मंगलवार, जून 29, 2010
गुफ्तगू से नहीं,लरजते अधर, सितम बोलते हैं,
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 29.6.10 13 comments
Labels: Gazals
रविवार, जून 27, 2010
जिस आसमां ने मुझको चमकना सिखाया ,.
जिस आसमां ने मुझको चमकना सिखाया ,
आज खुद से वो ,क्यों मेरा दामन छुड़ा गया.
मै चाँद तो थी पर चमक ना थी मेरी,
दी रौशनी मुझे दमकना सीखा गया.
थी मंजिल मेरे निगाहों के आगे,
पग बन मेरे ,मुझे चलना सीखा गया.
अँधेरा हटाने को मेरे तम से मन के,
वो बना कर सितारा,मुझे ही जला गया .
"रजनी" (रात ) की ना कहीं सुबह है,
इस बात का वो अहसास दिला गया.
"रजनी"
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 27.6.10 7 comments
Labels: Gazals
सागर में रहकर भी, प्यासे रह गये
खुशियों के ढेर में भी,
मोम लिए बर्फ पर थे,
मृग मरीचिका मन का भ्रम है,
फिर भी सोने का देखा हिरन,
बंद रखा था पलकों को,
बंद पलकों से भी,
हर धड़कन को छू लें,
हम आदमी थे आम,
सागर में रहकर भी,
खुशियों के ढेर में भी,
हम आदमी थे आम,
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 27.6.10 5 comments
Labels: Poems
शनिवार, जून 26, 2010
वो, खुद को , पर्दानशी कहते रहे
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 26.6.10 5 comments
Labels: shayari
शुक्रवार, जून 25, 2010
जो टूट कर भी, मुझे, जोड़ता गया
"कुछ इस तरह से,
टूटा,
वो आसमां से,
तारा,
जो टूट कर भी,
मुझे,
जोड़ता गया."
जितनी भी,
निराशा की
डोर ,
बंधी थी
मेरे,
मन में,
उस,
डोर की
कड़ी,
को वो,
तोड़ता गया.
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 25.6.10 3 comments
Labels: Poems
गुरुवार, जून 24, 2010
बेबस रहा संगीत मेरा
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 24.6.10 2 comments
Labels: Poems
बुधवार, जून 23, 2010
इतिफाक से ही , सामना तो, हो ही जाता है, मुश्किलों से,
इतिफाक से ही ,
पर,
सामना तो,
हो ही जाता है,
मुश्किलों से,
सबका.
हम उसे,
स्वीकार करें,
या ना करें,
पर,
नियति अपने,
तय समय पर,
हर कार्य को करती है .
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 23.6.10 2 comments
Labels: Poems
मंगलवार, जून 22, 2010
बस एक इरादा ही, काफी है, फैसले, बदलने ले लिए,
उस ज़िन्दगी को,
क्या कहें ?
जो भरी ना हो,
चुनौती से ,
बस एक इरादा ही,
काफी है,
फैसले,
बदलने ले लिए,
हर पल जो,
तैयार हो,
मुश्किलों में भी,
चलने के लिए.
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 22.6.10 6 comments
Labels: Poems
मंगलवार, जून 01, 2010
टूट कर भी मेरा वजूद, बिखर नहीं पायेगा
जिस पर टिका है ,
अस्तित्व मेरा ,
वो बुनियाद ,
तुम्हारा कांधा है,
जानती हूँ ,
टूट कर भी मेरा वजूद,
बिखर नहीं पायेगा ,
क्योंकि ,
इसे ,
तुम्हारे संबल ने,
मजबूती से बांधा है .
Posted by डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) at 1.6.10 5 comments
Labels: Poems