हैं ये लोग उम्र भी उतनी नहीं पर हरकत तो देखो इनकी , बार-बार मना करने पर भी सुनाई नहीं दे रहा इनसबको, सुबह जल्द स्कूल भी जाना है ,  तुम्हें भी ऑफिस निकलना है, और आँखें नींद से ऐसे हैं जैसे  कंकड़ चुभ रहे हो आँखों में | अब इस बार खिज़ कर शेखर ने दामिनी का साथ देते हुए कहा अरे तुमलोग सुनते नहीं हो क्या कहा जा रहा, कुछ तो संस्कार मिले होंगे  , शिष्टाचार लगता है मालूम ही नहीं तुमलोगों  को यहाँ से वहां तक ट्रेन में स्टेशन में तुमलोगों को यही जगह मिला गाना बजाने  के लिए | उनमे से दो उठ कर चले  गए  एक जो बाकी रहा वो कुछ देर बैठा रहा फिर एकाएक उठा और जाते कहता गया हमलोग तो " शिष्टाचार को आचार बना कर खा गए " इस ट्रेन में अभी भी बिजली नहीं थी, बाहर की ही रौशनी जो छन कर आ रही थी | और वे लोग दामिनी को अकेली समझ कर उसे परेशान करनेवाली मंशा से ये हरकतें कर रहे थे , | अब उनकी हरकतों को नज़रंदाज़ कर दामिनी भी सोने की कोशिश करने लगी जैसे शेखर व् बच्चे थे, ३.१५ हो रहे थे अब सब डब्बों में बिजली आ गयी थी, अब वे लोग  बंदरों सी भाग दौड़ कभी इस डब्बे में कभी उस डब्बे में करते  रहे , और कुछ शेखर की डब्बे में भी कोई यहाँ कोई वहां छितरकर बैठ गया | और लगे आपस में टिप्न्नियाँ कसने , बच्चों  बोलो ए फॉर अप्प्ल , बी फॉर बॉय , अरे सो न रे सुबह स्कूल जाना है .......कह कर हंसने लगे अब शेखर ने थोड़ी कड़ी रुख अपनाई उसने उठ कर उनको डांटते हुए कहा बड़े बद्द्तामिज़ हो तुमलोग जाना कहाँ है तुमलोग को ? पर वो ही लोग बेशर्मी से शेखर को बोलने लगे आपका घर नहीं है ये , ट्रेन में टाइम पास करने  के लिए कोई टाइम नहीं होता है | उनकी उम्र कोई खास नहीं थी सब के सब १५-१७ साल के बीच के थे पर व्यवहार पूरा  आवारा, और गंवारों वाली ,दामिनी अब  फुसफुसाते हुए शेखर को कुछ भी कहने को मना करने लगी | ये लोग न तो शिक्षित हैं ,न इनमे संस्कार शिष्टाचार  ही है , इतना ही पता होता तो बार -बार मना करने पर वो लोग उत्पात नहीं मचाते | उपदेश वहां काम आता है जहाँ समझ हो, ये लोग तो शक्ल से ही अनपढ़ ,जंगली ,और आवारा दिख रहे तुम मुंह लगोगे और तुमसे उलझ पड़े  तो ? सुबह के ३.३० हो चुके थे अब ट्रेन भी खुलने की  सीटी देकर आगे बढ़ने लगी | अबतक जितने भी उनमे से नीचे थे लगे उछल कर चढ़ने , औए उस डब्बे में ही यहाँ वहा कर भर गए , और तेज़ आवाज़ में फिर मोबाइल पर गाना चलाने लगे  ये कह कर की लगाओ सब अपने अपने मोबाइल में गाना देखें साला कौन रोकता है ......जब ट्रेन थोड़ी गति पकड़ ली तब जिस लड़के को शेखर ने डाटा  था उसने एक काले से लम्बे पतले लड़के को हाथ पकड़े  ठीक शेखर के पास लाया और बोला भईया  हमलोग गाना सुन रहे थे तो ये ही मना कर रहा था बजाने से |उसने दहाड़ते हुए कहा पहचानते हो की नहीं, शेखर को सम्भाले बिना ही उसने अपना एक जोरदार चांटा शेखर को देने के लिए हाथ उठाया ही था की शेखर ने उसका हाथ रोक लिया और ये कहा कि शायद  तुम नहीं पहचानते , एक तो गलती करते हो तुमलोग और ऊपर से परेशान करते हो दादगिरी दिखाते हो उतरना कहाँ   है तुमलोग को ? उसने फिर उस लड़के से कहा बता तो रे और कोई था जो तुमलोग को मना कर रहा था ,  उनदोनों की बढ़ती झड़प को देखकर पास डब्बे से दो व्यक्ति  और आ गए जिन्होंने शेखर को ही कहा जाने दो भईया आप ही शांत  हो जाओ ,  कह कर हटाते हुए शेखर को अलग किया |   हम लोग भी तो झेल  रहे थे इन सबकी  हरकत को ,  पर क्या करें आप भी झेल लेते |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"
बोकारो थर्मल