सोमवार, मई 30, 2011

करीब आ कर भी मौत , ना कर सकी मेरा आलिंगन


"करीब आ कर भी मौत ,
ना कर सकी मेरा आलिंगन ,

किया जो मैंने आलिंगन तेरा ,
कोई और इस जहाँ से कुछ कर जायेगा.

छोड़ गयी मुझे देकर ये संदेशा,
शब्द तुझसे ही जिंदा हैं.

भाव मन का दर्पण, कवित कर्म को अर्पण,
खो गए जो शब्द, काव्य कहाँ बन पायेगा.

" रजनी"

7 comments:

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

भाव मन का दर्पण, कवित कर्म को अर्पण,
खो गए जो शब्द, काव्य कहाँ बन पायेगा.

सच कहा ......बहुत अर्थपूर्ण पंक्तियाँ....

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

hardik aabhar monika ji....

kuchh dino tak tak fir safar jari hai . isliye blog se ,aap sabhi se dur rahungi .. 9 june tak ke liye

संजय भास्‍कर ने कहा…

किया जो मैंने आलिंगन तेरा ,
कोई और इस जहाँ से कुछ कर जायेगा.
हर शब्‍द बहुत कुछ कहता हुआ, बेहतरीन अभिव्‍यक्ति के लिये बधाई के साथ शुभकामनायें ।

Roshi ने कहा…

sunder pankti

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

arthpurn rachna....:)

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

सच में बहुत सुंदर पंक्तियां है और भाव भी।

Sunil Kumar ने कहा…

खो गए जो शब्द, काव्य कहाँ बन पायेगा.
बहुत सुंदर भावाव्यक्ति , बधाई