शनिवार, जुलाई 01, 2017

ग़ज़ल
सभ्यता की वो निशानी है अभी तक गाँव में
इक पुराना पेड़  बाक़ी है   अभी तक गाँव में

शहर में फैले हुए   हैं   कांटे नफ़रत के मगर
प्रेम की बगिया महकती है अभी तक गाँव में

चैट और ईमेल पर  होती  है  शहरी गुफ़्तगू
ख़त किताबत ,चिट्ठी पत्री  है अभी तक गाँव में

दौड़ अंधी शहर में पेंड़ो को हर दिन काटती
पेंड़ो की पर पूजा होती है अभी तक गाँव में

एक पगली सी नदी बारिश में आती थी उफ़न
वैसे ही सबको डराती है अभी तक गाँव में

शहर में चाइनीज़ थाई नौजवानों की पसंद
ख़ुशबू पकवानों की आती है अभी तक गाँव में

दिन के चढ़ने तक हैं सोते मग़रिबी तहज़ीब में
तड़के- तड़के ही प्रभाती है अभी तक गाँव में


6 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (02-07-2016) को "ब्लॉगिंग से नाता जोड़ो" (चर्चा अंक-2653) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

संगीता पुरी ने कहा…

अन्तर्राष्ट्रीय ब्लोगर्स डे की शुभकामनायें .... #हिन्दी_ब्लॉगिंग

Onkar ने कहा…

वास्तविक चित्र. सुन्दर प्रस्तुति

Jyoti Khare ने कहा…

वाह !!!! बहुत सुंदर गजल
गाँव का सजीव चित्रण

शुभकामनाएं

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

आप सभी को मेरा हार्दिक आभार

राजीव थेपड़ा ( भूतनाथ ) ने कहा…

क्या बात