गुरुवार, अक्तूबर 08, 2015

कहीं पत्थर कहीं पर्वत कहीं जंगल भी मिलते हैं

हौसलों के चट्टान को तोड़ देते हैं नाउम्मीदी के पत्थर 
उम्मीदों के दीये जलने के लिए लड़ जाते हैं तूफान से
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चल पड़ते    हैं     क़दम    बेख़ौफ़    हर रास्ते     पर 
मेरे     अज़ीज़ों    की    दुआएं    काम    आती    हैं

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राह   ऐसे   नही   सुगम    होते   हैं  हर   मंजिल  के 
कहीं  पत्थर   कहीं पर्वत कहीं जंगल भी  मिलते  हैं
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6 comments:

Rajendra kumar ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (09.10.2015) को "किसानों की उपेक्षा "(चर्चा अंक-2124) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

रचना दीक्षित ने कहा…

ये दुआए ही बहुत काम आती है.

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुंदर .
नई पोस्ट : मर्सिया गाने लगे हैं

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

Bahut bahut aabhar aap sabhi ko

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

Aabhar ...

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

AAp sabhi ko aabhar