रविवार, मई 02, 2010

मजदूर हूँ अपनी मजबूरी बोल रहा हूँ

आज मजदूर दिवस पर एक रचना मजदूर की मज़बूरी पर ...........

आज    दिल  का    दर्द    घोल    रहा   हूँ,
मज़दूर  हूँ अपनी मजबूरी  बोल  रहा   हूँ |

ग़रीबी      मेरा     पीछा   नहीं       छोड़ती,
 क़र्ज़    को   कांधे पर   लादे   डोळ  रहा हूँ |

पसीने   से तर -ब -तर   बीत   रहा   है  दिन,
रात, पेट  भरने को नमक- पानी  घोल रहा हूँ |

आज    दिल     का   दर्द     घोल     रहा   हूँ,
मज़दूर    हूँ   अपनी    मजबूरी  बोल  रहा हूँ |

बुनियाद   रखता    हूँ  सपनों    का   हर  बार,
टूटे    सपनों   के    ज़ख्म   तौल    रहा     हूँ |

मज़दूरी      का   बोनस     बस      सपना    है,
सपनों   से    ही   सारे   अरमान  मोल रहा हूँ|

आज    दिल   का    दर्द     घोल      रहा    हूँ
मज़दूर     हूँ    अपनी    मजबूरी  बोल रहा हूँ |

"रजनी"

8 comments:

दिलीप ने कहा…

atyant marmik...bahut khoob...

प्रसून दीक्षित 'अंकुर' ने कहा…

Is Dharti Ki Sachchaai !

Atyant Khoobsoorat !

Dhanyawaad !

Shekhar Kumawat ने कहा…

BAHTRIN MAJDUR KI AATMA KI AAWAJ HE YE


BADHAI AAP KO IS KE LIYE

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

dilip ji hardik naman..........
prasun sprem sneh........
shekhar ji hardik naman........

Shekhar Kumawat ने कहा…

bahut khub

achi rachna

badhai aap ko is ke liye


http://kavyakalash.blogspot.com/

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा ख्यालात...यथार्थ चित्रण.

Shailndra Singh Tomar ने कहा…

I liked it, its good

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

shekhar ji ek baar fir aapka hardik sukriya..
udan sir sarahna ke liye hardik dhanyabaad........
drshaiendra ji aapka bhi hardik sukriya.....