मंगलवार, नवंबर 29, 2011

मेरे मूक लबों के तिलिस्म को तोड़ देता है



     " मेरे मूक लबों के तिलिस्म को तोड़ देता है ,तेरा पलभर का मुस्कुराना,
       मेरी मुहब्बत को हवा देता है , तेरा   शरमाकर सर झुकाना.

4 comments:

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

उम्दा

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुंदर...

दिगंबर नासवा ने कहा…

वाह ... क्या बात है ...

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

आप सभी को मेरा हार्दिक आभार,पर देर से आने के लिए माफ़ी चाहती हूँ.....