शनिवार, जनवरी 09, 2010

पता है मुझे, तुम इक्कीसवी सदी में जी रही हो|

अभी कुछ दिनों पहले मेरी एक रचना आई थी जिसका शीर्षक मैंने "पछतावा"रखा था| उस रचना में मैंने समाज में नारी के ऊपर फब्तियां करते पुरुषों(मनचले लड़कों ) को दिखाया था,इस वर्ग पर कटाक्ष था मेरे लेख में|पर,उस लेख से मै पूरी तरह संतुष्ट नहीं थी,और कुछ आवाम भी ,जिनके प्रश्न मुझे आये रजनी जी हर जगह मर्द गुनाहगार नहीं होता, उनमे लड़कियों का भी दोष होता है |मै भी इस बात को मानती हूँ ,ताली एक हाथ से नहीं बजती|

ये लेख उन कलियुग की बालाओं के लिए है,जिन्होंने बिना हाला के पान से ही ,मदमत कर रखा है अपने अदाओं से,जिस्म की नुमाइश से,तंग हाल कपड़ों से|जिसमें देख कर किसी के भी ह्रदय में हलचल मच जाये,कम्पन हो जाये अंतरात्मा में|

नारी का गहना "शर्म " को कहा गया है,शर्म का अभिप्राय दो तरह का होता है|एक निगाहों में शील,दूसरा वैसे वस्त्र,वैसी अदाएं ,जो आपको खुबसूरत दर्शाती हों,मोहक लगनेवाली हों|
ना की नशीली हावभाव से पुरुष वर्ग को आकर्षित करती हों|

परदे में रहने दो,परदा ना उठाओ,
ऐसे ही रहा तो,जीना मुश्किल हो जायेगा  |

पर्दानशीं होती रही जो बेपर्दा,
शर्म को भी शर्म आ जाएगी|

घूँघट उतना ही उठाओ कि,
चाँद दिख जाए

इतना भी ना कि,सरक जाए,
हो जाओ पानी,पानी|

ये कलियुग कि अप्सराओं,
मेनका ना बन जाओ

क्योंकि,यहाँ कोई विश्वामित्र नहीं|

महाभारत  में हुआ  ,
द्रौपदी का  चीरहरण |

पर आज तो चीरहरण की जरुरत ही नहीं,
क्योंकि,तुम ही खुद द्रौपदी हो,
खुद हो दुर्योधन,

परदा की वजाय दिखाती हो यौवन|

जब खुद कहती हो ,
आ बैल,मुझे मार,तो क्या करे संसार|

खुद ही लगा कर आग,
कहती हो, कैसे बचाऊं दामन|

दामिनी सी चपला रहोगी,
तो होगा चंचल,
किसी का भी मन |

कहते हैं अमूल्य वस्तु को
सहेज कर रखा जाता है
सहेजो तन को,अमूल्य है ये धन|

पता है मुझे,
तुम इक्कीसवी सदी में
जी रही हो|

फिर भी ये समझ लो,
किसी भी चीज़ की अति,
विनाश का कारण बन जाती है|

"अति का भला न बोलता,
अति की भली ना चुप,
अति की भली न बरसना,
अति की भली ना धूप"

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा"

10 comments:

डाॅ रामजी गिरि ने कहा…

अति सर्वत्र वर्जयते..

Kuldeep Saini ने कहा…

पर आज तो चीरहरण की जरुरत ही नहीं,
क्योंकि,तुम ही खुद द्रौपदी हो,
खुद हो दुर्योधन,

परदा की वजाय दिखाती हो यौवन|

बहुत बढ़िया लिखा है
आज की युवा पीढ़ी को आपने एहसास कराया हैं की मर्यादा में रहे

डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) ने कहा…

sukriya aap dono ka...........

dr vikastomar ने कहा…

koi kya krega cheerharan
dropadi khud hi ho gayi nirvasan

u r always good sis

डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) ने कहा…

vikash ji sukriya.........par kuchh jagaho par meri ye rachna viwadaspad hai.........kyonki mai ek nari hoker khud nari ki burai ki hai....bahut se log mere is vichar se asahamt hain...

ayush ने कहा…

sach likha hai aapne....

अनाम ने कहा…

Sach Naari, naar Ki baat nahi hoti,
Ye To wo aaina hai jisme ibaadat hoti hai|RK
Bahutkhubsurat hain apnkhtiyan aapki

अनाम ने कहा…

har Wo rishta ibaadat ban jaata hai;
Jis rishte me sach ki parchayi hoti hai
Us Rshte me khuda nazar aata hai|...RK
Lovely poem.Keep it up

डॉ रजनी मल्होत्रा नैय्यर (लारा) ने कहा…

aabhar aap sabhi ko mera..........sneh pati rahun..

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

दामिनी सी चपला रहोगी,
तो होगा चंचल,
किसी का भी मन |

कहते हैं अमूल्य वस्तु को
सहेज कर रखा जाता है
सहेजो तन को,अमूल्य है ये धन|


badi saar garbhit baat kahi aapne.........dhanya hai aapki soch
salam!!! iss soch ko..........kavita to as usual achchhi hai hi...........:)