शनिवार, जुलाई 01, 2017

ग़ज़ल
सभ्यता की वो निशानी है अभी तक गाँव में
इक पुराना पेड़  बाक़ी है   अभी तक गाँव में

शहर में फैले हुए   हैं   कांटे नफ़रत के मगर
प्रेम की बगिया महकती है अभी तक गाँव में

चैट और ईमेल पर  होती  है  शहरी गुफ़्तगू
ख़त किताबत ,चिट्ठी पत्री  है अभी तक गाँव में

दौड़ अंधी शहर में पेंड़ो को हर दिन काटती
पेंड़ो की पर पूजा होती है अभी तक गाँव में

एक पगली सी नदी बारिश में आती थी उफ़न
वैसे ही सबको डराती है अभी तक गाँव में

शहर में चाइनीज़ थाई नौजवानों की पसंद
ख़ुशबू पकवानों की आती है अभी तक गाँव में

दिन के चढ़ने तक हैं सोते मग़रिबी तहज़ीब में
तड़के- तड़के ही प्रभाती है अभी तक गाँव में


सभी ब्लॉगर साथियों को ब्लॉगिंग दिवस की शुभकामनायें


रविवार, मार्च 12, 2017

राधिका रंग गयी श्याम के रंग में
तुम भी रंग जाओ ऐसे मेरे रंग में

मैं    तेरे    रंग   में तू   मेरे  रंग   में
दोनों  खो  जाएँ  हम  मदभरे रंग में

क्या रखा लाल पीले  हरे  रंग  में
आओ  रंग  दें  तुम्हें इश्क़ के रंग में


चढ़ गया है नशा सबपे फागुन का
हर   कोई  झूमता   है नए रंग   में


पीत पट का  वसन और अधर लाल है
साँवरे  जँच रहे  हैं  साँवले  रंग  में

है  लिबास अपना मौसम  बदलने लगा
अब धरा   दिख  रही   है  हरे  रंग में

कह  रहा   मुझसे   ये मेरा  मन बावरा
"रजनी" मैं  भी घूल जाऊँ केसर घुले रंग में

रजनी मल्होत्रा नैय्यर

बुधवार, नवंबर 23, 2016

क़तरे समंदर को डराते नही हैं

छीनकर किसी से कुछ पाते नहीं हैं
 समन्दर को  क़तरे डराते   नहीं   हैं .
है अपने जीने का  अलग ही अंदाज़ .
बिन बुलाये  किसी के दर जाते नही हैं 

शनिवार, नवंबर 19, 2016

अक्स बदलते हैं हालात बदलते हैं                          मौसम की तरह उनके बात बदलते हैं                             

शुक्रवार, जनवरी 08, 2016

वो औरत नहीं"

स्त्रियों की अस्मत और अस्मिता से जुड़े सवाल पर मेरा आलेख ...


"वो औरत नहीं"

