शुक्रवार, जुलाई 02, 2010

दर्द से रिश्ता (एक अनुभूति ,मेरे जीवन की)

दर्द से रिश्ता (एक अनुभूति ,मेरे जीवन की)

मैंने सुख दुःख के,
तानों ,बानो  से,
एक गुल है बनाया,
सुख को छोड़ ,
मैंने दुःख को ,
अपना बनाया.

मैंने ऐसा जाल बुना,
ना जाने क्यों ?
मैंने दुःख को चुना.

जीवन में मिठास की तलाश,
हर किसी को होती है,
जिसको पाने की चाह,
हर किसी को होती है.

मैंने भी,जीवन में,
दर्द के साथ मिठास को पाया,
फिर भी ना जाने क्यों,
मुझे दर्द ही भाया.

बड़े कम समय में दर्द ,
जीना सीखा देता  है,
हँसते हुए लोगों को,
रोना सीखा देता है.

हमने सुख के संसार में ,
रहते हुए भी ,
दर्द को महसूस किया,
इसके हर एक कसक को,
अपने अंदर महफूज किया.

दर्द के साथ जुडा हुआ,
सारा जहान है,
दर्द को भी झेल जाना ,
एक इम्तिहान है.

दर्द के साथ मेरा अब तो ,
ऐसा नाता है,
दर्द हर ख़ुशी से पहले,
मेरे चेहरे पर आ जाता है.

दर्द से जुड़ गया ,
एक रिस्ता मेरा खास है,
अब तो दर्द मेरे आगे,
मेरे पीछे, मेरे साथ है.

मैंने एक ऐसा जाल बुना,
ना जाने क्यों मैंने,
फूलों  को छोड़,
काँटों को  चुना.

मैंने ऐसा जाल बुना,
ना जाने क्यों ?
मैंने दर्द  को चुना.

10 comments:

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

दर्द के साथ भी कई बार चाहते हुए भी रिश्ता जुड़ जाता है...

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), जयपुर (राजस्थान) और राष्ट्रीय अध्यक्ष-बास/ Dr. Purushottam Meena Nirankush, Editor PRESSPALIKA,(Fortnightly) Jaipur, Raj. and N. P.-BAAS ने कहा…

रजनीजी,

आज मैंने आपकी अनेक कविताओं को पढा। प्रत्येक कविता गहरी संवेदना और अनुभव के साथ-साथ कुछ न कुछ विशिष्ठता लिये हुए है। प्रत्येक पर तफसील से टिप्पणी करने की चाहत है, लेकिन समयाभाव के कारण फिलहाल मैं आपको सुन्दर, संजीदा, संवेदनशील, खुद्दार एवं ललकार जैसे भावों से ओतप्रात, किन्तु कहीं-कहीं समझौता सा करता हुआ सृजन करने के लिये बधाई, साधुवाद और शुभकामनाएँ ज्ञापित कर रहा रहा हँू।

आशा करता हँू कि आप निरन्तर इसी प्रकार बेबाकी से अपने विचारों को अभिव्यक्ति देते हुए साहित्य सृजन करती रहेंगी। आज के समय में इस प्रकार के लेखकों और लेखिकाओं की अत्यधिक जरूरत है।

आपकी निम्न दो कविताएँ आपके विचारों, अन्तरमन और आपके मजबूत व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करती हुई सी प्रतीत हो रही हैं।

1. फिर कैसे हंसकर, मिलन हो तुझसे
एवं
2. मैंने तो लकीरों पर भरोसा करना छोड दिया

यदि मैंने ठीक समझा है, तो कृपया अवगत करावे, जिससे मैं आगे खुलकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने का साहस जुटा सकूँ।

-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है। इस संगठन ने आज तक किसी गैर-सदस्य, या सरकार या अन्य बाहरी किसी भी व्यक्ति से एक पैसा भी अनुदान ग्रहण नहीं किया है। इसमें वर्तमान में 4342 आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

रजनी नैय्यर मल्होत्रा ने कहा…

rajnish ji bahut hi achhe tarah samvedna ko samjha aapne .......hardik sukriya

रजनी नैय्यर मल्होत्रा ने कहा…

rajnish ji bahut hi achhe tarah samvedna ko samjha aapne .......hardik sukriya

रजनी नैय्यर मल्होत्रा ने कहा…

डॉ.पुरुषोत्तम मीणा साहब आपकी टिपण्णी से वो गहराई साफ़ झलकती है,जो आपने meri रचनाओं के बारे में लिखा है ,जी हाँ मेरे विचार में एक khuddaarpan ,sanjidagi,दर्द का संवेदनशीलता ,तथा एक क्रन्तिकारी भाव भी हैं,पर कहीं ना कहीं हालात से समझौता करता हुआ हालात भी लिखा है . आपके स्नेहल विचार काफी प्रेरणादायक सिद्ध होते रहेंगे मेरे लिए ,आपके अग्रीम विचारो की प्रतीक्षा रहेगी ..... हार्दिक नमन .

Aditya Tikku ने कहा…

Rajniji- bhavo aur shabdo ka atulniy mishran

रजनी नैय्यर मल्होत्रा ने कहा…

aaditya ji hardik sukriya

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

मैंने ऐसा जाल बुना,
ना जाने क्यों ?
मैंने दर्द को चुना.


bahut pyare bol ban pare hain!

na chahte hue bhi kyon dard hisse me aati hai...

dard bhari rachna ke liye badhai.....

रजनी नैय्यर मल्होत्रा ने कहा…

ji han Mukesh ji na chahte hue bhi dard ko bhi apni khushi banana hi padta hai insan ko .

संजय भास्कर ने कहा…

सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना ! सादर !