गुरुवार, नवंबर 26, 2015

मसला पूरी ग़ज़ल का था


मसला पूरी ग़ज़ल का था
मिसरे पर ही अटक  गए

नाजुक रिश्ते    कांच से
द्वेष अग्न में चटक गए

कैसे मंजिल तक जायेगे
अपनी राह से भटक गए

क़दम फूँक कर रखते हैं
जो आँखों में खटक गए

लालच के मारे कुछ लोग
कुक्कुरों सा    झपट गए
"

रजनी"

1 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (28-11-2015) को "ये धरा राम का धाम है" (चर्चा-अंक 2174) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'