घना कोहरा सा दबा हुआ दर्द मासूम मजबूर का , आहिस्ता -आहिस्ता फैलता
हुआ समेट लेता है संपूर्ण जीवन के हर कोण को | परिवर्तन और परावर्तन के नियम से कोसों दूर उसका संवेग और सोचने की क्षमता बस लांघना चाहती है उस उठते लपट को जिसने घेर कर बना रखी है शोषक और शोषित के बीच की एक मजबूत सी दीवार और कुछ रेखाएँ | यह कुदरत के नियम का कैसा मखौल है , सम शारीरिक संरचना को सिर्फ रंग भेद और कुछ सिक्कों की खनक कर देती है अलग जैसे कागों और बगुलों की अपनी-अपनी सभा | इस आदम भेड़िये के बीच की खाई देख सहसा कह उठता है मन ये क्या ? इस तकरार और भेद की नीति में एक सिक्का कैसे सिमट कर रह गया | शायद इस संरचना के साथ कोई जाति ,रंग भेद की नीति नहीं चलती , चलती है तो बस एक देह की जो मांसल और कोमल
है जिसके आस्वादन के लिए जरुरी नहीं उसकी इच्छा की मंजूरी , उसकी उम्र, भावना , परिपक्वता, अपरिपक्व होना | गिद्धों के पंजे और नाख़ून उसमे समाकर ढूंढ़ ही लेते हैं अपना आहार | दिन के उजाले में कभी रात के अंधकार में तलाशता हुआ चला जाता है भूखे भेड़ियों का झुण्ड किसी निरीह मेमने की शिकार को | कभी देकर प्रलोभन सुनता है हर आलाप को , और मिट जाते हैं टुकड़े भर कागज में लगे अंगूठे के निशान जो कभी गवाही बने शोषित की लाचारी का | एक कोने में सिमटते हुए सूखे पत्ते सी टूटती नार को करना पड़ता है तार-तार अपनी अस्मत त्याग के हवनकुंड में , जिसमे जलकर उसका स्वाभिमान हो जाता है कई तड़पते और भूखे पेटों का पोषक | कभी नश्वर शरीर को जीत ले कोई ,पर आत्मा तो उसे ही प्राप्य है स्व को सौपा हो जिसे |अपने अहं को मार कर कर लेती है जिन्दा कई निष्प्राण शरीर को जिनसे वो जुडी है कई रिश्तों के साथ अम्मा, पत्नी , बेटी पर कहीं से
भी वो औरत नहीं " सिर्फ एक देह है जो नश्वर है अपवित्र नहीं है कर लेगी फिर से वो अपना परिष्कार , बना लेगी इस बात का साक्ष्य अपने वेणी के गांठ को | उसका शोषण और दोहन हो ही नहीं सकता वो जानती है कहीं से भी वो औरत नहीं " सिर्फ एक देह है औरत कभी नहीं मरती उससे ही वजूद है संसार का | शैतान, संत , राग, वैराग सब उसकी ही उत्पति हैं | उसकी पवित्रता की साक्ष्य स्वयं धरा है जो कहती है--- परिष्कार की आवश्यकता नहीं उसे क्योंकि उसके क़दमों से ही धरा उर्वर होती है , महक उठता है फिजा उसकी देह की महकती धुनी से | वो तोड़ती है हर चक्रव्यूह को तब जीत पाता है मनु जीवन महाभारत का युद्ध | वो दौड़ती है शुष्क से जीवन में बनकर रक्त वाहिका तभी स्पंदित होता है परिवार | बनकर परिधि वो बांधे रखती है अपनी स्नेह के गुरुत्वकर्ष्ण से तब जाकर सम्भलता है जीवन का रेला | परिषेचक बनकर महकाती है बगिया , कभी मृदुल कभी लवन बनाकर अपने अंतस को |
पर कुटुंब को समर्पित परिचारिका पाती है वंचना, लांछन, परिघात और कभी - कभी कर दिया जाता है उसका परित्याग उसी के द्वारा जिसने अग्नि को साक्षी बना फेरों व् कसमों की मजबूत कफ़स में क़ैद कर अपने कुत्सित विचारों को बन बैठता है किसी का भाग्यविधाता, परित्राता | वो औरत नहीं पावन धाम है जिसे पवित्र निगाहें छूकर मोक्ष पा जाते हैं |

"रजनी नैय्यर मल्होत्रा "
बोकारो थर्मल

गुरुवार, नवंबर 26, 2015

मसला पूरी ग़ज़ल का था


मसला पूरी ग़ज़ल का था
मिसरे पर ही अटक  गए

नाजुक रिश्ते    कांच से
द्वेष अग्न में चटक गए

कैसे मंजिल तक जायेगे
अपनी राह से भटक गए

क़दम फूँक कर रखते हैं
जो आँखों में खटक गए

लालच के मारे कुछ लोग
कुक्कुरों सा    झपट गए
"

रजनी"

गुरुवार, अक्तूबर 08, 2015

कहीं पत्थर कहीं पर्वत कहीं जंगल भी मिलते हैं

हौसलों के चट्टान को तोड़ देते हैं नाउम्मीदी के पत्थर 
उम्मीदों के दीये जलने के लिए लड़ जाते हैं तूफान से
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चल पड़ते    हैं     क़दम    बेख़ौफ़    हर रास्ते     पर 
मेरे     अज़ीज़ों    की    दुआएं    काम    आती    हैं

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राह   ऐसे   नही   सुगम    होते   हैं  हर   मंजिल  के 
कहीं  पत्थर   कहीं पर्वत कहीं जंगल भी  मिलते  हैं
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बुधवार, सितंबर 16, 2015

गद्दारों से मिलकर वफ़ा कर रहा है

गद्दारों से मिलकर वफ़ा कर रहा है
कुछ  भी  नहीं  वो नया कर रहा है

मासूमियत  या  सयानेपन   से
नादानी अपनी  बयाँ कर रहा है

भटका हुआ सहाब   हो गया है 
नीलाम अपनी अना कर रहा है

"रजनी मल्होत्रा नैय्यर "

रविवार, सितंबर 13, 2015

सीख़

हो  झोपडी  या  ऊँची  महलों  का  बसेरा
दोनों को  ज़मीन चाहिए  कब्र  के वास्ते

"रजनी मल्होत्रा नैय्यर "