सोमवार, जनवरी 09, 2012

मेरी ज़िन्दगी की हसीं शाम कर दो

मेरी   ज़िन्दगी की  हसीं शाम कर दो
अपनी  एक ग़ज़ल  मेरे नाम   कर दो.

 उठते  नहीं शर्म-ओ हया     से   चश्म
या रब,मेरे जज़्बात लब-ए-बाम कर दो.

बहुत  फासले हैं  दरमियाँ  मेरे  तुम्हारे
सदा के  लिए  क़िस्सा    तमाम कर दो.

कब तक छुपाये  रखोगे गोशा-ए-दिल में
राज़-ए-दिल  आज चर्चा-ए-आम कर दो.


तग्ज्जुल   कहाँ रह गयी आज ग़ज़लों में,
 "रजनी "  तुम्हीं  यह  नेक  काम कर दो .


"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "











10 comments:

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

Bahut Pyari Gazal... Shabd chun chun kar moti jaise..bhav har she'e me bahut khoob..

kumar ने कहा…

behad khoobsurat...

kumar ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

वाह बहुत बढ़िया!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

ईं.प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन गज़ल ।
मेरी नई कविता देखें । और ब्लॉग अच्छा लगे तो जरुर फोलो करें ।
मेरी कविता:मुस्कुराहट तेरी

veerubhai ने कहा…

बेहतरीन ग़ज़ल .अपना हरेक अश आर मेरे नाम कर दो .

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

aap sabhi ko mera hardik aabhar.......

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bahut badhiyaa gazal...

mahendra verma ने कहा…

ग़ज़ल की खूबसूरती ने मन को प्रभावित किया।
शुभकामनाएं।

Rakesh Kumar ने कहा…

वाह! बहुत शानदार प्रस्तुति है.
मेरी उर्दू जरा कमजोर है.
पर गजल पढ़ने से ऐसा लगता ही नही.
सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार,रजनी जी.