बुधवार, अक्तूबर 13, 2010

नहीं सीख पाया मन मेरा छलावा

"नहीं सीख पाया मन मेरा  छलावा,
जो लगाती मै भी मुखौटा ,
मुझ पर भी चढ़ जाते रंग जमाने के.

"रजनी मल्होत्रा नैय्यर"

8 comments:

उपेन्द्र " the invincible warrior " ने कहा…

बहुत ही अच्छी शायरी ...


www.srijanshikhar.blogspot.com पर " क्योँ जिन्दा हो रावण "

ALOK KHARE ने कहा…

bahut khoob

kam me jayda

badhai

संजय भास्कर ने कहा…

क्या खूब लिखा है रजनी जी...

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

aap sabhi ko mera hardik aabhar .........

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH ने कहा…

!!!!!!
Ashish

sandhyagupta ने कहा…

दशहरा की ढेर सारी शुभकामनाएँ!!

ana ने कहा…

bahut sundar likha hai aapne.........ati sundar

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

aabhari hun is sneh ke liye..........