रविवार, दिसंबर 11, 2011

मै दीया था सर-ए - राह जलता रहा,

  जिनको चाहा किये दोस्तों की तरह,
  वो बदलते रहे मौसमों की तरह .

मै दीया था सर-ए  - राह जलता रहा,
आंधियां तेज़ थी पागलों की तरह.


है तकद्दुस दिलों में  जर- ओ - माल का ,
जाने क्यों मंदिरों मस्जिदों की तरह.

वह घड़ी भर में झंझोड़ कर चल दिया,
मेरे जज्बात को आँधियों की तरह.

दास्तान -ए-दर्द  दिल मेरी आँखों से ,
आज "रजनी" रवाँ आंसुओं की तरह .

तकद्दुस--श्रद्धा
रवाँ -- बहना ,जारी रहना.

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

11 comments:

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

der se aaye... par khubsurat shabdo ke saath :)

bahut pyari see rachna..!

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

kumar ने कहा…

khoobsurat...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है! आपके ब्लॉग पर अधिक से अधिक पाठक पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

मदन शर्मा ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत रचना...!

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव को दर्शाती रचना।

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

aap sabhi sudhijano ko mera hardik naman..........

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

bahut bhaavpurn rachna, shubhkaamnaayen.

ZEAL ने कहा…

bhavuk karne wali prastuti...

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

hardik aabhar Divya ji ...........

Dr. jenny ji aapko bhi mera hardik aabhar.........