रविवार, जुलाई 04, 2010

कोई वादों की डोर से , बंध कर टूट जाता है.

तोड़ जाता है कोई ,
वादों की डोर को,
कोई वादों की डोर से  ,
बंध कर टूट जाता है.

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "

10 comments:

अरुणेश मिश्र ने कहा…

रजनी जी ! वाह , क्या लिख दिया आपने . प्राय: ऐसा होता है । प्रेम की यह गहन पीड़ा है ।

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सही लिखा .. अच्‍छी अभिव्‍यक्ति !!

रजनी नैय्यर मल्होत्रा ने कहा…

गर्म हवा भी,अक्सर होती सर्द है ,
मुस्कान में भी दर्द है .
प्राय ऐसा भी होता है ..........
अरुणेश जी ,.......
संगीता जी ........ आप दोनों को मेरा हार्दिक नमन .......

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

sach kaha
kisi bhi surat me tutna hi hai...hai na.......:)

रजनी नैय्यर मल्होत्रा ने कहा…

ji han Mukesh ji tut jata hai , dor chahe jaisa bhi ho ...........

Subodh Kumar ने कहा…

baahut sunder likhaa hai aapne... teer sahi jagah lagi.... bilkul nishaane per...............

रजनी नैय्यर मल्होत्रा ने कहा…

subodh ji , hardik naman ,par jo tutta hai ya fir tod jata hai vade ko dor ko, uske dard ko sirf wo hi samjh pata hai , kyonki tutna, aur todna dono me hi dard hai..........

shailendra ने कहा…

aapki in panktyon ne purani yadein taja kar din...........
ye is liye likha upar kyon rok na paya apne aap ko aapki is atulya rachna ke aage

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

संजय भास्कर ने कहा…

सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना ! सादर !